Wednesday, 1 April 2015

बीवी का मायका


मैं और लीना शुक्रवार रात बारा बजे लीना के घर याने मेरी ससुराल पहुंचे. जब हम टैक्सी से स्टेशन से घर की ओर जा रहे थे तब मैंने लीना का हाथ पकड़कर कहा "अब तो खुश हैं ना रानी साहिबा?"

लीना मुस्कराई "हां मेरे राजा. और अब देखना यहां आकर तुम कितने खुश हो जाओगे. पता है, यहां अपने दामाद के स्वागत की, खातिरदारी की जम के तैयारी की गयी होगी"

"देखते हैं. वैसे तुम्हारे ससुराल वालों ने पहले ही मुझे ये जन्नत की परी ..." उसकी कमर में चूंटी काट कर मैं बोला. " ... गिफ़्ट में दी है, अब उससे अच्छी और क्या खातिर करेंगे मेरी?"

लीना बस मुस्करा दी जैसे कह रही हो कि देखते जाओ अभी तो!

***

इस ट्रिप का बैकग्राउंड ऐसा था.

लीना और मैं क्या क्या गुल खिलाते हैं, सिर्फ़ आपस में ही नहीं, बल्कि जो कोई पसंद आ जाये और मिल जाये उसके साथ, यह यहां नहीं बता सकता, वह अलग कहानी है, बल्कि कहानियां हैं. मेरे दूर के रिश्ते के चाचा चाची और मौसा मौसी के साथ हमने क्या क्या किया, इसकी अलग कहानी है. और मेरे दो तीन दोस्त और उनकी बीवियां हैं ही! बहुत खास किस्म के दोस्त. हर महने कम से कम एक बार सब का ग्रूप जमता है किसी के यहां शनिवार रविवार को. उस वक्त कौन किसका पति है या कौन किसकी बीवी है यह सब कोई मायने नहीं रखता.

बस इसी सब चक्कर में मैं और लीना मस्त रहते हैं, जवानी का पूरा लुत्फ़ उठाते हैं, कहीं जाने आने की इच्छा नहीं होती. इस वजह से शादी के छह महने हो गये फिर भी लीना के घर याने मेरी ससुराल को शादी के बाद हम अब तक नहीं गये थे.

लीना के मायके से बार बार फोन आते थे, लीना की मां के, लीना की भाभी के. लीना पिछले एक महने से मेरे पीछे लगी थी कि अब छुट्टी लो और मेरे मैके चलो. अकेली वो जाती नहीं थी, मेरे जैसा उसकी बुर का गुलाम वो कैसे पीछे छोड़ कर जाती. यहां उसके खिलाये (और मुझे खिलवाये) गुल देखकर मैं कई बार उससे पूछता था कि लीना, जब शादी के पहले अपने घर रहती थी तू तो तेरे जैसी गरमा गरम चुदैल लड़की का गुजारा कैसे होता था तो बस हंस देती और आंख मार के कहती कि जब मेरे घर चलोगे तभी पता चलेगा. मैं मन ही मन उसके बारे में अंदाजा बांधता और कुछ अंदाजे तो इतने हरामीपन के होते कि मेरा कस के खड़ा हो जाता. लीना से खोद खोद के पूछता तो वो टाल जाती या मेरा मुंह अपने किसी रसीले अंग से बंद कर देती.

दीवाली की तो मुझे छुट्टी मिली नहीं पर उसके बाद शनिवार रविवार को आखिर हम ने जाने का फैसला कर लिया. एक दिन की छुट्टी मैंने और किसी तरह ले मारी. और इस तरह हम ससुराल में मेरी पहली ट्रिप के लिये पहुंचे.

***

खैर, टैक्सी घर के आगे रुकी और हम उतरे. सब इंतजार कर ही रहे थे. खास कर लीना की मां, जिन्हें सब ताईजी कहते थे, उनकी खुशी देखते नहीं बनती थी. लीना की भाभी मीनल और छोटा भाई ललित भी बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे, क्योंकि टैक्सी रुकते ही वे दौड़ कर बाहर आ गये थे. बस लीना का बड़ा भाई हेमन्त, मीनल का पति नहीं था, छह महने के लिये विदेश गया था.

अंदर जाकर हम बैठे, ताईजी ने कॉफ़ी बनाई. शुरुआत जरा फ़ॉर्मल बातों से हुई. आखिर मैं पहली बार आया था. मैं नजर बचाकर जितना हो सकता है, लीना के उन घरवालों को देख रहा था. शादी हमारी रजिस्टर्ड हुई थी इसलिये तब किसी से ज्यादा मिलने जुलने का मौका नहीं मिला था. मीनल दिखने में बड़ी आकर्षक थी, याने कोई ब्यूटी क्वीन नहीं थी लीना की तरह, पर फिर भी उसको देखते ही मन में और दूसरे अंगों में भी गुदगुदी सी होती थी. इस समय सलवार कमीज पहने थी, बिना ओढनी, के जिसमें से उसका सुडौल मांसल बदन खिल कर दिख रहा था. टाइट कमीज में उसके जवान उरोज मचल मचल कर बाहर आने को कर रहे थे. फिर याद आया कि अभी एक साल पहले ही वो मां बनी थी तो उसका भी एफ़ेक्ट पड़ा होगा उसकी ब्रा साइज़ पर. थी भी अच्छी ऊंची पूरी, लीना से एकाध इंच लंबी ही होगी, कम नहीं.

ताईजी ने तो मुझे मंत्रमुग्ध कर डाला. वैसे भी मुझे उमर में बड़ी औरतों से खास लगाव है, ज्यादा पके फ़लों जैसी वे ज्यादा ही मीठी लगती हैं. और ताईजी तो एकदम माल थीं. लीना की मां - मेरी सास के बारे में वैसे मुझे ऐसा सोचना नहीं चाहिये ऐसा मेरे मन में आया पर मन पर काबू करना बड़ा मुश्किल था. चेहरा बड़ा खूबसूरत था, लीना से थोड़ा अलग था पर एकदम स्वीट. बदन भरा पूरा था, मोटा नहीं था, पर कद में छोटी थीं, करीब पांच फुट की होंगी और इस वजह से बदन थोड़ा खाया पिया दिखता था पर उनके बदन में मांसलपन भले हो, सिठानी जैसा मुटापा नहीं था. और एकदम गोरी चिट्टी थीं, उनका पेट और बाहें जो दिख रही थीं, उससे उनकी स्किन कितनी चिकनी है ये दिख रहा था. बाकी तो ज्यादा कुछ दिखा नहीं क्योंकि वे अपना आंचल अपने बदन में लपेटी हुई थीं. मेरे मन में आया कि इनको सिर और पैरों से पकड़कर छह इंच खींच दिया जाये और कमर के नीचे के याने चौड़े भरे हुए भारी भरकम कूल्हों को दो हाथों के बीच रखकर थोड़ा पिचका दिया जाये तो एकदम मॉडल लगेंगी.

ललित को देखते ही कोई भी कह देता कि वो लीना का भाई था, एकदम हू बहू वही चेहरा था उसका. उंचाई में लीना पर न जाकर शायद अपनी मां पर गया था - लीना अच्छी खासी पांच फुट सात इंच लंबी है - ललित का कद बस पांच फुट एक या दो इंच ही था. अब तक दाढ़ी मूंछे आने के भी कोई निशान नहीं थे. इसीलिये जूनियर कॉलेज में होने के बावजूद किसी सातवीं आठवीं के लड़के जैसा चिकना दिखता था. लगता था ताईजी के ज्यादा अंश आये होंगे उसके जीन में. लड़कों के बारे में हम कहते हैं कि हैंडसम है, या स्मार्ट है पर ललित के बारे में बस कोई भी होता तो यही कहता कि कितना सुंदर या खूबसूरत लड़का है! जरा शर्मीला सा था. मेरी ओर देख रहा था पर कुछ बोल नहीं रहा था.

शायद मीनल का मूड था गप्पों का पर कॉफ़ी खतम होते ही ताईजी ने सब को जबरदस्ती उठा दिया "चलो सब, अरे तुम लोग दिन भर आराम किये हुए हो, अनिल और लीना ट्रेन में थक गये होंगे. उनको अब सोने दो. बाकी गप्पें अब कल सुबह"

मीनल मुस्करा कर बोली "जीजाजी, सिर्फ़ गप्पों से मन नहीं भरेगा हमारा. दो दिन को तो आये हो आप, हमने तो घंटे घंटे का टाइम टेबल बनाया है आप के लिये, और वो तो असल में अभी से बनाया था, आपके यहां पहुंचने के टाइम से, पर अब नींद के ये कुछ घंटे वेस्ट जायेंगे, है ना ताईजी" फिर वो लीना की मां की ओर देखकर मुंह छुपा कर हंसने लगी. लीना के चेहरे पर भी बड़ी शैतानी झलक रही थी, जैसे उसे सब मालूम हो कि क्या प्लान बन रहे हैं.

ताईजी ने मीठी फटकार लगाई "अब वो सब रहने दो, देखा नहीं कितने थक गये हैं दोनों, उनको आराम करने दो पहले, नहीं तो सब गप्पों का मजा ही किरकिरा कर दोगी तुम लोग. और मीनल, जीजाजी जीजाजी क्या कर रही है तू, अनिल तुझसे छोटे हैं, तेरी ननद के पति हैं, तेरे ननदोई हुए ना!"

"ताईजी, मैं तो जीजाजी ही कहूंगी. अच्छा लगता है, साली जीजा का रिश्ता आखिर कौन निभायेगा." मीनल ने शैतानी भरी नजरों से मेरी ओर देखते हुए कहा. "या फिर सीधे अनिल कहूंगी"

मेरी सासूमां बोलीं "तू मानेगी थोड़े! लीना बेटी जा, नहा धो ले, नींद अच्छी आयेगी, मैं खाना वहीं भिजवाती हूं"

लीना बोली "मां, अब खाना वाना रहने दो, भूख नहीं है, बस नहा कर थोड़ा हॉट चॉकलेट पियेंगे, फिर सोऊंगी मैं तो"

मीनल बोली "लीना ... वो दूध?"

लीना उसकी ओर देखकर मुस्कराने लगी. ताईजी थोड़ी चिढ़ सी गयीं "तुम दोनों नहीं मानोगी. मीनल तू भी जा, दूध मैं गरम कर लूंगी"

नहा धोकर हमने हॉट चॉकलेट पिया और फिर सो गये. लीना को बिना चोदे मुझे कहां नींद आती है! तो मैं जब मेरी रानी को पास खींचने लगा तो उसने कस के मुझे चूंटी काटी और धकेल दिया "अब मुझे तंग मत करो, अब जो करना है वो कल" फिर मेरे मुंह को देखकर तरस खाकर बोली "कल से तुम्हारा एकदम टाइट प्रोग्राम है, उसके लिये जरा फ़्रेश रहना, आज सो लो, नहीं तो थके हारे ससुराल में जम्हाई लेते हुए फ़िरेंगे जमाई राजा, तो कुछ अच्छा दिखेगा क्या!"

सुबह नींद खुली, लंड मस्त खड़ा था जैसा सब मर्दों का होता है, बस फरक ये था कि कोई उसे पजामे के ऊपर से ही पकड़कर मुझे जगाने के लिये हिला रहा था. पहले लगा लीना है, वह मुझे ऐसे ही जगाती है. पर फिर आंखें खोली तो देखा मीनल भाभी नाइटी पहने एक हाथ में चाय का कप लेकर झुक कर खड़ी थी और दूसरे हाथ से मेरे लंड को पकड़ कर हिला रही थी. झुके झुके उसने नाइटी के गले में से मुझे अपने मोटे मोटे स्तनों का दर्शन करा दिया जो बिना ब्रा के नाइटी के अंदर पके आमों जैसे लटक रहे थे. लीना का कहीं पता नहीं था.

"उठिये जीजाजी, आप सो रहे हैं पर ये तो कब से जग रहा है बेचारा" मुस्कराते हुए मीनल बोली.

मैं उठ कर बैठ गया और मीनल के हाथ से चाय का कप लिया. "भाभी, शायद यह बेचारा आप की राह देख रहा था. कितना सुहाना तरीका है आपके यहां किसी को जगाने का"

"हमारे यहां तो बहुत से सुहाने तरीके हैं हर चीज के लिये, अब आप उठेंगे तब तो पता चलेगा" मीनल भाभी मेरी आंखों में आंखें डाल कर बड़े मीठे अंदाज में बोलीं.

उतने में लीना बाथरूम से निकली. टॉवेल से मुंह पोछते बोली "भाभी, आज बैंक नहीं जाओगी क्या? मुझे लगा था कि तुम तो तैयार हो गयी होगी अब तक"

मीनल बोली "अरे आज तू और अनिल आये हैं तो सोचा कम से कम एक घंटा देरी से तो जाऊं, मुझे तो छुट्टी ही चाहिये थी पर मिली नहीं, बड़ा खूसट मैनेजर है हमारा. अनिल चाय पी रहे हैं तब तक मैं जाकर ऑफ़िस के लिये तैयार होती हूं"

मैंने मुंह धोया और फिर चाय पी. लीना मेरे पास बैठकर मेरे लंड से खेल रही थी. कल रात खुद नखरा करके मुझे दूर धकेला था, अब शायद अपने रोज के खिलौने के बगैर रहा नहीं जा रहा था. सोच रहा था कि मीनल के मुझे जगाने के तरीके के बारे में बताऊं या नहीं. कहा "ये मीनल भाभी बड़ी नटखट हैं, आज मुझे जगाने आयीं तो ..."

"और तुमने उन्हें ऐसे ही जाने दिया? कैसे हो जी? बड़े प्यार दुलार से जगाने आयी होगी मीनल. ऐसे ही सूखे सूखे वापस भेज दिया भाभी को? सलीके से थैंक यू भी नहीं बोला?" मुझे ही डांट लगाते हुए वो बोली. आंखों में ऐसी शैतानी भरी थी जैसे कोई एक नंबर की बदमाश बच्ची कुछ उल्टा सीधा करने जा रही हो. फिर मेरे लंड को मुठ्ठे में लेकर ऊपर नीचे करने लगी.

मेरा लंड तन्ना गया. मैंने लीना को पकड़कर बिस्तर पर खींचा तो हंसते हुए छूट कर खड़ी हो गयी. मैं मुंह बना कर बोला "क्या यार, यहां अपने मायके आकर ऐसे के.एल.डी कराओगी क्या? दावत के बजाय तो उपवास करना पड़ रहा है मेरे को" तो बोली "लेटे रहो, आराम करो, जरा तरीके से रहो. आखिर दामाद हो, पहली बार ससुराल आये हो. मैं जाकर देखती हूं कि मां और भाभी ने आज सुबह का क्या प्रोग्राम बनाया है."

टाइम पास करने को लेटा लेटा मैं मीनल ने सुबह दिखाये अंदाज के बारे में सोचता हुआ अपने लंड को पुचकारने लगा. कम से कम मीनल भाभी मुझपर मेहरबान होंगी ये पक्का था. लीना कैसे मुझे ही डांट रही थी कि तुमने उनको ऐसे ही वापस भेज दिया. नाइटी में मीनल की वो मतवाली चूंचियां कैसी दिख रही थीं ये याद करके साला लंड ऐसा तन्नाया कि मेरे पजामे की अधखुली ज़िप को टन्न से खोलकर बाहर आ गया और लहराने लगा. सोच रहा था कि शायद मीनल यह तो एक्सपेक्ट कर ही रही होगी कि मैं एक किस लूंगा जो मैंने नहीं किया, एक लल्लू जैसा बिहेव किया. अपने आप को कोसते हुए मैं पड़ा रहा.

लंड का सीना तान के खड़ा होना था कि अचानक मीनल कमरे में आ गयी. बिलकुल ऑफ़िस जाने की तैयारी करके आयी थी. गुलानी साड़ी और मैचिंग ब्लाउज़ पहना था और लाल लिपस्टिक लगायी थी. गुलाबी ब्लाउज़ में से लाल ब्रा की झलक दिख रही थी. एकदम स्मार्ट और तीखी छुरी लग रही थी.

मैं हड़बड़ा गया. चादर ओढ़ने के लिये खींची तो मीनल बोली. "रहने दो जमाईजी. आप तैयार हैं ये बड़ा अच्छा हुआ. टाइम वेस्ट नहीं होगा. वैसे भी लीना ने कहा था मेरे को कि भाभी तुम तैयार हो जाओ, मैं अनिल को तैयार करके रखूंगी तेरे लिये"

मीनल मेरे पास आकर बैठ गयी. फिर मेरा लंड मुठ्ठी में भरके हिलाने लगी. "एकदम रसीला और मोटा ताजा गन्ना है. तभी मैं कहूं कि लीना ने शादी के बाद मायके आने का नाम ही नहीं लिया. बदमाश है, इस गन्ने को बस खुद के लिये रखना चाहती थी. ऐसे थोड़े ही होता है. अब ये भी तुम्हारा घर है तो सब घरवालों का भी हक इस मिठाई पर है या नहीं?"

मैंने कहा "मीनल भाभी, आपके घर आये हैं, अब आप जो चाहें वो कर लें. समझ लीजिये आपकी गुलामी करने आये हैं" मीनल से नोक झोक करते वक्त मन में सोच रहा था कि मीनल तो बड़ी फ़ॉरवर्ड निकली, सीधे असली मुद्दे पर हाथ डाल रख दिया. ट्रेलर इतना नशीला है तो मेन पिक्चर कैसी होगी.

मीनल साड़ी धीरे धीरे बड़ी सावधानी से ऊपर करते हुए पलंग पर चढ़ गयी. "गुलाम नहीं अनिल जी, आप हमारे खास मेहमान हैं, इस घर के दामाद हैं, हमारे घर की प्यारी बेटी के पति हैं, उसके चेहरे पर से ही दिख रहा है कि उसको आपने कितना खुश रखा है. अब हमारे यहां आये हैं तो हम सब का फ़र्ज़ है कि आपको खुश रखें. अब आप लेटे रहो जीजाजी. हमें स्वागत करने दो ठीक से. जल्दी भी है मेरे को, ऑफ़िस को लेट हो जाऊंगी तो मुश्किल होगी. पर आखिर घर की बहू हूँ, आपका ठीक से स्वागत करना तो मेरा ही फ़र्ज़ है ना! इसलिये तैयार होकर ही आई कि फिर सीधे ऑफ़िस निकल जाऊंगी."

मीनल ने साड़ी उठाई और मेरी टांगों के दोनों ओर अपने घुटने टेक कर बैठ गयी. उसने पैंटी नहीं पहनी थी. इसलिये घने काले बालों से भरी उसकी चूत मेरे को दो सेकंड को साफ़ दिखी. लंड ने तन कर मेरी सल्हज के उस खजाने को सलाम किया. मीनल थोड़ा ऊपर उठी और मेरे लंड को पकड़कर अपनी चूत में खोंस लिया. फिर मेरे पेट पर बैठकर उसने साड़ी नीचे की और ऊपर नीचे होकर मुझे चोदने लगी. लगता है मीनल चुदाई के लिये एकदम तैयार होकर आयी थी, चूत बिलकुल गीली और गरमागरम थी.

"वैसे सॉरी जीजाजी, आप को जल्दी उठा दिया, मस्त गहरी नींद सोये थे आप. ननदजी भी कह रही थी कि उनको कुछ और सोने दो, फिर दिन भर बिज़ी रहेंगे बेचारे. पर ऑफ़िस जाने में देर होने लगी तो नहीं रहा गया मुझसे. ऐसे ही चली जाती बिना घर की बहू का फ़र्ज़ निभाये तो ऑफ़िस के काम में क्या दिल लगता मेरा? वैसे कैसा लग रहा है जीजाजी? अच्छा लगा?"

"भाभीजी .... अब क्या कहूं आप को, आपने तो मेरे होश उड़ा दिये. बहुत सुंदर लग रही हो आप मीनल भाभी, साड़ी एकदम टॉप है और साड़ी के अंदर का माल तो और टॉप है" मैंने हाथ बढ़ाकर साड़ी के ऊपर से ही उसके स्तन पकड़ने की कोशिश की तो उसने मेरे हाथ को पकड़कर बाजू में कर दिया. "अभी नहीं जमाईजी, साड़ी में सल पड़ जायेंगे. बदलने को टाइम नहीं है मेरे को. लेटे रहो चुपचाप"

पर मैं क्या चुप रहता! उस कामिनी को पास खींचकर उसके वे लिपस्टिक लगे लाल लाल होंठ अगर नहीं चूमे तो क्या किया! मैं फिर से उसकी कमर में हाथ डालकर उसे नीचे खींचने लगा तो मीनल ने मेरे हाथ पकड़े और चिल्लाई. "ताईजी ... ताईजी .... जल्दी आइये ... देखिये जीजाजी क्या गुल खिला रहे हैं. मान ही नहीं रहे, मुझपर जबरदस्ती कर रहे हैं"

मैं थोड़ा घबरा कर बोला "अब मांजी को क्यों बीच में लाती हैं मीनल भाभी! सॉरी अब नहीं हाथ लगाऊंगा"

ताईजी की आवाज आयी बाजू के कमरे से "आयी बेटी. बस आ ही रही हूं"

मीनल ने फिर चिल्ला कर कहा "वो स्ट्रैप्स भी ले आइये. मैंने कहा था ना कि इनके बिना काम नहीं होगा"

दरवाजा खुला और मेरी सासूमां अंदर आयीं. लगता है अभी अभी नहा कर पूजा करके आई थीं, क्योंकि उन्होंने बदन पर बस एक साड़ी लपेट रखी थी, और कुछ नहीं पहना था. न ब्रा न पेटीकोट न ब्लाउज़. बाल गीले थे और खुले छोड दिये थे. साड़ी जगह जगह गीली हो गयी थी और उनके बदन से चिपक गयी थी. जहां जहां वो चिपकी थी, वहां उनके गोरे गोरे बदन के दर्शन हो रहे थे. छाती पर तो साड़ी इतनी गीली थी कि उनकी लटकती चूंचियां और उनपर के गहरे भूरे निपल साड़ी को एकदम चिपक गये थे.

"ये ले, ले आई वो स्ट्रैप्स. तकलीफ़ दे रहे हैं जमाईजी? मैंने पहले न कहा था मीनल बिटिया तुझसे कि पहले उनको सोते में ही बांध देना और फिर अपना काम करना. मेरे को मालूम है उनका स्वभाव, लीना सब बताती थी मेरे को फोन पर. चलो कोई बात नहीं, अब बांध देते हैं हमारे दामाद को. अनिल बेटा, हाथ ऊपर करो" ताईजी ने बड़े प्यार से मुझे आज्ञा दी. मैंने चुपचाप हाथ उठा दिये. हाई कमान के आगे और क्या कहता! ताईजी ने मेरे हाथ पलंग के सिरहाने के रॉड से उन वेल्क्रो स्ट्रैप से बांध दिये. फिर मेरे पैरों को नीचे वैसे ही पलंग के पायताने के रॉड से कस दिया. "मीनल, चल अब जल्दी निपटा. तेरी बस चली जायेगी तो फिर चिड़ चिड़ करेगी"

"चली जाये मेरी बला से, मैं तो जीजाजी से टैक्सी के पैसे वसूल कर लूंगी, वो भी कूल कैब के" मीनल अब मुझे जोर जोर से चोदने लगी. ताईजी ने बड़े लाड़ से अपनी बहू के कारनामे दो मिनिट देखे, फिर वापस जाने लगीं.

"अब आप कहां चली मांजी?" मीनल ने ऊपर नीचे होते हुए उनसे सवाल किया.

"अरे सोचा देख आऊं, लीना बेटी को कुछ चाहिये क्या. शादी के बाद पहली बार मायके आई है मेरी बेटी" ताईजी बोलीं.

"लीना ठीक है ताईजी, कुछ नहीं चाहिये उसको. वो ललित के कमरे में है. ललित को भी ग्यारा बजे ट्यूशन को जाना है. इसलिये लीना बोली कि तब तक जरा ठीक से छोटे भाई से मिल लूं, इतने दिनों बाद हाथ आया है. इसीलिये लीना ने मुझे कहा था कि मुझे ललित के साथ टाइम लगेगा, तुम तब तक अनिल का दिल बहलाओ ... और ताईजी .... जरा मेरे बेडरूम से मेरी पैंटी ले आइये ना, मैं जल्दी में वैसे ही आ गयी ... और बस अब मेरा होने ही वाला है ..."

"अभी लाई बेटी" कहकर ताईजी बाहर गयीं. मैं कमर उचकाने लगा कि मीनल की तपती गीली म्यान में अपना लंड जरा गहरा घुसेड़ सकूं तो चुदाई का और मजा आये..

"लेटे रहो जीजाजी चुपचाप ... अभी आप का वक्त नहीं आया, जरा धीरज तो रखो" मीनल ने मुझे डांट लगायी और फिर अपनी चूत ढीली छोड़कर मेरे पेट पर बैठकर सुस्ताने लगी. मैं झड़ने के करीब आ गया हूं ये उस शैतान को पता चल गया था.

"अब ठीक है? शुरू करूं फिर से?" दो मिनिट बाद मीनल भाभी बोली. "देखो कंट्रोल रखना अनिल नहीं तो ऐसे ही झड़ जाओगे, तुमको भी पूरा स्वाद नहीं आयेगा लंबी चुदाई का और मुझे भी फिर से साफ़ होना पड़ेगा. ऑफ़िस में पक्का लेट हो जाऊंगी. ठीक है? प्रॉमिस?" मैंने जब मुंडी हिला कर हां कहा तभी उसने फिर मुझे चोदना शुरू किया. जब तक ताईजी मीनल की पैंटी लेकर वापस आयीं, मीनल अपनी स्पीड अच्छी खासी बढ़ा चुकी थी. ऊपर नीचे उछलते हुए कस के मुझे चोद रही थी. उसकी मस्ती भी छलक छलक रही थी, अपने होंठ दांतों तले दबाये वो अब मुझे ऐसे चोद रही थी कि सौ मीटर की रेस दौड़ रही हो.

ताईजी ने पैंटी बिस्तर पर रखी और मीनल के चेहरे की ओर देखा. उसके तमतमाये चेहरे को देख कर उन्होंने अपनी बहूका सिर अपने हाथों में ले लिया. फिर बड़े प्यार से मीनल के होंठ चूमने लगीं. उनका एक हाथ अब मीनल की बुर पर था और उंगली से वे मीनल के क्लिट को रगड़ रही थीं. मीनल ने उनकी आंखों में देखा और उनके होंठ अपने होंठों में दबा लिये. सास बहू का ये प्यार देख कर मेरा लंड ऐसा उछलने लगा कि जैसे मीनल के पेट में घुस जाना चाहता हो. पर मैंने वायदा किया था, किसी तरह अपने लंड को झड़ने से बचाता उन दोनों का लाड़ दुलार देखता रहा.

अपने दबे मुंह से एक हल्की चीख निकालकर मीनल अचानक झड़ गयी. मेरा लंड एकदम भीग गया. मीनल लस्त होकर जोर जोर से सांस लेती मेरे पेट पर बैठी रही और ताईजी बड़े प्यार से उसके चुम्मे लेती रहीं. मीनल की पाठ थपथपा कर बोलीं "हो गया तेरा? बुझ गयी मन की प्यास? कब से कह रह थी कि अनिल और लीना जब घर आयेंगे तो ये करूंगी, वो करूंगी"

मीनल अब तक थोड़ी शांत हो गयी थी. मेरे लंड को अपनी गीली चूत से निकालकर उठते हुए बोली "हां मांजी, अगन थोड़ी शांत हुई मेरी. पर ये तो शुरुआत है, अभी इतनी आसानी से थोड़े छोड़ूंगी जीजाजी को! एकदम मतवाला लंड है, कड़क और लंबा. अंदर तक जाता है मुआ! मेरा रुमाल कहां गया? इतनी गीली हो गयी है बुर, पोछे बिना पैंटी भी नहीं पहन सकती"

"रुमाल ये रहा तेरा पर फिर दूसरा रुमाल लाना पड़ेगा. चल मैं पोछ देती हूं, बैठ इस कुरसी में जल्दी" ताईजी ने मीनल को बिस्तर से उतरने में मदद करते हुए कहा.

मीनल साड़ी ऊपर करके कुरसी में बैठ गयी "वैसे कायदे से जीजाजी ने अपनी जीभ से मेरी चूत साफ़ करना चाहिये, ये पानी सब उन्हींने निकाला है आखिर सजा उन्हीं को मिलनी चाहिये."

मैं बोला "अगर आप ऐसी सजा रोज देने की प्रॉमिस करें तो जनम भर आपका कैदी बन कर रहूंगा भाभीजी"

मीनल ने मुसकराकर बड़ी शोखी से मेरी ओर देखा और फिर बोली "सजा तो दे देंगे दामादजी को बाद में पर अब अगर मैं उनके मुंह पर बैठी तो फिर दस बीस मिनिट उठ नहीं पाऊंगी, और पानी छोड़ूंगी, फिर उनको और चाटना पड़ेगा, फिर ऑफ़िस को गोल मारना पड़ेगा"

ताईजी मीनल के सामने नीचे बैठ गयीं और बड़े लाड़ से मीनल की बुर और उसकी गीली जांघें चाटने लगीं. मीनलने अपनी टांगें और खोल कर उनके सिर को जगह दी कि ठीक से सब जगह उनकी जीभ पहुंच सके. ताईजी जब तक जीभ से उसकी टांगों पर बह आया रस पोछ रही थीं, मीनल शांत बैठी थी और मेरी तरफ़ देख रही थी. मैं बड़े इंटरेस्ट से सास बहू का ये अनोखा लाड़ प्यार देख रहा था. यह देख कर उसने मुझे मुंह चिढ़ाया जैसे कह रही हो कि लो, ये अमरित आज आपके भाग में नहीं था. फिर अपनी सास के खुले बालों में उंगलियां फिराती प्रेम से बोली "और मांजी, बाल सुखा कर ही जूड़ा बांधियेगा, गीला बांध लेंगी हमेशा जैसे और सर्दी हो जायेगी"

"हां मेरी मां, जैसा तू कह रही है वैसा ही करूंगी. अब तू जा, अब सच में देर हो गयी है" ताईजी ने उठते हुए कहा. मीनल ने पैंटी पहनी, साड़ी नीचे करके ठीक ठाक की और फिर निकलते वक्त मेरा एक लंबा गहरा चुम्मा लिया. जाते जाते बोली "आज अब आपकी खैर नहीं जीजाजी, हम तो बस आपको ऐसी ही मीठी सूली पर लटकाने वाले हैं दिन भर. वो तो मांजी अच्छे वक्त आ गयीं और मेरी मदद की नहीं तो मैं बस चढ़ी रहती आप पर और जरूर लेट हो जाती. अब शाम का देखती हूं आने पर आपकी क्या खातिर क्या जाये. ताईजी, अब आप रसोई में मत जाना, राधाबाई आने वाली है, वो सब संभाल लेगी. आप सिर्फ़ अनिल की ओर ध्यान दो, जरा देखिये उसको आप के लिये कैसा मस्त तैयार करके जा रही हूं. हां सोनू के लिये दूध की बोतल भर के रखी है, वो पिला देना उसको"

"ठीक है, वो तो मैं कर दूंगी पर तेरे दूध का क्या? ललित को पिलाने वाली थी ना? उसको स्तनपान कराया?"

"नहीं मांजी, आज लीना ने सब खतम कर डाला. सुबह सुबह आई थी नंबर लगाने कि और किसी को न मिल जाये. कहती थी कि ललित तो रोज पीता है भाभी का दूध, अब एक दो दिन सब्र करे"

"चलो ठीक है. वैसे मेरा भी रह गया देख. दिन में एक बार कम से कम तो मुझे अपना अमरित चखा दिया कर, मन नहीं भरता बेटी उसके बिना" ताईजी मीनल को बिदा करते हुए बोलीं.

"अब दो दिन तो आपको उपवास करना ही पड़ेगा. देखिये ना, अब सोनू को पिलाना भी बंद कर दिया, वो बच्ची बोतल से दूध पीने लगी है, फ़िर भी मेरा दूध कम पड़ता है. और ताईजी, इनको - हमारे अनिल जी को - जरा ऐसे ही गरम रखियेगा. मिन्नत करें तो भी मत छोड़ना. अपने घर में मन चाहे वैसा मजा लेते होंगे, अब यहां इनका फ़र्ज़ है कि हमें भी मजा लेने दें." मीनल ने मेरी ओर देखा और मुंह बना कर चिढ़ाया कि अरे अरे, कितनी तकलीफ़ हो रही है, पर क्या करें मजबूर हैं. फिर चली गयी.

मेरा कस के खड़ा था. मीठी मीठी अगन हो रही थी जो सहन नहीं हो रही थी. मैंने अपनी सासूमां से मिन्नत की "ताईजी, बड़ी तकलीफ़ हो रही है, लगता है पागल हो जाऊंगा. ये मीनल भी अजीब है, मेरे को ऐसे स्वर्ग की सीढ़ी पर चढ़ाया और अब लटका कर भाग गयी. जरा छोड़िये ना मेरे हाथ पैर. और लीना को भेजिये ना जरा, जरा कहिये कि उसके इस गुलाम को कैसी तकलीफ़ हो रही है, आकर जरा कृपा कर दे मेरे ऊपर. ऐसा रहा तो मैं तो पागल हो जाऊंगा"

"अनिल बेटा, लीना बहुत दिन बाद मिली है ललित से, बड़े लाड़ करती है अपने छोटे भाई के, अब टाइम तो लगेगा ही, और उसके सुख में खलल डालने की जरूरत नहीं है बेटा, हम सब तो हैं तुम्हारी सेवा करने को. मेरे होते तुम ऐसे तड़पो ये ठीक नहीं है. एक मिनिट बेटे, ये साड़ी गीली हो गयी है, जरा बदल लूं, और बाल भी भीगे हैं, वो क्या है पूजा मैं ऐसे ही भीगे बदन से करती हूं ना." कहकर ताईजी ने साड़ी खोल दी और पूरी नंगी हो गईं. फिर उसी साड़ी से अपने बाल सुखाने लगीं.

उनका गोरा गोरा पके फ़ल जैसा बदन मैं देखता रह गया. जगह जगह बदन थोड़ा नरम हो गया था, याने जवानी जैसा कसा हुआ नहीं था पर गजब की कोमलता थी उनके उस उमर हो चले शरीर में. दोनों उरोज छोटे छोटे पके पपीतों जैसे लटक रहे थे. पेट के आस पास मांस का मुलायम टायर बन गया था, गोरी गोरी जांघें अच्छी खासी मोटी और तंदुरुस्त थीं. जांघों के बीच के रेशम जैसे बालों के जंगल में बीच में एकाध सफ़ेद बाल भी दिख रहा था.

ताईजी ने बाल पोछ कर उन्हें एक ढीले जूड़े में बांध लिया, फिर एक चोली और साड़ी अलमारी में से निकाली. उसे लपेटते हुए मेरी ओर देखा, फिर मेरी आंखों के भाव देखे, तो साड़ी लपेटने के बाद ब्लाउज़ वैसा ही कुरसी पर रख दिया और मेरे पास आकर बैठ गईं. प्यार से मेरे बाल सहलाये. फिर मुझपर झुक कर मेरा लंबा चुंबन लिया. उनके मुलायम गीले होंठ जब मेरे होंठों से मिले और उनके मुंह का स्वाद मैंने चखा तो मन हुआ कि उनको बाहों में भींच लूं और बेतहाशा चूमूं पर हाथ बंधे होने से बस मैं चुपचाप पड़े पड़े बस उनके प्यार भरे चुम्मों के जवाब में मुझसे हो सकता था उतने चुंबन ही दे सकता था.

उहोंने मेरे होठों, गालों और आंखों के खूब सारे चुंबन लिये. जब उनके होंठ मेरे होंठों से मिलते तो मैं बड़े डेस्परेटली उनके मुख रस का पान करने लगता. मन भर के मेरे लाड़ करने के बाद वे नीचे को सरकीं. मेरी छाती और पेट का चुम्मा लिया, बोलीं "बड़ा गठीला बदन पाया है अनिल बेटा, बिलकुल मेरी लीना के जोबन के लायक है."

"जरा और ठीक से चुंबन दीजिये ना ताईजी - प्लीज़ - आप तो बस जरा सा चखाती हैं और मुंह मोड़ लेती हैं"

ताईजी बस हंसीं और फिर मेरे लंड को उंगलियों से पकड़कर इधर उधर फ़िराकर चाटने लगीं. "कितना रस लगा है अभी तक. हमारी मीनल की जवानी भी आजकल पूरे जोरों पर है, मां बनने के बाद तो और गरमा गयी है मेरी बहू, रस तो बहता ही रहता है आजकल उसके बदन से. और अभी हेमन्त भी नहीं है. आज जल्दी में ऑफ़िस गई बेचारी, नहीं तो मेरे साथ कम से कम आधा घंटा बिता कर ही जाती है बहू रानी, उसे थोड़ा शांत कर देती हूं कि ठंडे दिमाग से ऑफ़िस तो जा सके." फिर उन्होंने चाट चाट कर मेरा पूरा लंड साफ़ किया. मेरे मन में मीठी सिहरन दौड़ गयी. कभी ऐसा भी दिन आयेगा कि मेरी पूज्य सासूमां मुझे इस तरह से प्यार कर रही हॊंगी, ये साल भर पहले कोई बताता तो मैं उसे पागल कह देता. अब जिस तरह से वे मेरा लंड चाट रही थीं, बस दो मिनिट और चाटें तो मैं जरूर झड़ जाऊंगा, ये उम्मीद मन में पैदा हो गयी. अनजाने में मैंने अपनी कमर उचका कर उनके मुंह में और लंड पेलने की कोशिश की.

पर मेरा अंदाजा गलत निकला. मेरे लंड पर और मेहरबान होने के बजाय वे फिर से वापस मेरे सिर के पास आकर बैठ गयीं. उनको शायद पता चल गया था कि मैं झड़ने की कगार पर आ गया हूं. लगता है बड़ा लाड़ आ रहा था अपने जमाई पर. जैसे हम प्यार से बच्चों के गाल दबाते हैं, बस वैसे ही मेरे गाल अपनी उंगलियों से पिचकाकर मेरे सिर को इधर उधर हिला कर बोलीं "कितना प्यारा शोना मोना गुड्डा ढूंढा है मेरी लीना ने, जोड़ी लाखों में एक है. पर दामादजी, ये बताओ कि तुमको खुश रखती है ना मेरी लाड़ली? बड़ी हठीले स्वभाव की है, किसी का सुनती नहीं है यहां, एकदम लड़ियाई हुई है"

"ताईजी, मेरी लीना याने अप्सरा है अप्सरा. रोज स्वर्ग दिखाती है मेरे को" मैंने ताईजी की उंगलियों को चूमते हुए कहा जो अब तक मेरे गालों से खेल रही थीं. "और अब मुझे इस स्वर्ग में ले आयी है जहां आप और मीनल जैसी अप्सरायें और देवियां हैं. वो हमेशा बातों बातों में कहती थी कि मेरी मां और भाभी इतनी सुंदर हैं; आज देखा तब यकीन आया." उनकी सब साड़ियां शायद एकदम पतले कपड़े की थीं क्योंकि इस साड़ी के आंचल में से भी उनके प्यारे प्यारे उरोज साफ़ दिख रहे थे.

ताई जी बोलीं "मैं तो शादी के बाद से ही कह रही थी कि लीना बेटी, अब महना हो गया तेरे हनीमून को, अब तो अपने पति को लेकर आ जा हमसे मिलवाने को पर वो सिरफ़िरी लड़की कभी मानती है मेरा कहा? बोली कि अब तो दीपावली पर ही आऊंगी. तब तक अनिल सिर्फ़ मेरा है. वहां लाई तो तुम सब मिलकर उसे निचोड़ डालोगी. अब तुम ही बताओ अनिल बेटा, हमारा भी कुछ अधिकार बनता है या नहीं अपने इस सजीले जमाई पर?"

"आपका तो अब से ज्यादा अधिकार है ताई जी ... पर ममी ... ममीजी ... मुझपे जरा मेहरबानी कीजिये, मुझे पागल होने से बचा लीजिये ... मेरे हाथ खोल दीजिये ना ... लीना नहीं है तो आप ही उसकी जगह ले लीजिये. आपका जोबन देख कर सहा नहीं जा रहा, आप को कस के बाहों में लेकर प्यार करने का जी हो रहा है, लगता है इस रूप को इस लावण्य को पूरा भोग लूं ..." मैंने उनसे प्रार्थना की. मेरा लंड अब मुझे बहुत सता रहा था.

"अभी नहीं अनिल बेटा, ये छोड़ कर कुछ भी बोलो. मैंने तुम्हें खोला तो ये दोनों छोकरियां ... लीना और मीनल ... मुझे चीर फाड़ कर खा जायेंगीं. आज मीनल मुझे बार बार कह कर गयी है कि तुमको ऐसे ही बंधा रखूं. पर और कुछ मेरे करने लायक हो तो जरूर बताओ बेटे." ताईजी बोलीं. "लीना के आने तक तो कम से कम तुम्हारी तकलीफ़ शायद मैं कुछ कम कर सकूं. वैसे इन दो जवान लड़कियों के आगे भला मेरे अधेड़ बदन से क्या लगाव होगा तुम जैसे नौजवान लड़के को"

"ममीजी ... आपके ये मम्मे ... इतने प्यारे गोल कोमल स्तन ... ऐसा लगता है कि हाथ में ले लूं, कबूतर की तरह हथेली में भर लूं, हौले हौले सहलाऊं, सच में कितने मतवाले रसीले फल हैं ताई जी ... जरा ठीक से देखने दीजिये ना फिर से, आपने तो फिर साड़ी लपेट ली" मैंने शिकायत की.

"इतने भा गये बेटे मेरे स्तन तुमको!" ताईजी का चेहरे पर एक असीम सा सुख झलक उठा. "वैसे अभी तुम्हारे हाथ नहीं खोल रही मैं इसलिये मन छोटा ना करो बेटा, अभी तो दो दिन हो ना तुम, तब तक तो खूब खेल लोगे इनके साथ ... और अभी इस हाल में भी मेरे स्तन तुमको भा गये तो जवानी में मुझे देखते दामादजी तो पता चलता कि ... खैर ... अब क्या बताऊं ....लीना जैसे ही थे ... सुडौल ... भरे और तने हुए, अब उमर से लटक गये हैं थोड़े." अपना आंचल गिराते हुए वे बोलीं. उनकी नंगी गोरी गोरी चूंचियां फिर से मेरे सामने थीं.

उन मस्ताने उरोजों को हाथ में लेने के लिये मेरे हाथ नहीं खुलेंगे ये मैंने जान लिया. कसमसा कर बोला "ताईजी ... लटके भले हों पर और मीठे लग रहे हैं ... पके आमों जैसे या ज्यादा पकी हुई बिहियों जैसे .... अब हाथ में नहीं लेने देतीं ये फल तो जरा स्वाद ही चखा दीजिये ना इन आमों का ..."

"आओ ना बेटा ... मेरे सीने से लग जाओ ... भले मेरे दामाद हो पर हो तो मेरे बेटे जैसे ... एक मां अपने बेटे को सीने से तो लगा ही सकती है ..." कहकर ताईजी ने मेरे गाल थपथपाये और मुझपर झुक कर मुझे अपने सीने से लगा लिया. मेरा सिर उनकी नरम नरम चूंचियों के बीच दब गया. मैं सिर इधर उधर करके उनको चूमने लगा. ताईजी ने मेरी खटपट देखी तो अपना एक निपल मेरे मुंह में दे दिया. मैं आंखें बंद करके चूसने लगा. थोड़ी देर से उन्होंने निपल बदल दिया "अब इसे चूसो दामादजी" वे अब करीब करीब मेरे ऊपर ही सो गयी थीं. मेरे गालों पर दबा वो नरम नरम मांस का गोला खा जाने लायक था. मैंने मुंह खोला और निपल के साथ काफ़ी सारा मांस भी मुंह में ले लिया. ताईजी ने सांस ली और अपना आधा मम्मा मेरे मुंह में घुसेड़ दिया.

"बड़ा अच्छा लड़का है तू अनिल. कितने प्यार दुलार से मेरा स्तनपान कर रहा है" वे बोलीं और मेरा सिर कस के सीनेसे भींच लिया. "मुझे बड़ा अच्छा लगता है बेटा जब कोई ऐसे मेरी छाती पीता है. आखिर मां हूं ना, मां जिंदगी भर मां रहती है, भले बच्चे बड़े हो जायें"

मैं अब जोर से सांसें ले रहा था. ताईजी ने पूछा "ये ऐसे क्यों सांस ले रहे हो बेटा, आराम से तो पड़े हो बिस्तर पे. सांस लेने में तकलीफ़ हो रही है क्या ... अच्छा समझी ... मैं भी अच्छी पागल हूं कि तुम्हारा दम घोट रही हूं अपने स्तन से" मेरे मुंह से अपनी चूंची निकालकर वे बोलीं.

"आपका मम्मा क्यों मुझे तकलीफ़ देगा मांजी, मेरा बस चले तो एक साथ दोनों मुंह में भर लूं. वो तो खुशबू आई तो सूंघ रहा हूं मांजी. "

"ऐसी कौनसी खुशबू है दामादजी? मुझे तो नहीं आ रही" ताईजी फिर से अपना निपल मेरे मुंह में देने की कोशिश करते हुए बोलीं.

"गुलाब के फ़ूल को अपनी खुशबू थोड़े आती है ताईजी. एकदम खास खुशबू है, दुनिया की सबसे मादक सुगंध. ये सुगंध है कामरस की. कोई नारी बड़ी बेहाल है कामवासना से, उसकी योनि में से रस निकल रहा है जिसकी मादक खुशबू अब यहां फ़ैल गयी है? अब कौन हो सकता है ताईजी? वैसे है बिलकुल मेरी लीना जैसी खुशबू, पर वो तो यहां है नहीं" मैंने सासूमां की मीठी चुटकी लेते हुए कहा.

अब ताईजी एकदम शर्मा सी गयी "दामादजी ... अब क्या बताऊं ... मेरा हाल आज जरा ठीक नहीं है ... आजकल हेमन्त भी नहीं है ... ललित थोड़ा कच्चा पड़ता है, अभी अभी तो जवान हुआ है बेचारा ... कब से तुम्हारे आने की राह देख रही थी, अब तुम आ गये हो बेटा और ऐसे मेरी बाहों में हो तो ये शरीर आखिर मुआ कहां काबू में रहने वाला है, जरा ज्यादा ही गरमा गयी हूं मैं"

"अब ऐसे शरमाइये नहीं ताईजी ... वैसे शरमा कर आप बला की खूबसूरत लगती हैं ... भगवान करे आपके बदन से ये खुशबू हमेशा आती रहे. पर आप तो बहुत जुल्म कर रही हैं मुझपर, हाथ भी नहीं खोलतीं, मुझे अपने बदन से लिपटने भी नहीं देतीं, कम से कम चखा ही दीजिये ना ये अमरित अपने गुलाम को."

"सच चखना चाहते हो अनिल बेटे?" ताईजी ने पूछा. अब वे धीरे धीरे मेरे बदन पर पड़ी पड़ी ऊपर नीचे हो रही थीं. अपनी टांगों के बीच उन्होंने मेरी जांघ को कस के पकड़ लिया था और मेरी जांघ पर गीलापन महसूस हो रहा था.

"हां ताईजी .., आपका यह आशिर्वाद मुझे दे ही दीजिये या यूं समझ लीजिये कि भक्त प्रसाद मांग रहा है. मेरे हाथ पैर खोल दीजिये तो मैं खुद ले लूंगा, आप को तकलीफ़ नहीं होगी" मैंने एक बार फिर उनको मख्खन लगाने की कोशिश की कि शायद मान जायें.

"वो नहीं होगा जमाई राजा, ऐसे बार बार मत कहो मेरे को, लीना और मीनल तभी मुझे आगाह करके गयी थीं. मुझे भी बार बार मना करना अच्छा नहीं लगता. पर आखिर मेरे जमाई हो, दीपावली पर पहली बार घर आये हो, तुम्हारी सास होने के नाते यहां ससुराल में तुम्हारी हर इच्छा पूरी होना चाहिये, ये मेरे को ही देखना है. वैसे तुम्हारे मन की इच्छा पूरी करने के लिये हाथ खोलने की जरूरत नहीं है बेटा" ताईजी उठ कर सीधी हुईं. फिर अपनी एक टांग मेरे बदन पर रखकर बैठीं, हिल डुल कर सीधी हुईं और फिर दोनों घुटने मेरी छाती के दोनों ओर जमाकर मेरी छाती पर बैठ गयीं.

"माफ़ करना बेटा, मेरे वजन से तकलीफ़ हो रही होगी पर अब मुझे समय लगता है ऐसी कसरतें करते वक्त, पहले जैसी जवान तो हूं नहीं कि फुदक कर इधर उधर हो जाऊं. बस अभी सरकती हूं"

"मांजी, आप जनम भर भी ऐसे मेरे ऊपर बैठ जायें तो आपका वजन मैं खुशी खुशी सहता रहूंगा. पर जरा ऊपर सरकिये ना"

"समझ गयी तुम क्या कह रहे हो अनिल बेटे, बस वही कर रही हूं." कहकर ताईजी थोड़ा ऊपर होकर आगे सरकीं और अपनी साड़ी उठा ली. अब उनकी महकती बुर ठीक मेरे मुंह पर थी. मैं लेटे लेटे वो मस्त नजारा देखने लगा. काले रेशमी बालों के बीच गहरे लकीर थी और दो ढीले से संतरे की फाकों जैसे पपोटे खुले हुए थे. उनमें लाल कोमल मखमल की झलक दिख रही थी. वहां इतना चिपचिपा शहद इकठ्ठा हो गया था कि बस टपकने को था. इसके पहले कि मैं ये नजारा मन भरके देख पाऊं, ताईजी ने थोड़ा नीचे होकर अपनी चूत मेरे मुंह पर जमा दी. "लो बेटे, तुम्हारे मन जैसा हो गया ना?"

मैं लपालप उस गीले चिपचिपे रस के भंडार को चाटने लगा. फिर जीभ निकालकर उस लाल छेद में डाली और अंदर बाहर करने लगा. ताईजी अचानक अपना वजन देकर मेरे मुंह पर ही बैठ गयीं और मेरे होंठों पर अपनी चूत रगड़ने लगीं. उनकी सांस अब जोर से चल रही थी. मेरी पूरा चेहरा उस बालों से ढके मुलायम गीले मांस से ढक गया था. उन्होंने अपनी साड़ी फिर नीचे कर दी थी और अब मेरा सिर उनकी साड़ी के अंदर छिप गया था. हाथ बंधे होने से मन जैसा मैं जरूर नहीं चाट पा रहा था पर जैसा भी जम रहा था वैसा मैं मुंह मार रहा था. जब वे थोड़ी हिलीं और उनकी बुर के पपोटे मेरे होंठों से आ भिड़े तब मैंने उनके चूत ही मुंह में भर ली और कैंडी जैसा चूसने लगा. एक मिनिट में वे ’अं’ ’अं’ करके उचकने लगीं और उनकी योनि ने भलभला कर अपना ढेर सारा रस मेरे मुंह में उड़ेल दिया. फिर वे थोड़ी लस्त हो गयीं और मेरे मुंह पर थोड़ी देर बैठी रहीं. मैं लपालप उस रस का भोग लगाता रहा.

थोड़ी देर में सासूमां बोलीं "कितनी जोर से चूसता है तू बेटा! लगता है काफ़ी देर का प्यासा है. मेरे को लग रहा है जैसे किसी ने निचोड़ कर रख दिया मुझे. पर बहुत प्यारा लगा मुझे तेरा ये तरीका" फिर ताईजी उठीं और सीधी हुईं. मैंने कहा "ताईजी, एकदम अमरित चखा दिया आपने. ऐसा रस किसी फल से निकले तो उसे तो चबा चबा कर खा ही जाना चाहिये"

वे सुनने को बेताब थी हीं कि आखिर उनके दामाद को उनके बदन का रस कैसा लगा. मेरी तारीफ़ से वे गदगदा गईं "मुझे लग ही रहा था दामादजी कि अपनी सास बहुत भा गई है आपको. कितने प्यार से जीभ डाल डाल कर चाट रहे थे बेटे, लीना वैसे हमेशा तुम्हारी इस कला के बारे में फोन पर बताती थी, याने तुम जैसे स्वाद ले लेकर रस पीने वाले कम ही होते हैं. आज खुद जान लिया मैंने अपने दामाद का कौशल. कितने दिनों बाद इतना आनंद मिला है, थोड़ा हल्का लग रहा है" फिर घुटने टेक कर वे मेरे ऊपर से उठने लगीं.

मैंने कहा "ममीजी .... ऐसा जुल्म मत कीजिये ... अभी तो बस स्वाद लगा है मुंह में ... मन कहां भरा! जरा मुझे खोल देतीं तो आपकी कमर पकड़कर ठीक से चूसता"

"बस वही कर रही हूं दामादजी. याने आपका मन भर जाये इसकी व्यवस्था कर रही हूं. ऐसे मुंह पर बैठना ठीक है क्या? मेरा इतना वजन है, अपने बेटे जैसे दामाद को तकलीफ़ दी मैंने. पर क्या करूं, उमर के साथ मेरे घुटने दुखते हैं, ज्यादा देर ऐसे घुटनों पर नहीं बैठा जाता मुझसे"

"मांजी, आप दिन भर बैठें तो भी मुझे तकलीफ़ नहीं होगी, बस मुंह में ये अमरित रिसता रहे, और मुझे कुछ नहीं चाहिये. पेट भरके पीने का दिल करता है"

ताईजी मेरे ऊपर से उतर कर बाजू में बैठ गयीं. "ये लीना नहीं आयी अभी, आ जाती तो तुम्हें उसके सुपुर्द कर देती, तुमको ऐसे तड़पाना अच्छा नहीं लग रहा बेटे."

मैंने उनको समझाया "मुझे चलेगा ताईजी, बस आप ऐसे ही मेरे लाड़ करती रहें तो ये सब तकलीफ़ बर्दाश्त कर लूंगा मैं."

सासूमां बोलीं "तुम्हारे लाड़ नहीं करूंगी तो किसके करूंगी बेटा. खैर वो शैतान लड़की अभी आयेगी भी नहीं, जब ललित क्लास चला जायेगा तभी आयेगी. तब तक मैं ऐसे करवट पर सोती हूं. और तुम भी करवट पर आ जाओ अनिल. फिर आराम से चखते रहना तुम्हें जो पसंद आये"

पलंग के रॉड से बंधे मेरे हाथ उन्होंने खोले और बोलीं "अब हाथ पीछे करो बेटा"

मैं चाहता तो अब कुछ भी कर सकता था. उनको पकड़कर दबोच लेता और उनके उस गुदाज बदन को भींच कर उनको नीचे पटक कर चोद डालता तो वे कुछ कर नहीं पातीं. पर मैंने किया नहीं. अपनी सास के आगे बंधकर उनका गुलाम बनकर उनके मन जैसा करने में जो आनंद मिल रहा था वो खोना नहीं चाहता था. मैंने हाथ चुपचाप पीछे किये और ताईजी ने वे मेरी पीठ पीछे वेल्क्रो स्ट्रैप से बांध दिये. फिर पलंग के नीचे वाले रॉड से बंधे मेरे पैर खोले और उनको आपस में बांध दिया. अब मैं बंधा हुआ तो था पर पलंग पर इधर उधर लुढ़क सकता था.

"अब ठीक है. अब मैं और तुम दोनों आराम से लेट सकते हैं, और मैं तुमको जितना तुम चाहो, जितने समय तक चाहो, पिला सकती हूं." ताईजी अपनी करवट पर लेटते हुए बोलीं. करवट पर लेट कर उन्होंने साड़ी कमर के ऊपर की और एक टांग उठा दी. उनकी रसीली बुर पूरी तरह खुल कर मेरे सामने आ गयी. "मेरे प्यारे दामादजी, अब मेरी जांघ को तकिया बना कर सो जाइये. अरे ऐसे नहीं, उलटी तरफ़ से आइये, मुझे भी तो मन बहलाने के लिये कोई खिलौना चाहिये या नहीं?"

मैं उनके पैरों की ओर सिर करके लेट गया और उनकी मोटी गुदाज जांघ पर सिर रख दिया. उन्होंने मेरे सिर को पकड़कर मेरा मुंह अपनी चूत पर दबा लिया और एक सुकून की सांस ली. "अब चूसो अनिल जितना जी चाहे चूसो, ये कहने का मौका नहीं दूंगी अब कि मन भरके रस नहीं चखाया मेरी सास ने. तुम थक जाओगे पर ये रस नहीं खतम होगा." उनकी आवाज में एक बड़ा प्यारा सा गर्व था जैसा सुंदर स्त्रियों को अक्सर होता है जब वे जानती हैं कि लोग कैसे उनको देखकर मरते हैं.

मैंने मस्त भोग लगाया, बहुत देर तक ताईजी के गुप्तांग के चिपचिपे पानी का स्वाद चखा. बूंद बूंद जीभ से सोख ली, बीच बीच में मैं उनकी पूरी बुर को ही मुंह में लेकर आम जैसा चूसता. बिलकुल ऐसा लगता जैसे आम चूस रहा होऊं, उनकी झांटें मुंह में जातीं तो ऐसा लगता जैसे आम की गुठली के रेशे हों. ताईजी ने अब अपनी उठाई हुई टांग नीचे कर ली थी, आखिर वे भी कितनी देर उठा कर हवा में रखतीं. मेरे सिर को उन्होंने अपनी दोनों जांघों की कैंची में पकड़ रखा था और अपनी कमर हिला हिला कर मेरे मुंह पर स्वमैथुन कर रही थीं. मुझे लगता है कि दो तीन बार तो वे झड़ी होंगी क्योंकि कुछ देर बाद अचानक उनका बदन कड़ा हो जाता और वे ’अं’ ’अं’ करने लगतीं. मेरे मुंह में रिसने वाला पानी भी अचानक बढ़ जाता.

उधर ताईजी मेरे लंड से लगातार खेल रही थीं. उसको मुठ्ठी में भरके दबातीं, रगड़तीं, कभी सुपाड़े की तनी चमड़ी पर उंगली से डिज़ाइन बनातीं. वो तो चूस भी लेतीं या कम कम से मुंह में ले लेतीं पर मेरा बदन उनसे काफ़ी दूर था, उनकी बुर चूसने को जो आसन मैंने बनाया था, उसमें मेरी कमर उनके पास ले जाने की गुंजाइश नहीं थी, हम दोनों के बदन एक दूसरे से समकोण बना रहे थे. कभी लंड में होती मिठास जब ज्यादा हो जाती तो मैं अपनी कमर हिला कर उनकी मुठ्ठी में अपना लंड जोर से पेलने की कोशिश करने लगता. पर मेरी सासूजी होशियार थीं, पहचान लेतीं कि मैं झड़ना चाहता हूं तो लंड पर से अपना हाथ ही हटा लेतीं.

ये जुगलबंदी कितनी देर चलती क्या पता, हम दोनों इस खेल में मग्न थे. पर अचानक लीना कमरे में आयी. उसने बस अपनी एक पारदर्शक एकदम छोटी वाली स्लिप पहन रखी थी. स्लिप उसके घुटनों के भी फ़ुट भर ऊपर थी और उसकी मतवाली जांघें नंगी थीं. ऊपर स्लिप के पारदर्शक कपड़े में से उसके भरे हुए गर्व से खड़े उरोज और मूंगफलीके दाने जैसे निपलों का आकार दिख रहा था. तुनक कर वो अपनी मां से बोली "क्या मां, अभी भी लगी हुई है, मुझे लगा ही था कि एक बार शुरू होगी तो बस बंद नहीं होगा तुझसे. मीनल भाभी को जाकर भी एक घंटे से ज्यादा हो गया और तू यहीं पड़ी है. चल अब खतम कर अपने जमाई के लाड़ प्यार. वो राधाबाई आकर बैठी है, आते ही मुझे पकड़ लिया लीना बिटिया बिटिया करके, मुझे छोड़ ही नहीं रही थी, गोद में लेकर क्या क्या कर रही थी, नहीं तो मैं जल्दी आ जाती"

ताईजी ने अपनी टांगें खोलीं और मेरा सिर अपनी जांघ पर से हटाकर नीचे बिस्तर पर रखा. उठकर साड़ी ठीक करके बोलीं "अरे बेटी, तेरा ये पति ही हठ करके बैठा था, उसे के इस हठ को पूरा कर रही थी. भूखा प्यासा है वो, आखिर कब तक उसे ऐसा रखती, तुम दोनों तो गायब हो गयीं. तब तक मेरे जमाई का खयाल तो मुझे ही रखना था ना! तू जा और राधाबाईकी मदद कर, उनको कहना कि अपने लाड़ प्यार को जरा लगाम दें, पहले अनिल के लिये नाश्ता बनायें. मैं बस आती ही हूं. बेटी, अब तक तो बस अनिल की इच्छा पूरी कर रही थी, अब मेरे मन में जो आस है, उसे भी तो थोड़ा पूरा कर लूं, अनिल के साथ फिर कब टाइम मिलेगा क्या पता"

"क्यों मां? तुम सास हो उसकी, जैसा तुम कहोगी वैसा वो करेगा." कहकर लीना मेरे बाजू में बैठ गयी और मेरा चुंबन ले कर बोली "क्यों डार्लिंग? हमारी माताजी - अपनी सासूजी अच्छी लगीं? और हमारी मीनल भाभी - उनके बारे में क्या खयाल है आपना?"

मैंने कुछ नहीं कहा, बस अपनी रानी का जोर से चुम्मा लिया, उसके होंठों का स्वाद आज ज्यादा ही मीठा लग रहा था. उसने आंखों आंखों में मेरा हाल जान लिया और कस कस के मेरे चुंबन लेने लगी. उसके चुम्मों का जवाब देते देते मैंने अपनी कमर सरकाकर ताईजी के बदन से अपना पेट सटा दिया और फिर कमर हिला हिला कर अपना लंड उनकी जांघों पर रगड़ने की कोशिश करने लगा. लीना ने अपनी मां की ओर देखा और मुस्करा दी, शायद आंखों आंखों में कुछ इशारा भी किया. ताईजी फिर से बिस्तर पर मेरे बाजू में लेट गयीं और मेरा लंड अपने मुंह में ले लिया.

"चलो, अब कुछ रिलीफ़ मिलेगा मेरे सैंया को. मां को भी जल्दी हो रही है अब तुम्हारी जवानी का स्वाद लेने की. अब ये बताओ कि तुमको मजा आया कि नहीं? ऐसे खुद को बंधवा कर प्यार कराने में ज्यादा लुत्फ़ आया कि नहीं ये बोलो"

मैं धक्के मार मार के ताईजी के मुंह में लंड पेलने की कोशिश कर रहा था. वे आधा लंड मुंह में लेकर चूस रही थीं. "मेरी हालत पर से ही तुम समझ जाओ रानी कि ममीजी ने मुझे किस स्वर्ग में ले जाकर पटक दिया है. बस अब न तो सहन होता है न ये सुख झेला जाता है. पर तुम बताओ मेरी मां कि मुझे इस रेशमी जाल में फंसाकर तुम कहां गायब हो गयीं सुबह सुबह? मैं तो पागल हुआ जा रहा था यहां"

"गुस्सा मत करो मेरे राजा, मैं ललित के साथ थी. इतने दिन बाद मिली अपने लाड़ले छोटे भैया से. वो भी बस चिपक गया दीदी दीदी करके, छोड़ ही नहीं रहा था. मैंने भी उसे अच्छा कस के रगड़ा घंटे भर, तब जरा जान में जान आयी. ललित को भी क्लास में जाना था इसलिये छोड़ना पड़ा. बीच में बीस मिनिट मीनल भाभी की मदद कर रही थी ऑफ़िस जाने के लिये तैयार होने में"

"अब ये कुछ समझ में नहीं आया...याने जरा समझाओ मेरे को ... मीनल भाभी क्या नर्सरी जाती छोटी बच्ची है कि तैयार होने में, कपड़े पहनाने में, मदद करनी पड़ती है?

"कुछ भी जो मन आये वो मत बको, तुमको मालूम है कि मैं कैसी मदद कर रही थी. शादी के पहले रोज उसको कौनसी ब्रा पहननी है वो मैं ही चुन कर देती थी. उसकी सब ब्रा अधिकतर टाइट हैं, उनका बकल उससे अकेले से नहीं लगता, वो भी मैं लगाती थी, आज बड़े दिनों के बाद फिर से मैंने लगा कर दिया उसको. और उसके पहले मीनल भाभी मुझे ब्रा और पैंटी पहन पहन कर दिखा रही थी, तुमको नहीं मालूम, मैं लाई थी साथ में ब्रा पैंटी के तीन चार जोड़, उसे बहुत शौक है नयी नयी लिंगरी का, अब ब्रा पहनाते पहनाते वो मुझे बता भी रही थी कि आज कल उसके स्तनों में कितनी तकलीफ़ होती है उसको, सूजे सूजे रहते हैं हमेशा"

मैं समझ गया. अनजाने में जरा जोर से लंड फिर पेला ताईजी के मुंह में. इस बार उन्होंने मुंह खोल कर मेरा लंड पूरा ले लिया और फिर अपने होंठ मेरे लंड की जड़ पर बंद करके चूसने लगीं. मैंने हौले हौले धक्के मारना जारी रखा और लीना से बोला "वो मीनल भी कुछ कह रही थी, दूध के बारे में, सोनू को बोतल से पिला देना, फिर ये कि आज सुबह तू आई थी सबसे पहले लाइन लगाने. याने ये सब क्या चल रहा है रानी?"

"अब भोंदू मस्त बनो, सब समझते हो. मैंने भाभी की दोनों चूंचियां खाली कर दीं पेट भर के पिया, इतने दिन बाद फिर वो मीठा दूध मिला, मैं तो तरस गयी थी. वो सोनू अब एक साल की हो गयी है ना, उसको अब ऊपर का दूध चलता है, बोतल से पिला देते हैं. पर भाभी का लैक्टेशन मस्त जोरों पर है. डॉक्टर बोले कि एकाध साल और चलेगा. तब तक हम सब मिल बांट कर चख लेते हैं ये अमृत. सब ललचाते रहते हैं और सब को बस दो दो घूंट मिलता है. मैंने सोचा अब मेरी शादी हो गयी है, मायके आई हूं तो अपना हक जता लूं पहले"

ये सब सुन कर मेरा लंड ऐसा सनसनाया कि मैं कस के धक्के लगाने लगा. उधर ताईजी भी शायद अब जल्दी में थीं ऐसा मस्त जीभ रगड़ रगड़कर चूसा कि मैं एकदम से उनके मुंह में झड़ गया. इतनी देर खड़ा रहने के बाद झड़ने से वो सुख मिला कि चक्कर सा आ गया. उधर ताईजी ने मेरी कमर पकड़कर मन लगाकर मेरा लंड और उससे निकलती मलाई चूस डाली.

मेरे पूरे झड़ने तक तो लीना चुप रही, फिर तुनक कर बोली "क्या मां ... झड़ा दिया ना ... अरे और देर खड़ा रखके मजा लेनी थी. मैं तो चार पांच घंटे इसको टांग कर रखती हूं ऐसे, मिन्नतें करता है, रिरियाता है, पैर पड़ता है फिर भी नहीं मानती, क्या मजा आता है जब ये मर्द ऐसे नाक रगड़ते हैं हमारे सामने. और मेरे अनिल को भी मजा आता है इसमें. खैर तूने स्वाद तो ले लिया अपने मन का, पर मीनल भाभी ने जो इसके इस सोंटे का इस्तेमाल किया, वो तूने भी कर लेना था ना, कितना मस्त खड़ा था अनिल का."

"मुझे ऐसे ऊपर से करना नहीं जमता बेटी, ज्यादा देर ऐसे बैठो या उचको तो कमर दुखने लगती है. अच्छा, अनिल के हाथ पैर खोल देती तो वो बेचारा खुद कर देता, मुझे कुछ नहीं करना पड़ता, वो तो कह भी रहा था पर तुम दोनों जता कर गयी थीं कि उसके हाथ पैर ना खोलूं तो मैं भी क्या करती! और अब मुझपर चिढ़ रही हो" ताईजी ने थोड़ा चिढ़ कर कहा.

फ़िर मेरी ओर मुड़ कर बोलीं "वैसे अब आगे करा लूंगी जमाईजी से. मेरा हेमन्त कितनी अच्छी तरह से करता है, ललित भी सीख रहा है. वैसे ही प्यार दुलार से मेरे दामादजी भी मुझे तृप्त कर देंगे, सच कह रही हूं ना अनिल बेटा?"

"ताईजी, आप बस आज्ञा कीजिये, आप जो कहेंगी, जहां कहेंगी, जैसे कहेंगी, जितनी देर कहेंगी वैसी आपकी सेवा कर दूंगा" मैं बोला.

"चल लीना बेटी, अब अनिल को स्नान करा दें" ताईजी बोलीं. "इस बार वो दीपावली की सुबह वाला स्नान कराना रह ही गया अनिल बेटे, तुम दोनों आये ही नहीं दीपावली को. खैर अब एक हफ़्ता देर से सही, पर वो शगुन वाला स्नान तुमको कराना जरूरी है ससुराल में. वैसे बिलकुल तड़के उठाने वाली थी मीनल, पर दामादजी इतनी गहरी नींद सोये थे, वो तरस खा गयी. उसीने मेरे को कहा कि ऑफ़िस जाने के पहले जीजाजी को मैं जगा कर जाऊंगी पर उबटन लगाकर नहला तुम दोनों देना."

"मां, तुमने तो नहा लिया ना? " लीना ने पूछा.

"हां बेटी, वो पूजा करने के पहले नहाया था मैंने"

"फ़िर तुम क्यों वापस गीली होती हो? मैं स्नान करा देती हूं अनिल को"

"नहीं बेटी, मैं भी आती हूं, फिर गीली हो गयी तो क्या बड़ी बात हुई? साल में एक बार तो आती है दीपावली. और आज तो तुम दोनों की पहली दीपावली है यहां घर में, मैं तो आऊंगी" ताईजी दृढ़ निश्चय के स्वर में बोलीं. फिर वे बाथरूम में चली गयीं. "चलो, जल्दी आओ तुम दोनों, मैं हीटर ऑन करती हूं. उबटन भी मीनल बना कर गयी है"

लीना ने दो मिनिट और लाड़ प्यार किया मेरे साथ. मेरे हाथ पैर खोले और मेरे कपड़े निकाले. फिर लंड से पकड़कर मुझे बाथरूम में ले गयी. वहां मांजी गरम पानी बालटी में भर रही थीं. उन्होंने साड़ी निकाल दी थी और फिर एकदम नंगी हो गयी थीं. लीना ने अपनी स्लिप निकालकर रॉड पर टांगी और फिर मां बेटी ने मुझे नहलाना शुरू किया.

मुझे नहलाने का ये कार्यक्रम करीब बीस पच्चीस मिनिट चला. वो भी इसलिये कि राधाबाई नाश्ता बनाकर मुझे खिलाने को तैयार बैठी थीं और उनको नाराज करने का किसी का मूड नहीं था. नहीं तो जिस मूड में ये मां बेटी थीं एक घंटे में भी हमारा यह स्नान होने वाला नहीं था. पहले दोनों मिलकर मुझे नहलाने में लग गयीं. मेरे सारे बदन को उबटन लगाया गया. उबटन लगाने के लिये दोनों ने मेरे बदन के हिस्से कर लिये. लीना कमर के ऊपर मुझे उबटन लगा रही थी और ताईजी कमर के नीचे. लीना ने बस एक दो बार प्यार भरे चुंबन लेते हुए दो मिनिट में अपना काम खतम कर लिया पर मांजी बस लगी रहीं, और सब से ज्यादा वक्त उन्होंने मेरे लंड को उबटन लगाने में लगाया. चारों तरफ़ से लगाया, बार बार लगाया, घिसा, रगड़ा और खूब मला. उस चक्कर में दस मिनिट पहले ही झड़ा मेरा लंड आधा खड़ा भी हो गया.

उसके बाद मांजी लीना से बोलीं कि चल बेटी, अब तुझे नहला दूं. लीना को उबटन लगाने में मैं मदद करने लगा तो उन्होंने मुझे रोक दिया. "रहने दो ना बेटे तुम, तुम तो रोज नहाते होगे इसके साथ. आज इतने दिनों बाद बिटिया सामने है, तो मुझे जरा मन भरके उसे नहलाने दो."

लीना के पूरे बदन की उन्होंने मालिश की. स्तनों पर उबटन लगाते वक्त ताईजी उनको दबा दबाकर बोलीं "अनिल ने बड़ी मेहनत की है लगता है, देख कैसे बड़े हो गये हैं. दामादजी, इनकी बहुत खबर लेते हो लगता है?"

लीना तिरछी नजर से मेरी ओर देखकर बोली "खबर क्या लेते हैं मां, मसलते कुचलते हैं बेरहमी से, लगे रहते हैं भोंपू जैसे बजाने में" अब ये सच नहीं है, लीना के सुंदर स्तनों पर मैं फ़िदा हूं, बहुत प्यार करता हूं उनको पर उसका ये मतलब नहीं है कि उनको मसलता कुचलता रहता हूं. हां पर कभी कभी मस्ती में आकर उनको पूरा पूरा भोगने का मन तो होगा ही ना!

मेरी ओर देखते हुए ताईजी हंस कर बोलीं "है ही मेरी बिटिया इतनी सुंदर, फिर क्यों वो पीछे ना लगे इनके" उसके बाद वे लीना के पेट और जांघों पर उबटन लगाने लगीं. जब उनका हाथ लीना की बुर पर चलने लगा तो लीना ने ’अं’ करके अपनी टांगें आपस में चिपका लीं और अपनी मां का हाथ अपनी जांघों के बीच जकड़ लिया. ताईजी ने हाथ वैसे ही रहने दिया पर जब मैंने ठीक से देखा तो उनकी एक उंगली लीना की बुर की लकीर में आगे पीछे हो रही थी. दो मिनिट लीना वैसे ही रही, फिर अचानक अपनी मां से लिपट गयी और चूमने लगी. मैं समझ गया कि मेरी रानी साहिबा के बुर ने एक झड़ास का मजा तो ले लिया है.

लीना फिर मां से अलग हुई और बोली "चलो मां, अब तुम्हें नहला दें"

ताईजी नखरा करने लगीं "अब मैं क्या छोटी हूं जो मुझे नहलाओगे, ये दीपावली का स्नान तो बड़ी औरतें अपने से छोटों को कराती हैं"

"अब फालतू नखरे मत दिखा मां. मुझे याद है कि पिछले साल मीनल भाभी ने तुमको नहलाया था. अच्छा घंटे भर चल रहा था नहाना, जब मैं बुलाने आयी तब उसने नहलाना और तुमने नहाना छोड़ा था"

अब सासूमां एकदम शर्मा गयीं. झेंप कर बोली "अब मेरी बहू जिद कर रही थी तो कैसे मैं मना करती"

"तो आज तुम्हारे बेटी और दामाद जिद कर रहे हैं. अनिल डार्लिंग, आ जाओ और मेरी मदद करो" लीना मांजी के हाथ पैरों को उबटन लगाने लगी, मौके की जगहें मेरी रानी ने मेरे लिये छोड़ दी. मैंने उनकी छाती से ही शुरुआत की. मुठ्ठी भरके उबटन लिया और उनके उन मुलायम स्तनों को चुपड़ने लगा. पहली बार सासूमां की चूंचियों को मैं हाथ लगा रहा था, अब तक तो सिर्फ़ मुंह लगा पाया था. मैंने ठीक से पूरे उरोजों को उबटन लगाया.

"बस हो गया? इतनी जल्दी? अरे जरा ठीक से मलो ना. कैसे दामाद हो, अब अपनी सास की सेवा का मौका मिला है तो ठीक से मन लगा कर तो करो" लीना ने मेरे को ताना मारा. "और छातियों के बीच भी लगाओ, छातियों को अलग करके" लीना ने हुक्म दिया. मांजी के उन मुलायम मांस के गोलों को मैं अब दबाने और मसलने लगा. उन्हें एक हाथ से अलग किया और उनके बीच उबटन लगाया. फिर दोनों हाथेलियों में एक एक चूंची भरके कायदे से उनको मसलने लगा. ताईजी बस आंखें बंद करके ’सी’ ’सी’ करती हुई आनंद ले रही थीं. थोड़ी देर बाद आंखें खोल कर लीना से बोलीं "बेटी, अब पता चला कि शादी के बाद तेरी छाती इतनी कैसे भर आयी है"

उसके बाद लीना अपनी मां की पीठ मलने लगी और मैं उनके पैरों और जांघों पर आ गया. उन भरी हुई मोटी जांघों की मालिश की और फिर उनके बीच हाथ रखकर घुंघराले रेशमी बालों से भरे उस खजाने में उबटन चुपड़ने लगा. उबटन की स्निघ्धता के साथ साथ मुझे ताईजी के खजाने के अंदर के भाग की चिपचिपाहट महसूस हो रही थी. मैंने लीना ने किया था वैसे ही उंगली बुर की खाई में चलाने लगा. उंगली जब आगे पीछे चलती थी को एक कड़क चना सा उंगली पर घिसता महसूस होता था. ताईजी ने आंखें बंद कीं और चुपचाप बैठी रहीं, बस अपनी जांघें सटा लीं और मेरे हाथ को उनमें पकड़ लिया. लीना ने इशारा किया कि बहुत अच्छे, चलने दो ऐसा ही.

थोड़ी देर बाद ताईजी का बदन थोड़ा अकड़ सा गया और फिर दो मिनिट में उन्होंने आंखें खोलीं. बड़ी संतुष्ट लग रही थीं. लीना बोली "देख तेरे दामाद ने कितने अच्छे से उबटन लगाया तेरे को"

ताईजी कुछ बोली नहीं बस मुस्करा दीं. फिर उन्होंने मग से मेरे ऊपर पानी डालना शुरू किया, हम तीनों ने नहाया और तौलिये से एक दूसरे का अंग पोछने लगे.

मैंने अपना तना लंड लीना को दिखाया और इशारों में पूछा कि अब क्या करूं इसका? मांजी की ओर इशारा करके आंखों आंखों में पूछा कि चढ़ जाऊं क्या तो लीना ने आंखें दिखा कर मुझे डांट दिया.

हम बाहर आये तो मांजी बोलीं "बेटी जरा मेरी एक साड़ी और चोली दे दे उस अलमारी से. वो जा कर देखती हूं कि राधाबाई ने कैसा नाश्ता बनाया है"

"क्या मां तू भी! अब उसके लिये तेरे को कपड़े पहनने की क्या आ पड़ी? वहां राधाबाई ही तो है सिर्फ़ किचन में, घर में और कोई नहीं है. और राधाबाई तो घर की ही हैं ना, उनके सामने कैसी शरम? ऐसे ही चली जाओ"

"अरे ऐसे ही बिना कपड़ों की गयी तो मेरे को पकड़कर बैठ जायेगी बाई, फिर कब छोड़ेगी क्या पता, अब मेरे से उनकी इतनी पुरानी ... याने ... पहचान है कि मना भी नहीं कर सकती. इसलिये बेटी, साड़ी दे दे जल्दी से, और वो सफ़ेद वाली ब्रा और पैंटी भी"

लीना जाकर मां के कपड़े ले आयी. पहनाने में भी मदद की, खास कर ब्रा. ब्रा पहनाते पहनाते लीना ने अपनी मां के स्तन हाथ में लिये और दबा कर देखे, फिर झुक कर निपल भी चूस लिया कुछ देर. फिर सीधी होकर बोली "मां, कितनी नरम और मांसल हो गयी है तू, लगता है तेरा वजन थोड़ा बढ़ गया है"

"हां बेटी, वो क्या है कि महने भर से हमारा वो महिला मंडल भी बंद है, पैदल जाती आती थी तो चलना हो जाता था, वो बंद हो गया"

"चलेगा अम्मा, फ़िकर मत कर, हमें तू ऐसी ही गोल मटोल अच्छी लगती है गुड़िया जैसी" लीना प्यार से बोली.

कपड़े पहनकर ताईजी बोलीं. "लीना, तुझे मार्केट जाना था ना? जा हो आ, तब तक मैं अनिल के नाश्ते का देखती हूं"

लीना उत्सुकता से बोली "मां, मैं भी रुकती हूं, मार्केट बाद में चली जाऊंगी. आज राधाबाई ने वो स्पेशल वाली गुझिया बनाई होगी ना अनिल के लिये?" फिर मेरी ओर मुड़कर बोली "डार्लिंग, राधाबाई क्रीम रोल जैसे लंबी लंबी गुझिया बनाती है, एकदम ए-वन. और मूड में हों तो शहद लगाकर देती हैं खाने को"

"शहद?" मैं चकरा गया.

"शहद, चासनी, घी कुछ ऐसा ही समझ लो. क्यों मां?" लीना ने अपनी मां से पूछा. चेहरा भले ही भोला भाला बनाकर बोल रही थी मेरी लीना पर न जाने मुझे क्यों लगा कि ये जो कह रही है उसमें जरूर कोई शैतानी भरी हुई है.

पर ताईजी ने लीना को अब भगाया. करीब करीब धक्का मार कर बाहर निकाला. "अब तू जा, अनिल को मत सता. राधाबाई ने कहा है ना कि वो खुद अनिल को नाश्ता करवायेंगी. तुझे मालूम है कि उन्हें ऐसे वक्त साथ में कोई हो यह जरा नहीं गवारा होता."

लीना जरा तनतनाती ही गई, जाते वक्त मुझे जीभ निकाल के चिढ़ा कर गई. मांजी ने उसकी ओर अनदेखा करते हुए वो वेल्क्रो स्ट्रैप हाथ में उठाये. मुझे लगा कि वे वापस रखने के लिये ले जाएंगी. पर वे मेरे पास आईं और मुझे कहा "चलिये दामादजी ... हाथ पीछे कीजिये"

मैं चकरा गया, हाथ पीछे करते हुए बोला "अभी भी ये खेल शुरू है ताईजी? मुझे लगा कि अब नाश्ता करते वक्त कम से कम मेरे हाथ खुले रहेंगे. और वो ... याने लीना ने मेरे कपड़े नहीं दिये सूटकेस में से, अब मैं ऐसा ही नंगा कैसे ..."

"चलता है बेटा, अब यहां हो तबतक शायद ही तुमको कपड़े पहनने का मौका मिले, हां बाहर जाना हो तो ठीक है. और नाश्ते की चिंता मत करो, उसके लिये तुमको कोई कष्ट नहीं करना पड़ेगा बेटे, राधाबाई प्यार से अपने हाथ से और ... याने खुद नाश्ता करवा देंगी तुमको. वे भी तो आस लगाये बैठी थीं कि लीना कब तुमको लेकर आती है."

मेरे हाथ पीछे करके उन्होंने बांध दिये और फिर मुझे पलंग पर बिठा दिया. मुझे लगा कि वे अब जायेंगी पर वे मेरे पास बैठ गईं. उसके बाद दस मिनिट तक मेरा लाड़ प्यार चलता रहा. मेरे चुंबन लिये, मेरे लंड को मुठ्ठी में लेकर सहलाया, ऊपर नीचे किया, थोड़ा चूसा भी. आखिर जब तन्नाया हुआ लंड लेकर मैं उठने लगा तो मुझे बिठा कर वे बोलीं "अब बंद करती हूं बेटा नहीं तो बैठी ही रहूंगी, तुमको छोड़ने का दिल नहीं करता. तुम यहीं बैठो बेटे, मैं राधाबाई को भेजती हुं. वो क्या है कि उनका ये स्पेशल नाश्ता खाने के पहले ऐसे मूड में आना जरूरी है, उससे स्वाद दुगना हो जाता है. वैसे खाना भी राधाबाई बहुत अच्छा बनाती है. आज जरा देर हो गयी बेटा नाश्ते में, वो लीना के साथ जरा देर लगायी राधाबाई ने, बहुत दिनों से मिली ना, लीना पर उनका खास प्यार है बचपन से"

ताईजी ने एक बार फिर मुझे आराम से बैठे रहने को कहा और कमरे के बाहर जाने लगीं.

मैंने उनसे कहा "ताईजी ... मुझे अकेला मत छोड़िये ... आप भी रहिये ना यहां" न जाने क्यों राधाबाई के बारे सुन सुन कर में मेरे मन में एक मीठी सी दहशत पैदा हो गयी थी.

"घबराओ नहीं अनिल बेटे." ताईजी बोलीं "राधाबाई भी तो अकेली ही आयेगी. अपनों के बहुत लाड़ प्यार करती है. और तुम्हारी तो कब से राह देख रही हैं वे, आखिर लीना पर उनकी बचपन से खास मर्जी है"

ताईजी जाने के बाद पांच मिनिट में राधाबाई आईं. उन्होंने एक गाउन पहन रखा था. शायद मीनल का होगा इसलिये बहुत टाइट सा था. अच्छी ऊंची पूरी थीं, खाये पिये तंदुरुस्त बदन की. सांवली थीं पर खास दमक थी चेहरे पर. माथे पर बड़ी सी बिंदी थी और गले में सोने की काले मणियों वाली माला. हाथों में खूब सारी चूड़ियां पहने थीं. दिखने में ठीक ठाक ही थीं पर होंठ बड़े रसीले थे, थोड़े मोटे और फ़ूले हुए, बिना लिपस्टिक के भी एकदम गुलाबी थे.

मेरी ओर उन्होंने पैनी नजरों से देखा और फिर बोलीं "दामादजी, भूख लगी होगी ना?"

"हां राधाबाई, सुबह से भूखा हूं यहां अपनी ससुराल में, वैसे भी और वैसे भी. याने बिलकुल भूखा नहीं हूं, ताईजी और मीनल भाभी आकर दिलासा बंधा कर गयीं पर किसी ने ठीक से पूरा तृप्त नहीं किया मेरे को. देखिये ना ऐसे बंधा हुआ हूं सुबह से"

"नाराज न होइये दामादजी, मैंने भी मालकिन से कहा था कि जरा भूखे भूखे रखना उनको, तब तो नाश्ते का असली स्वाद आयेगा. और मैंने ठान रखी थी कि तुमको अपने हाथ से नाश्ता कराये बिना नहीं जाऊंगी गांव, असल में मुझे कल ही जाना था पर रुक गयी जब ये पता चला कि लीना अपने पति के साथ आ रही है. अब शाम को जाऊंगी" वे मेरे पास आकर बैठीं और मेरे बदन पर हाथ फ़ेरने लगीं. मेरी छाती, बाहें और जांघों पर हाथ फ़िराया. बोलीं "बड़े सजीले हो बेटा, मेरी लीना को ऐसा ही मर्द मिलना था."

उठ कर राधाबाई गाउन निकालने लगीं. "बस दो मिनिट जमाईराजा. जरा तैयारी कर लूं तुम्हें कलेवा कराने की." गाउन निकाल कर उन्होंने बाजू में रख दिया. अंदर वे ब्रा वा कुछ नहीं पहनी थीं, हां पैंटी जरूर थी. एकदम भरा हुआ बदन था उनका, हाथ लगाओ उधर नरम नरम माल! ये बड़ी बड़ी छतियां, एक हथेली में न समायें ऐसी. ये मोटी मोटी केले के पेड़ के तने सी सांवली चिकनी जांघें. "चलो उठो बेटा" उन्होंने कहा. मैं चुपचाप उठ खड़ा हुआ छोटे बच्चे जैसा, उनके भरे पूरे बदन के आगे मैं बच्चे जैसा ही महसूस कर रहा था.

"आओ और मेरी गोद में बैठो. मेरे लिये तो तुम इन सब बच्चों जैसे ही बच्चे हो लाला. शादी में नहीं थी मैं नहीं तो गोद में लेकर तुम दोनों को शक्कर तो खिलाती जरूर. अब लीना नहीं है अभी, पर तुमको मैं अपने हाथ से प्यार से खिलाऊंगी."

मुझे उन्होंने किसी छोटे बच्चे की तरह अपनी गोद में बिठा लिया और फिर मेरे गाल पिचका कर बोलीं. "बड़ा प्यारा गुड्डा पाया है लीना बेटी ने. इस गुड्डे से ठीक से खेलती है कि नहीं मेरी बच्ची दामादजी?"

मैं बोला "बहुत खेलती है राधाबाई, मैं थक जाता हूं पर वो नहीं थकती"

"है ही हमारी बेटी ऐसी खिलाड़ी! मैं तो बचपन से मना रही थी कि उसे उसके रूप की टक्कर का जवान मिले ..." मेरे लंड को मुठ्ठी में पकड़कर दबाती हुई बोलीं "एकदम बांस सा कड़क है ... उसके लायक. अब बेटा देखने में तो गुड्डा अच्छा है हमारी बिटिया का और बहुत मीठा भी लगता है, पर देख के स्वाद कैसे पता चलेगा? स्वाद लेना पड़ेगा कि नहीं?"

"हां बाई ... वो ... तो ..." राधाबाई ने मेरे मुंह पर अपने होंठ रखकर मेरी बोलती बंद कर दी और मेरा चुंबन लेने लगीं. थोड़ी देर मेरे होंठ चूसे, फिर बोली "मीठे मीठे हो जमाई राजा. अब बाद में जरा ठीक से चखूंगी पर अब तुमको नाश्ता करा दूं, तुमको और ज्यादा भूखा रखकर पाप नहीं सर लेना मेरे को. ये लो ..."

उन्होंने एक चकली मेरे को खिलाई और फिर चम्मच से हलुआ खिलाने लगीं. एकदम मस्त हलुआ था, घी और बादाम से सराबोर. मैं खाने लगा.

"अच्छा है ना दामादजी?" उन्होंने पूछा. मेरे मुंह में हलुआ भरा था इसलिये मैंने हाथ से इशारा किया कि एकदम फ़र्स्ट क्लास!

वे मुस्करा कर बोलीं "वो क्या है बेटा, जल्दी जल्दी में बनाया इसलिये खुद चख नहीं पायी कि कैसा बना है" उन्होंने मेरे सिर को पकड़कर पास खींचा और मेरे मुंह पर मुंह रख दिया. जबरदस्ती मेरा मुंह अपने होंठों से खोल कर उन्होंने मेरे मुंह में का हलुआ अपने मुंह में ले लिया और खाने लगीं. "हां अच्छा है बेटा. वैसे अच्छा बना होगा पर शायद तेरे इस प्यारे प्यारे मुंह का स्वाद लगकर और मीठा हो गया है ..."

वे प्यार से मेरे को हलुआ खिलाती रहीं. बीच में मैंने पूछा "बाई, वो लीना कह रही थी कि आप गुझिया बड़ा अच्छा बनाती हैं, जरा खिलाइये ना, यहां प्लेट में तो दिख नहीं रहा है"

"चिंता मत करो दामादजी, खास बनाई हैं आप के लिये. धीरज रखो. ये लीना बिटिया भी बड़ी शैतान है, मैंने जताया था उसको कि आप को कुछ ना कहे इस बारे में पर वो सुनती है कभी किसी की? ये लो हलुआ और लो"

"नहीं राधाबाई .... बहुत खा लिया"

"फ़िर लड्डू खाओ बेटा ... कम से कम एक तो चखो" उन्होंने प्लेट में से एक लड्डू लेकर अपने होंठों में दबा लिया और प्यार से मेरे मुंह के पास अपना मुंह ले आयीं. फिर हथेली में लंड ले कर ऊपर नीचे करने लगीं. मैंने उनके मुंह से मुंह लगाकर अपने दांतों से आधा लड्डू तोड़ा और खाने लगा.

राधाबाई जो नाश्ता मुझे करा रही थीं, वह बहुत स्वादिष्ट था. मेरी सास सच बोली थीं कि वे खाना अच्छा बनाती हैं. पर उससे ज्यादा जो गजब का स्वाद मुझे आ रहा था, वो नाश्ता कराने के इस उनके अनूठे ढंग का था. मैं जब तक आधा लड्डू खा रहा था, राधाबाई ने बचा हुआ लड्डू अपने मुंह में ही रखा. फिर अपने मुंह से सीधे मेरे मुंह में दे दिया. मेरा सिर उनकी बड़े बड़े छातियों पर तकिये जैसा टिका हुआ था. उनके कड़े तन कर खड़े निपल मेरे गालों पर चुभ रहे थे. मेरे लंड को वो इतने मस्त तरीके से मुठिया रही थीं कि अनजाने में मैं ऊपर नीचे होकर उनकी हथेली को चोदने की कोशिश करने लगा. थोड़ा सिर तिरछा करके मैंने उनके बड़े बड़े मम्मों का नजारा देखा और मन में आया कि लड्डू खाने के पहले इन मम्मों का स्वाद ले लेना था.

मेरे मुंह का लड्डू खतम होने के बाद राधाबाई ने अपने मुंह में पकड़ रखा आधा लड्डू भी एक चुम्मे के साथ मेरे मुंह में दे दिया. अब मुझे बस यही सूझ रहा था कि उनको चोद डाला जाये, लंड इतना मस्त खड़ा था कि और कुछ करने का सबर नहीं बचा था.

पर राधाबाई तैयार हों तब ना. लड्डू खतम होते ही मैं उठने लेगा तो मुझे पकड़कर उन्होंने वापस गोद में बिठा लिया और एक निपल मुंह में ठूंस दिया "इतनी जल्दी क्यों कर रहे हो बेटा? तब से देख रही हूं कि बार बार मेरी छतियों पर निगाह जाती है तुम्हारी. अच्छी लगीं तो चूस लो ना, मेरे लिये तो खुशी की बात है"

मैं आराम से मम्मे चूसने लगा. मन में आया कि ऐसे सूखे चूसने के बजाय इनमें कुछ मिलता तो मजा आता.

लगता है राधाबाई को मेरे मन की बात पता चल गयी क्योंकि प्लेट नीचे रखकर बोलीं " बेटा, असल में तेरे को दूध पिला सकती तो मुझे इतना सुकून मिलता कि ... पांच साल पहले भी आते तो पेट भरके स्तनपान कराती तुमको. लीना बिटिया को तो कितना पिलाया है मैंने. स्कूल और कॉलेज जाने के पहले और कॉलेज से आकर मेरे पास आती थी वो. उसमें और ललित में तो झगड़ा भी होता था इस बात को, ललित को तो बेचारे को मारकर भगा देती थी वो. फिर मैंने दोनों का टाइम बांध दिया, सुबह लीना और शाम को ललित"

मेरा लंड अब मस्त टनटना रहा था. उसको मुठ्ठी में पकड़कर दबाते हुए राधाबाई ने ऊपर नीचे करके सेखा और बोलीं. "इसका भी तो स्वाद चखना है मेरे को. पर दामादजी, अभी काफ़ी टाइम है अपने पास, इसीलिये मैंने मालकिन को कहा था कि मुझे कम से कम एक घंटा लगेगा दामादजी को ठीक से दीवाली का नास्ता कराने में. अब गुझिया खा लो पहले, याने नाश्ते का काम मेरा खतम. फ़िर आराम से जरा लाड़ प्यार करूंगी आपके"

मुझे बाजू में करके राधाबाई खड़ी हो गयीं और जाकर कुरसी में बैठ गयीं. फ़िर अपनी पैंटी निकाली और पैर एक दो बार खोले और बंद किये. मैं देख रहा था. एकदम मोटी फ़ूली हुई चिकनी बुर थी. बाल साफ़ किये हुए थे. मुझे तकता देख कर बोलीं "अब ऐसे घुघ्घू जैसे क्या देख रहे हो बेटे? गुझिया चाहिये ना? फ़िर आओ इधर जल्दी"

"पर गुझिया किधर है राधाबाई? दिख नहीं रही" मैंने कहा जरूर पर अब तक मैंने ताड़ लिया था कि राधाबाई अपनी वो फ़ेमस गुझिया कैसे लाई थीं मुझे चखाने को. उनकी इस रंगीन तबियत को मेरे लंड ने उचक कर सलामी दी.

"ये क्या इधर रही. एक नहीं दो लाई हूं" अपनी जांघें फैला कर उंगली से अपनी चूत खोल कर राधाबाई बोलीं. मैं उनके सामने नीचे उनके पैरों के बीच बैठ गया और मुंह लगा दिया. हाथ बंधे थे इसलिये जरा ठीक से मुंह नहीं लगा पा रहा था, नहीं तो मन हो रहा था कि उनकी कमर पकड़कर अपना मुंह ही घुसेड़ दूं उस खजाने में.

पर राधाबाई ने मेरी मुश्किल आसान कर दी. मेरे सिर को पकड़कर मेरा मुंह अपनी बुर पर दबा लिया "ललित को तो बहुत अच्छी लगती है. कहता है कि बाई, तुम्हारे घी में सनी गुझिया याने क्या बात है. अब इतनी बार सब को खिलाना पड़ता है इसलिये बाल साफ़ रखती हूं नहीं तो मुंह में आते हैं. अब खाने में बाल तो अच्छे नहीं लगते ना!"

राधाबी की चूत में से गुझिया निकलने लगी. उन्होंने उसे क्रीमरोल के शेप में बनाया था. "इसको ऐसा लंबा केले जैसा बनाती हूं बेटे, नहीं तो वो गोल गुझिया अंदर जाती नहीं ठीक से. वैसे ललित को केले खाना भी बहुत अच्छा लगता है इसी तरह से"

मैंने मन लगाकर उस दावत को खाया. गुझिया वाकई में बड़ी थी, और ऊपर से राधाबाई की बुर के चिपचिपे घी से और सरस हो गयी थी. एक खतम करने के बाद मैं मुंह हटाने वाला था कि दूसरी भी बाहर निकलना शुरू हो गयी. मैंने मन ही मन दाद दी, क्या कैपेसिटी थी इस औरत की.

"अच्छी लगीं दामादजी?"

"एकदम फ़ाइव स्टार राधाबाई. अच्छा ये बताइये कि इतनी देर आपके घी में डूबने के बाद भी अंदर से इतनी कुरकुरी हैं? इतनी देर अंदर रहकर तो उनको नरम हो जाना था?"

"वो कितनी देर पहले अंदर रखना है, इसका अंदाजा अब मेरे को हो गया है. कम देर रखो तो ठीक से स्वाद नहीं लगता, ज्यादा रखो तो भीग कर टूटने लगती हैं. आज तो मैंने बिलकुल घड़ी देख कर टाइम सेट किया था. वैसे केले हों तो टाइम की परवा नहीं होती. मैं तो चार चार घंटे केले अंदर रखकर फ़िर ललित को खिलाती हूं"

मुझे ललित से, अपने उस साले से जरा जलन हुई. क्या माल मिलता था उसको रोज. वैसे राधाबाई की रंगीन तबियत देखकर ये भी अंदाजा हो गया था कि वे पूरा वसूल लेती होंगी ललित से.

गुझिया निकलने के बाद अब उनकी बुर से रस टपक रहा था. मैंने भोग लगाना शुरू कर दिया. राधाबाई एकदम खुश हो गयीं. मेरा सिर पकड़कर मुझसे ठीक से चूत चटवाते हुए बोलीं. "शौकीन हो बेटे, बड़ी चाव से चख रहे हो. मुझे लगा था कि गुझिया खतम होते ही मेरे ऊपर चढ़ने को बेताब हो जाओगे"

"बाई, ये घी तो असला माल है, इसको और मैं छोड़ूं! वैसे आप ठीक कह रही हैं, मन तो होता है कि आप पर चढ़ जाऊं और पटक पटक कर ... याने आपके इस खालिस बदन का मजा लूं पर आप जो ऐसे मुझे हाथ बांधकर तड़पा रही हैं ... उसमें भी इतनी मिठास है कि ..." राधाबाई ने मेरा मुंह अपनी बुर में घुसेड़कर मेरी आवाज बंद कर दी और आहे पीछे होकर मेरे मुंह को चोदने लगीं. उनकी सहूलियत के लिये मैंने अपनी जीभ अंदर दाल दी. "ओह .. हाय राम ... मर गई मैं ..." कहकर उन्होंने अपना पानी मेरे मुंह में छोड़ दिया.

थोड़ी देर तक वे दम लेने को बैठी रहीं, फ़िर मुझे उठाकर बिस्तर पर ले गयीं "सचमुच रसिया हो बेटे, इतने चाव से बुर का शहद चाटते हो. असली मर्द की पहचान है यह कि बुर का स्वाद उसको कितना भाता है. चलो, तुमको जरा आराम से चटवाती हूं. और मुझे भी तो ये गन्ना चूसना है"

"राधाबाई ... अब तो इस दास के हाथ खोल दीजिये. आपके इस गदराये बदन को बाहों में भींचना चाहता हूं. आपको पकड़कर फ़िर कायदे से आपका रसपान करूंगा, अब रसीला आम चूसना हो तो हाथ में तो लेना ही पड़ता है ना"

"बस, अभी छोड़ती हूं बेटा, बोलते बड़ा मीठा हो तुम" राधाबाई ने मेरे हाथ खोले और उलटी तरफ से मुझे अपने नरम नरम गद्दे जैसे बदन पर सुला लिया. मैंने उनके बड़े बड़े गुदाज चूतड़ बाहों में भरे और सिर उनकी जांघों के बीच डाल दिया. राधाबाई ने मेरा गन्ना निगला और दोनों शुरू हो गये. पांच मिनिट में मुझे घी और शहद मिल गया और उनको क्रीम.

हांफ़ते हुए हम कुछ देर पड़े रहे. फ़िर उठ कर मैं सीधा हुआ और बाई से लिपट गया. "बाई, पहले ही हाथ खोल देतीं तो गुझिया खाने में आसानी नहीं होती मेरे को?"

"नहीं दामादजी, बल्कि जल्दबाजी में मजा किरकिरा हो जाता. मेरे को मालूम है, सब मर्द कैसे हमेशा बेताब रहते हैं, इस गुझिया का असली मजा वो धीरे धीरे खाने में ही है. मेरे को भी ज्यादा मजा आता है और खाने वाले को भी. इसलिये तो हाथ बांधना चालू किया मैंने. सब को बता रखा है कि गुझिया खाना हो, तो हाथ बंधवाओ. खाने वाले को अपने होंठों से मेरी चूत खोलनी पड़ती है, उसमें मुंह डाल कर जीभ से गुझिया का सिरा ढूंढना पड़ता है, फ़िर दांत में पकड़ पकड़कर उसे धीरे धीरे बाहर खींचना पड़ता है, मुझे क्या सुख मिलता है, आप को नहीं मालूम चलेगा" फ़िर वे बेतहाशा मेरे चुंबन लेने लगीं. चूमा चाटी करके फ़िर एक निपल मेरे मुंह में दिया और मुझे कसकर सीने से लगा लिया.

दो मिनिट में मुझे नीचे सुलाकर वे मेरी कमर के पास बैठ गयीं. मेरा मुरझाया शिश्न हाथ में लेकर बोलीं "जाग रे मेरे राजा, तेरा असली काम तो तूने अब तक किया ही नहीं, जब तक नहीं करेगा, तब तक तेरे को नहीं छोड़ूंगी"

"बाई, वो बेचारा दो बार मेहनत कर चुका है सुबह से. अब थोड़ा टाइम तो लगेगा ही. पर आप तब तक मेरे साथ गप्पें मारिये ना, आपकी बातें सुनने में बड़ा मजा आता है. कोई अचरज नहीं कि लीना को आप से इतनी मुहब्बत है"

"वो तो है. पर बेटा, एक बात कहूंगी, तुम बिलकुल वैसे निकले जैसा मेरे को लगता था. लीना के बारे में हमेशा मुझे चिंता लगी रहती थी. उसे रूप की गर्मी सहन कर सके ऐसा मरद मिले ये मैं मनाती थी. अब देखो कितनी खुश है. और तुम इसकी चिंता ना करो" मेरे लंड को पकड़कर वे बोलीं. "इसको मैं देखती हूं, मेरी स्पेशल मालिश शुरू होने दो, तुरंत जाग जायेगा बदमाश"

मुझपर झुक कर उन्होंने मेरी लुल्ली अपनी उन बड़ी बड़ी छतियों के बीच दबा ली और फ़िर खुद अपनी चूंचियों को भींच कर ऊपर नीचे करते हुए मेरे लंड की मालिश करने लगीं. जब लंड ऊपर होता तो बीच बीच में जीभ निकालकर सुपाड़े को चूम लेतीं या जीभ से रगड़तीं. मैंने हाथ बढ़ाया और उनकी बुर में दो उंगलियां डाल कर घुमाने लगा. अभी भी घी टपक रहा था, आखिर एक बढ़िया कुक थीं वे.

उन मुलायम गुब्बरों ने मेरे लंड को पांच मिनिट में कड़क कर दिया. "देखिये दामादजी, जाग गया ना? अब इसे जरा मेहनत कराइये, बहुत देर सिर्फ़ मजा ले रहा है ये" वे बिस्तर पर लेट गयीं और मुझे ऊपर ओढ़ लिया.

उनके गरम घी के डिब्बे में अपना बड़ा चम्मच डालता हुआ मैं बोला "बाई, मेरे को लगा कि तुम भी मेरे को लिटाकर ऊपर से चोदोगी. आज सब मेरे साथ यही कर रहे हैं. हाथ पैर बांधकर डाल देते हैं और मुझपर चढ़ कर चोद डालते हैं, जैसी चाहिये वैसी मस्ती कर लेते हैं"

"अब नाराज ना हो बेटा, ये सब तुम्हारे भले के लिये ही किया है उन्होंने. तुमको सांड जैसे खुला छोड़ देते तो अब तक चार पांच बार झड़कर लुढ़के होते कहीं. उसके बाद वे क्या करते? मेरे नाश्ते का क्या होता? तुमको दिन भर मजा लूटना है बेटा, इसलिये सब्र करना जरूरी है. वैसे मैं तुमपे चढ़ भी जाती तो ये मुआ बदन मेरे को ज्यादा देर कुछ करने देता? थक कर चूर हो जाता"

"अपने बदन को भला बुरा मत बोलो बाई. मस्त भरा पूरा मांसल मुलायम मैदे का गोला है. इसको बाहों में लेने वाले को स्वर्ग सुख मिलता है" मैंने धीरे धीरे लंड उनकी बुर में चलाते हुए तारीफ़ की.

"आपको अच्छा लगेगा अनिल बाबू ये मेरे को विश्वास था, आखिर इस घर में मेरे जो सब चिपकते हैं उसकी कोई तो वजह होगी. पर सच में बेटा, आज कल मेरा सांस फूल जाती है इसलिये जवानी जैसी चुदाई अब कहां कर पाती हूं, तब देखते, एक एक को पटक कर ऐसी रगड़ती थी मैं ... खैर जाने दो बेटा, अब तुम मेरे को अपनी जवानी दिखाओ, चोद डालो हचक हचक कर ... मैं तो राह ही देख रही थी अपने जमाई राजा की" मुझे नीचे से कस के बाहों में बांधती राधाबाई बोलीं. "वो बात क्या है बेटा, अभी यहां ज्यादातर सब औरतें ही हैं. वैसे वे सब भी मेरा बहुत खयाल रखती हैं, मेरे अंग लगती हैं मेरे को दिलासा देने को, मीनल बिटिया तो आफ़िस जाने के पहले पंधरा मिनिट मुझे अपने कमरे में बुलाती ही है, मालकिन तो हमेशा ही रहती हैं घर में, हर कभी मेरे साथ लग जाती हैं, अब लीना बिटिया आ गयी है तो वो तो मेरे को छोड़ती ही नहीं. पर बुर रानी की कूट कूट कर ठुकाई करने के लिये सोंटा चाहिये, वो कहां से आयेगा. अब हेमन्त भैया भी बाहर रहे हैं इतने दिनों से. और मेरी इस बेशरम चूत को तो आदत है कि दो तीन घंटे ठुकाई ना हो तो बेचैनी होने लगती है ... तो बेटे अब जरा अपनी इस बाई को खुश कर दो आज"

"चिंता ना करो बाई, आज तुम्हारी बुर को ऐसे सूंतता हूं कि दो तीन दिन चुप रहेगी. पर बाई, ये समझ में नहीं आया कि ललित तो है ना यहां. याने सब औरतें नहीं हैं, एक तो जवान छोकरा है ना. तुम्हारा लाड़ला भी है, वो इसकी खबर नहीं लेता?" मैंने बाई की बुर में धक्के लगाते हुए चोदना शुरू करते हुए कहा.

"कहां अनिल बाबू, वो भी कहां ज्यादा घर में रहता है, अब वो स्कूल में थोड़े ही है, कॉलेज में गया है, बहुत पढ़ाई करना पड़ती है. पिछले साल बोर्ड की परीक्षा थी. अब उस बेचारे का जितना टाइम है, वो मालकिन और मीनल बिटिया को ही नहीं पूरा पड़ता तो मैं कहां बीच में घुसने की कोशिश करूं? हेमन्त भैया थे तब बात अलग थी. और अब तो कुछ ना पूछो. लीना बेटी तो एक मिनिट नहीं छोड़ती उसको, आखिर अपनी दीदी का लाड़ला है. आज सुबह से तो दिखा भी नहीं मेरे को, लीना ने अपने कमरे से बाहर ही नहीं आने दिया उसको ... हां ... आह ... आह ... बस ऐसा ही धक्का लगाओ मेरे राजा ... उई मां ... कितनी जोर से पेलते हो बेटा ... लगता है मेरे पेट में घुस गया ... हाय ... चोद डाल मेरे बेटे ... चोद डाल ..." मस्ती में बेहोश होकर राधाबाई नीचे से कस कस के धक्के लगाती हुई बोलीं.

आखिर जब मैं झड़ने के बाद रुका, तब तक राधाबाई की बुर को ऐसा रगड़ दिया था कि वे तृप्त होकर बेहोश सी हो गयी थीं. आज पहली बार मुझे ठीक से चोदने मिला था, उसका पूरा फायदा मैंने ले लिया था. मेरे खयाल से वे दो तीन बार झड़ी थीं. उन्होंने इतना बढ़िया नाश्ता कराया था, उसका भी कर्जा उतारना था मेरे को.

संभलने पर राधाबाई ने पड़े प्यार से मेरा चुंबन लिया. फ़िर उठकर मुझे बचा हुआ बादाम का हलुआ जबरदस्ती खिलाया "अब खा लो चुपचाप. इतनी मेहनत की, आगे भी करनी है, पाव भर बादाम डाले हैं मैंने इसीलिये. पेट भर खा लो और थोड़ा आराम भी कर लो, मैं सबको बता देती हूं कि दो तीन घंटे कोई परेशान नहीं करेगा अब."

फ़िर कपड़े पहन रही थीं तब बोलीं " अब कब दर्शन दोगे जमाईराजा? मैं तो गांव जा रही हूं, वापस आऊंगी तब तक तुम जा चुके होगे. अगले साल मिलोगे ऐसा बोलने का जुलम मत करो बेटा. जल्दी आओ. अभी तो कितनी मौज मस्ती करनी है तुम्हारे साथ, इतने खेल थे जो तुम्हारे साथ खेलने में मजा आता"

"बाई, तुमने बंबई देखी है?" मैंने पूछा. "नहीं ना, मुझे लगा ही था. फ़िर ऐसा करो, तुम ही बंबई आ जाओ. दो हफ़्ते रहो. बंबई भी दिखा देंगे और खेल भी लेंगे जो खेल तुमको आते हैं"

राधाबाई की बांछें खिल गयीं. "हां मैं आऊंगी बेटा. लीना बिटिया को बोल कर रखती हूं कि दो माह बाद ही मेरा टिकट बना कर रखे. अब चलती हूं, घर जाकर तैयारी करना है, गांव की बस छूट जायेगी.

"पर गांव क्यों जा रही हो बाई, बाद में चली जाना, रुक जाओ दो दिन"

"नहीं बेटा, मेरा छोटा भाई और उसकी बहू मेरी राह देख रहे हॊंगे. दीवाली में नहीं जा पाई तो बड़े नाराज हैं. वो बहू तो कोसती होगी मेरे को. वो क्या है, मैं उसके बहुत लाड़ करती हूं, बचपन से जानती हूं ना. समझ लो जैसी लीना बिटिया यहां है, वैसे वहां वो है. छोटे भैया की शादी भी उससे मैंने ही कराई थी. और मेरा भाई भी बड़ा दीवाना है मेरा, बिलकुल अपने ललित जैसा. बस जैसे यहां का हाल वैसा ही समझ लो. इसलिये मेरे को भी नहीं रहा जाता, साल में तीन चार बार हो आती हूं"

मुझे पलंग पर धकेल कर उन्होंने फ़िर से मेरा कस के चुम्मा लिया "छोड़ा तो नहीं जा रहा तुमको पर ... अब आप सो जाओ दामादजी"

उनके जाने के बाद मुझे गहरे नींद लग गयी. नींद खुली तो फ़्रेश लग रहा था. मैंने पजामा कुर्ता पहना और बाहर आ गया. पहली बार मैं अपने कमरे से बाहर निकला था. बाहर कोई नहीं था. मैंने सोचा कहां गये ये सब! एक कमरा खुला था, उसमें गया तो मीनल का कमरा था. बिस्तर पर मीनल की एक साल की बच्ची हाथ में बोतल धरे आराम से दूध पी रही थी. पास ही मीनल के उतारे कपड़े याने साड़ी ब्लाउज़ ब्रा वगैरह पड़े थे. मैंने ब्रा उठा कर देखी, मेरा बड़ा इन्टरेस्ट रहता है ब्रा में, स्त्रियों का सबसे प्यारा अंगवस्त्र यही है. वहा सुबह वाली लाल लेस की ब्रा थी. मैंने इधर उधर देखा कि कोई है तो नहीं और फ़िर उठा कर सूंघ ली, सेंट और मीनल के बदन की खुशबू थी उसमें. लंड खड़ा होने लगा.

ध्यान बटाने को मैं सोनू को खिलाने लगा. बड़ी प्यारी बच्ची थी "हेलो सोनू ... अकेली खेल रही है .... मां कहां है ... अपनी नन्ही मुन्नी को छोड़कर मां कहां गयी ..." सोनू ने बस मुंह से ’गं’ ’गड़’ ऐसे आवाज निकाले और फ़िर दूध पीने में जुट गयी. मैंने सोचा कितनी अच्छी बच्ची है, रो रो के मां को तंग नहीं करती.

मैं कमरे के बाहर आया. सब दरवाजे बंद थे. एक दरवाजा खोला, अंदर मोटर साइकिल के पोस्टर दिखे तो सोचा ललित का कमरा है शायद. अंदर गया तो अंदर मस्त नजारा था. ललित को नीचे बिस्तर पर चित लिटा कर हमारी प्राणप्रिया लीना उसपर चढ़ी हुई थी. गाउन कमर के आस पास खोंस लिया था और आराम से मजे ले लेकर अपने छोटे भाई को चोद रही थी. उसका यह खास अंदाज है, जब बहुत देर मस्ती करना होती है तो ऐसे ही हौले हौले चोदती है मेरी रानी! और मीनल वहीं उनके बाजू में बैठी हुई थी. मीनल और लीना दोनों ने पुराना गाउन पहन रखा था, चेहरे पर ककड़ी का लेप लगा था, शायद बाहर जाने के लिये मेकप की तैयारी चल रही थी.

ललित बेचारा थोड़ा परेशान था, सच में काफ़ी नाजुक सा लगता है. मजा ले रहा था पर थोड़ा भुनभुना रहा था "दीदी ... प्लीज़ बस करो ना ... ये चौथी बार है सुबह से ... मैं सच में थक गया ... कितना तंगाती हो" वैसे ये भुनभुनाना नाम के वास्ते था, बंदा मजे ले रहा था. जीन की खुली ज़िप में से उसका खड़ा लंड निकला हुआ था, लीना जब ऊपर होती तो साफ़ दिखता था.

मुझे देखकर बेचारा चौंक गया, लीना की ओर देखने लगा कि दीदी, अब बस करो. पर लीना ने कोई परवाह नहीं की, चोदती रही. ललित ने कहा "दीदी ... अब ..." लीना ने मुड़ कर मीनल से कहा "भाभी इसका मुंह तो बंद करो, कुछ दे दो इसके मुंह में, फालतू खिट पिट कर रहा है. और ललित मैंने पहले ही कहा था तेरे से कि इतने दिन बाद दीदी की गिरफ़्त में आया है तो ऐसे ही छोड़ दूं तेरे को? और इतना शरमा क्यों रहा है? मां तो कह रही थी कि बार बार पूछता था कि दीदी और जीजाजी कब आ रहे हैं?"

मीनल ने गाउन के बटन खोले और झुक कर अपनी चूंची ललित के मुंह में ठूंस दी. उसने एक दो बार ’गों’ ’गों’ किया पर फिर चुपचाप स्तनपान करने लगा. मीनल के उन भरे गुदाज स्तनों को देखकर दिल बाघ बाघ हो गया, ललित से मुझे जलन भी होने लगी.

"क्यों जीजाजी, आराम हो गया? हम तो राह ही देख रहे थे आपके उठने की. राधाबाई आज आपको नाश्ता कराके आयीं तो इतनी थकी लेग रही थीं पर एकदम खुश थीं. हमें डांट कर कह गयीं कि जमाईराजा को आराम करने देना, उठाना नहीं. लगता है आप ने बहुत इंप्रेस कर दिया है उनको" ललित को दूध पिलाते हुए मीनल बोली.

"अब भाभी, इनसे बातें करने में क्यों वक्त जाया कर रही है? सूखी सूखी बैठी है, मुझे कह रही थी कि सुबह मन नहीं भरा अनिल के साथ, जल्दी करनी पड़ी. तो अब चढ़ जा उसे यहां लिटा कर. ये भूल जा कि ये जमाई वमाई हैं, चुदासी लगी है और लंड सामने है तो मजा कर ले. और भाभी, ललित को सारा ना पिला देना. मेरा सैंया कहेगा कि मैंने क्या पाप किया है कि मुझे यह अमरित नहीं दे रहा कोई" लीना मेरी ओर देखकर शोखी से मुस्कराते हुए बोली.

मीनल को बात जच गयी. उसने मुझे बैठने को कहा. मैं वहीं पलंग के किनारे पर बैठ गया. दो मिनिट ललित को स्तनपान करवाकर मीनल उठी और ललित को सरकने को कहा. ललित बेचारा किसी तरह लीना को अपने ऊपर लिये लिये ही सरक गया. मीनल ने मुझे वहीं उसके बाजू में लिटा दिया "मैंने कहा था ना अनिल कि तुम लोगों का खास कर तुम्हारा घंटे घंटे का टाइम टेबल हमने बना कर रखा है. अब आगे आधे घंटे का प्रोग्राम यही है"

---

मीनल ने मेरे पजामे के बटन खोलकर मेरा लंड बाहर निकाला. पहले ही खड़ा था, उसके मुलायम हाथ लगते ही और टनटना गया. उसने गाउन ऊपर किया और चढ़ बैठी. लंड को चूत में खोंसते हुए बोली. "बहुत अच्छा हुआ जीजाजी कि आप उठ गये नहीं तो सब टाइम टेबल गड़बड़ा जाता. वैसे भी आधा घंटा ये ककड़ी का लेप लगा कर रखना है धोने के पहले, इस लीनाने तो इंतजाम कर लिया था आधा घंटा बिताने का, अब आप आये हो, तो मेरा भी हो गया."

उधर बेचारा ललित ’ओह’ ’ओह’ करने लगा. बेचारे का लंड शायद गर्दन झुकाने वाला था. लीना ने उसके कान मरोड़े और कहा "खबरदार ... अभी नहीं ... मार खायेगा ... अभी मेरा नहीं हुआ"

ललित सिसकने लगा "दीदी ... प्लीज़ ... प्लीज़"

मीनल ने मुझे चोदते चोदते अपना पैर आगे करके ललित को गाल को लाड़ से अपने अंगूठे से सहलाते हुए कहा "ऐसे दीदी को मझदार में नहीं छोड़ते ललित राजा. जरा मन लगा कर सेवा कर ना. जब वो नहीं थी तो उसके नाम की माला जपता था, अब वो आ गयी है तो जरा मन की कर उसके. ऐसा क्यों सिसक रहा है? दर्द हो रहा है? मजा नहीं आ रहा?"

"नहीं भाभी ... बहुत ... मजा ... आ रहा ... है .... रहा नहीं ... जाता ... दीदी बहुत ... तड़पाती है ... दीदी प्लीज़ झड़ा दो ना"

लीना बड़े वहशी मूड में थी. उसने अपना पैर उठाकर अपने पैर की उंगलियां ललित के होंठों पर रख दीं और अंगूठा और एक दो उंगलियां उसके मुंह में ठूंस दीं. बेचारा ललित ’गं’ ’गं’ करके चुप हो गया. अब वो ऐसी मस्ती में था कि और कुछ नहीं सूझा तो लीना के पैर की उंगलियां ही चूसने लगा.

लीना ने मेरी ओर देखा और मीनल से बोली "अब जरा पिला दे ने मेरे सैंया को. बचा है ना? कि सब ललित को पिला दिया? वैसे भी आज कम पड़ने ही वाला था, मैंने जो दो बार पी लिया सुबह से"

"नहीं लीना दीदी ..." मीनल इठलाते हुए बोली. "एक खाली हो गया पर दूसरा अभी भरा है. जीजाजी, आप ही देखिये" मीनल ने मेरे सिर के नीचे दो बड़े तकिये रखे कि मेरा सिर ऊपर हो जाये. फ़िर चोदते चोदते मेरे ऊपर झुक गयी. उसका स्तन अब मेरी चेहरे के सामने लहरा रहा था. मैंने गर्दन लंबी करके निपल मुंह में ले लिया और चूसने लगा. कुनकुने दूध से मुंह भर गया. मैं चुपचाप आंख बंद करके उस अमरित का पान करने लगा. जल्द ही पता चल गया कि सब मीनल के पीछे क्यों रहते थे. अजब स्वाद था इस दूध का, और स्वाद से ज्यादा किसी जवान औरत का दूध सेक्स करते करते पीने में जो मादकता का अनुभव होता था, उसका बयान करना मुश्किल है.

आधा घंटा ये मस्ती चली. दोनों चुदैलें एकदम एक्सपर्ट थीं. हमें बिना झड़ाये खुद झड़ कर अपनी अगन शांत कर ली. जब आधा घंटा हो गया तो मेकप धोने के पहले हमें चोदने दिया. मैं और ललैत पहले ही ऐसे कगार पर कि दो मिनिट भी नहीं लगे.

लीना उठकर नहाने को बाथ रूम जाते हुए बोली "अनिल, अब तैयार हो जाओ तुम भी. बड़े घर जाना है, वहां पूजा है. रात को भी वहीं रहना होगा, सीधे सुबह वापस आयेंगे. वहां जरा ठीक से अच्छे बच्चे जैसे रहना, शैतानी मत करना, तुम्हें तकलीफ़ ना हो इसलिये आज तुम्हारे लंड महाराज को पूरा तृप्त कर दिया है सबने मिलके. अब उसे जरा सुलाये रखना, नहीं तो आओगे रात को फ़िर से लप लप करते"

मैंने जरा नाराज होकर कहा "अब इतना गया गुजरा भी नहीं हूं. मान लिया कि तुम्हारा और अब ममी और मीनल भाभी का भी दीवाना हूं पर इतना कंट्रोल कर सकता हूं. पर ये जरूरी है क्या वहां जाना? कल रात को वापस भी जाना है ट्रेन से, मुझे जॉइन करना है"

लीना ने मुझे पहले ही बता रखा था. बड़ा घर याने जहां लीना के दादा दादी और बाकी सब सदस्य रहते थे. शहर के बाहर गांव में बड़ा मकान था, करीब बीस मील दूर होगा. वहां जरा कड़क डिसिप्लिन का माहौल रहता था. कोई ताज्जुब नहीं कि लीना और उसका परिवार अलग रहते थे, उनके जैसे परिवार को सबसे साथ रहना भी मुमकिन नहीं था. पर खास मौकों पर रिश्तेदारी निभाना जरूरी थी.

लीना ने मेरे कान खींचते हुए कहा "आवाज चढ़ाने की कोई जरूरत नहीं है, तुम कंट्रोल ना करके देखो, तुम्हारी कैसी हालत करती हूं देखना"

मैंने शरणागति मान ली. हाथ जोड़कर अपनी रानी से कहा "जैसा तुम कहो डार्लिंग, और कोई आज्ञा हो तो बताओ"

"वो कल बताऊंगी आने के बाद. चलो अब मुंह लटका के न बैठो" मुझे चूम के प्यार से बोली "ये रिश्ते तो निभाने ही पड़ते हैं. आज बड़े घर जाना ही है, कल पूरा दिन है फ़िर से, तब खातिरदारी करवा लेना. अब एक घंटे में तैयार हो जाओ सब फटाफट, मां तो एक घंटे पहले ही गयी भी, बोल कर गयी थी कि सब जल्दी आना"

मैं और ललित पांच मिनिट पड़े रहे, स्खलन का आनंद लेते हुए. फ़िर उठे और तैयार होने लगे.

बड़े घर में ये हड़कंप मचा था. बहुत से रिश्तेदार आये थे. मैंने कितने बड़े बूढ़ों और बूढ़ियों के पैर छुए, उसकी गिनती ही नहीं है, सब नया जमाई करके इधर उधर मुझे मिलवाने ले जा रहे थे. लीना, मीनल और ताईजी तो मुझे बहुत कम दिखीं, हां ललित दिखा जो लीना को ढूंढ रहा था, बेचारा अपनी दीदी का मारा था. हां, बाद में जब औरतों का गाना बजाना खतम हुआ तो वे तीनों दिखीं. सब इतनी सुंदर लग रही थीं. याने वे सुंदर तो थीं ही, मैंने सबकी सुंदरता इतने पास से देखी थी पर उस दिन सिल्क की साड़ियां, गहने, मेकप इन सब के कारण वे एकदम रानियां लग रही थीं. लीना तो लग ही रही थी राजकुमारी जैसी, मीनल भी कोई कम नहीं थी और सासूमां, उफ़्फ़ उनका क्या कहना, गहरी नीले रंग की कांजीवरम साड़ी में उनका रूप खिल आया था. लीना ने शायद जिद करके उनको हल्की लिपस्टिक भी लगा दी थी, उनके होंठ गुलाब की कलियों जैसे मोहक लग रहे थे और जब मैंने उनके सुबह के चुंबनों के स्वाद के बारे में सोचा तो कुरता पहने होने के बावजूद मेरा हल्का सा तंबू दिखने लगा, बड़ी मुश्किल से मैंने लंड को शांत किया नहीं तो भरी सभा में बेइज्जती हो जाती. एक बात थी, मैं कितना भाग्यवान हूं कि ऐसी सुंदर तीन तीन औरतों का प्यार मुझे मिल रहा है, ये बात मेरे मन में उतर गयी थी. पर उस समय कोई मुझे कहता कि फटाफट चुदाई याने क्विकी के लिये तीनों में से एक चुनो, तो मुश्किल होती. शायद मैं मांजी को चुन लेता!! क्या पता!!

रात को पूजा देर तक चली. फ़िर खाना हुआ. दो बज गये थे और सब वही सोय गये, वैसे सब की व्यवस्था अच्छी की गयी थी, इतना ही था कि मर्द और औरतें अलग अलग कमरों में थे. अब इतने लोगों में सबको जोड़े बनाकर कमरे देना भी मुश्किल था. सुबह उठकर बस चाय पीकर सब निकलनी लगे. हम भी निकले और नौ बजे तक घर आ गये. आते ही थोड़ा आराम किया, अब भी थकान थी. एक दो घंटे आराम के बाद नहाना धोना वगैरह हुआ. अब राधाबाई भी नहीं थी इसलिये हमने बाहर से ही खाना मंगवा लिया. दोपहर के खाने के बाद मीनल से सोनू को बोतल से दूध पिलाया. सोनू जल्द ही सो गयी. मीनल लीना की ओर देखकर मुस्करा कर बोली "अब सोयेगी चार पांच घंटे आराम से, कल भीड़ भाड़ की वजह से चिड़चिड़ा रही थी, सोयी भी नहीं ठीक से"

मैं सोच रहा था कि कल से मीनल के स्तन खाली नहीं हुए, भर गये होंगे. उसके ब्लाउज़ में से वे अब अच्छे खासे उभरे उभरे से लग रहे थे. मीनल ने मेरी नजर कहां लगी है वो देखा और मुझे आंख मार दी. फ़िर पलक जल्दी जल्दी झपका कर प्यार से सांत्वना दी कि फ़िकर मत करो, सब मिलेगा. अपना आंचल ठीक करके मीनल लीना से बोली "लीना दीदी ... आज रात को तुम दोनों जाने वाले हो? बहुत कम समय के लिये आये हो तुम लोग, देखो ना, कल का आधा दिन और पूरी रात और आज का आधा दिन ऐसे ही बेकार गया"

लीना बोली "भाभी, पूरी दोपहर और शाम है, ट्रेन तो रात की है ना, मुहब्बत करने वाले तो पांच मिनिट में भी जन्नत की सैर कर आते हैं. वैसे तुम ठीक कहती हो. ललित ... जा बाहर से ताला लगा दे और पीछे के दरवाजे से अंदर आ जा. और सब पर्दे खिड़कियां बंद कर दे. कोई आये भी तो वापस चला जायेगा सोच के कि हम वापस नहीं आये अब तक. शाम को ताला खोलेंगे."

मांजी जो अब तक चुपचाप बैठी थीं, बोलीं "तब से कह रही हूं, अब ज्यादा टाइम नहीं बचा है, कोई सुनता ही नहीं मेरी. अब देर मत करो और. लीना, तू जल्दी दामादजी को लेकर आ जा मेरे कमरे में"

मीनल हंसने लगी "मां जी को सबसे ज्यादा जल्दी हो रही है अपने दामाद के और लाड़ प्यार करने की"

सासूमां शरमा गयीं. बोलीं "चल बदमाश कहीं की. अरे अनिल का तो खयाल करो, बेचारे की पूरी रात वेस्ट कर दी हमने, चलो जल्दी करो"

मीनल बड़े नाटकीय अंदाज में बोली "और मैं और ललित क्या करें ममी? चल ललित, अपन पिक्चर चलते हैं, वो जय संतोषी मां लगी है"

ताईजी चिढ़ कर बोलीं "अब तो बहू तू मार ही खायेगी, कोई कहीं नहीं जायेगा, सब लोग जल्दी मेरे कमरे में आओ, और कैसे तैयार होकर आना है ये बताने की जरूरत नहीं है. मेरा कमरा बड़ा है, इसलिये वहां सब को आराम से ... याने ... मैं जा रही हूं, तुम लोग भी आ जाओ" फ़िर वे उठकर अपने कमरे में चली गयीं.

लीना बोली "अब सब समझे या नहीं? मां ने तैयार होकर आने को कहा है. याने और अच्छे कपड़े पहनकर बनाव सिंगार करके नहीं, कपड़े निकाल कर जाना है, एकदम तैयार होकर हमारी कामदेव की पूजा जल्द से जल्द शुरू करने के लिये. चल ललित, जा और ताला लगाकर जल्दी आ, मैं अनिल को लाती हूं"

मुझे वह अपने कमरे में ले गयी. हमने फटाफट कपड़े निकाले. लीना जब साड़ी फ़ोल्ड करके रख रही थी तब उसके गोल मटोल गोरे नितंब देखकर मैंने झुक कर उनको चूम लिया. फ़िर उनको दबाता हुआ पीछे से चिपक गया. अपना लंड उन तरबूजों के बीच की लकीर में सटा कर लीना की ज़ुल्फ़ों में मुंह छुपा कर बोला "अब डार्लिंग, इन मेरे प्यारों को मैं इतना मिस कर रहा हूं, जरा एक राउंड हो जाये फटाफट? पीछे से?"

"बिलकुल नहीं ये फटाफट होने वाली चीज नहीं है. मुझे मालूम है, मेरी गांड के पीछे पड़े कि रात भर की छुट्टी."

लीना के नितंबों को दबाता हुआ मैं बोला "बड़ी आई रात भर वाली. महने में एक बार कभी इनका आसरा मेरे लंड को मिलता है, अब आज मरा भी लो रानी प्लीज़"

"बिलकुल नहीं, अब चलो, मीनल और ललित तो आ भी गये होंगे ममी के कमरे में"

"रानी, चलो तुम ना मराओ, तुमको मैं क्या कहूं, तुम्हारा तो गुलाम हूं पर वो ... याने नाराज मत हो पर ताईजी की क्या मस्त गांड है, डनलोपिलो जैसी, अब तक ठीक से हाथ भी नहीं लगा पाया. हाथ खोले ही नहीं किसी ने कल दिन भर मेरे. और मीनल की ठीक से देखी नहीं पर मस्त कसी हुई लगती है. अगर आज अब मैं जरा ...."

लीना मेरी बात काट कर गुस्से से बोली "खबरदार. मां की गांड को बुरी नजर से मत देखना. अनर्थ हो जायेगा. डेढ़ दिन को आये हो, जरा अपनी साख मनाये रहो. मां को सच में आदत नहीं है, मीनल की मैं नहीं जानती पर आज अब टाइम भी नहीं है"

मेरे सूरत देख कर फिर वो तरस खा गयी. मेरे गाल को सहला कर बोली "आज मां और मीनल को अपने तरीके से तुम्हारी खातिरदारी करने दो, बाद में मौके बहुत मिलेंगे. अगली दीवाली भी है ना! अब चलो. ऐसे मुंह मत लटकाओ" वो जानती थी कि उसकी गांड मारने का मुझे कितना शौक था जो बस महने में एकाध बार ही मैं पूरा कर पाता था.

हम ममी के कमरे में आये. वहां बड़ा सुहाना दृश्य था. तीन नग्न बदन आपस में लिपटे हुए थे. ललित को बीच में लेकर उसकी मां और भाभी उसके लाड़ कर रहे थे. ताईजी अपने बेटे को बड़े प्यार से चूम रही थीं. उसका गोरा चिकना लंड उनकी मुठ्ठी में था. मीनल बस उसे बाहों में भरके उसका सिर अपनी ब्रा में कसे स्तनों पर टिकाये थी. वह बीच बीच में ताईजी के चुम्मे ले लेती. ललित का लाड़ प्यार जिस तरीके से हो रहा था, उसमें कोई अचरज की बात नहीं थी. वह घर का सबसे छोटा सदस्य था और जाहिर है कि सबका और खास कर अपनी मां का लाड़ला था. इस बार उसे ठीक से देखा तो मैंने गौर किया कि सच में बड़ा चिकना लौंडा था, एकदम खूबसूरत. अभी तो मां के प्यार का आनंद ले रहा था और मीनल की ब्रा खोलने की कोशिश कर रहा था.

"अरे ये क्या कर रहा है बार बार" मीनल झुंझलाई.

"पिला दो ना भाभी, कल से तरस गया हूं"

"अरे मेरे राजा, तू समझता क्यों नहीं है, रोज पीता है ना, अब एक दिन नहीं पिया तो क्या हुआ, आज ये दावत सिर्फ़ अनिल के लिये है, ठीक से पिला नहीं पायी कल से, बस थोड़ा जल्दी जल्दी में चखाया था. अब आज जरा तेरे जीजाजी को मन भरके इसका भोग लगाने दे"

ललित शर्मा गया, जैसे गलती करते पकड़ा गया हो. "सॉरी भाभी, भूल गया था." फ़िर कनखियों से मेरी ओर देखा जैसे माफ़ी मांग रहा हो.

मैंने कहा "मीनल, मेरी मानो तो सबको थोड़ा थोड़ा दे दो, मेरे हिस्से का रात को निकलने के पहले पिला देना, पर तब मैं सब पियूंगा"

लीना बोली "चल, खुश हो गया अब तो? चलो भाभी, अब जल्दी करो"

"अभे नहीं लीना, जरा भरने दे ना और. फ़िर सबको दो दो घूंट तो मिलेंगे, पहले ब्रेक के बाद मुंह मीठा कराती हूं सब का. चल ललित सो जा ठीक से" ललित को नीचे चित लिटाकर मीनल उसपर चढ़ने की तैयारी करने लगी. ताईजी भी संभल कर अपने बेटे का सिर अपनी जांघ पर लेकर बैठ गयीं.

"ये क्या हो रहा है?" लीना ने उनको फटकार लगायी. "ललित को भेजो इधर और तुम दोनों सास बहू अनिल पर ध्यान दो"

ताईजी बोलीं "अरे क्या कर रही है लीना, ललित को कब से पकड़कर बैठी है. और अनिल को भी कल से तेरे साथ ... याने मौका ही नहीं मिला. हमने सोचा कि अब तुम दोनों जरा प्यार से ..."

"वहां बंबई में ये मेरा पति मुझे जोंक जैसा चिपका रहता है चौबीस घंटे, छोड़ता ही नहीं, अब दो दिन मेरे बदन को नहीं मसलेगा तो मर नहीं जायेगा. तुम दोनों खबर लो उसकी. मुझे भी जायका बदलना है. चल ललित ..." कहकर उसने ललित को हाथ पकड़कर जल्दी उठाया और पलंग के बाजू में रखी कुरसी पर बैठ गयी. ललित को सामने बैठा कर टांगें फैलाकर बोली "चल ललित, मुंह लगा दे जल्दी, तू आज भुनभुना रहा था ना कि दीदी ने मुंह भी नहीं लगाने दिया, अब पूरा रस चूस ले अपनी दीदी का. और जरा ठीक से प्यार से स्वाद ले, दीदी को भी मजे दे देकर, तेरे इस मुसटंडे ..." ललित के खड़े लंड को पैर से रगड़कर लीना बोली " ... को बहुत मजे दिये हैं मैंने कल से, अब इस कह कि जरा सब्र करे. चल शुरू हो जा फटाफट"

ललित लीना की टांगों के बाच बैठता हुआ बोला "दीदी ... प्लीज़ चोदने भी दो ना ..."

"कल तो चोदा था अनिल के सामने, बड़े घर जाने के पहले" लीना उसे आंखें दिखाकर बोली.

"वो तो दीदी तुमने मुझे चोदा था. मैंने तुमपर चढ़ कर कहां चोदा है पिछले दो दिनों में?" ललित ने कहा तो लीना चिढ़ गयी

"तुझे नहीं चूसनी मेरी चूत तो सीधा बोल दे कि दीदी, अब मुझको तुम्हारा रस नहीं भाता. यहां बहुत हैं उसके कदरदान. मां या मीनल भाभी तो बेचारी कब से राह देख रही हैं, वो तो मैं ही प्यार से लाड़ से तेरे लिये अपनी बुर संजोये बैठी हूं कि मेरा लाड़ला छोटा भैया है, उसको मन भर के पिलाऊंगी. और अनिल को कहूं तो अभी सब छोड़ छाड़ कर आ जायेगा मुंह लगाने. तू फूट ... चल भाग ..."

ललित ने घुटने टेक दिये. याने सच में घुटने टेक कर लीना की माफ़ी मांगते हुए उसके पांव चूमने लगा. वैसे उसमें कोई बड़ा तकलीफ़ वाली बात नहीं थी, लीना के पैर हैं बहुत खूबसूरत "दीदी ... सॉरी ... माफ़ कर दो ... मेरा वो मतलब नहीं था ... तुम्हारे रस के लिये तो मैं कुछ भी कर लूं .... बस दीदी .... तुमको देखते ही ये बदमाश ..." अपने लंड को पकड़कर वह बोला "बहुत तंगाता है दीदी"

"उसको कह कि सबर करेगा तो बहुत मीठा फल मिलेगा. अब चल फटाफट" लीना आराम से कुरसी में टिकते हुए बोली. अपनी टांगें उसने ललित के स्वागत में फैला दीं. ललित ने बैठ कर मुंह लगा दिया और मन लगाकर चूसने लगा. जिस प्यास से वो अपनी बड़ी बहन की चूत चूस रहा था उससे मैं समझ गया कि बुरी तरह मरता है लीना पर. दो मिनिट बाद उसने लीना की जांघें बाहों में भर लीं और चेहरा पूरा लीना की बुर में छिपा दिया. लीना सिहरकर बोली "हं ... आह ... अब कैसा अच्छे भाई जैसा दीदी की सेवा कर रहा है ... हं .... हं ... हं ..."

मुझे भाई बहन का यह प्यार बड़ा ही मादक लगा. मैं यह भी सोच रहा था कि आखिर लीना कल से सिर्फ़ अपने छोटे भाई के पीछे क्यों पड़ी है. मुझे लगा था कि दो ही दिन को आये हैं तो मां और भाभी से भी ठीक से इश्क विश्क करने का मन होता होगा. पर मैं कुछ बोला नहीं, मैं जरा घबराता हूं उससे, पूरा जोरू का गुलाम जो ठहरा. सोचा करने दो मन की.

इसलिये मैं जाकर पलंग पर बैठ गया, अपनी सास और सल्हज के प्रति अपना भक्तिभाव जताने! पहले मांजी के गाल को चूमा, फ़िर कमर में हाथ डालकर मीनल को पास खींचा. पांच मिनिट बस दोनों को बारी बारी से चुंबन लिये, अब क्या बताऊं क्या मिठास थी उन चुंबनों में, जैसे एक ही प्लेट में दो मिठाइयां लेकर बारी बारी से खा रहा होऊं. जब ताईजी का एक चुंबन जरा लंबा हो गया, याने उनके वे नरम गुलाबी होंठ इतने रसीले लग रहे थे कि मैं बस चूसे जा रहा था, तब मीनल मुझसे चिपट कर मेरे कान के लोब को दांत से काटने लगी. मैंने हाथ बढ़ाकर उसकी ब्रा के बकल खोलने की कोशिश की तो बोली "रहने दो जीजाजी, अभी वक्त नहीं है, तुम फ़िर दबाने लगोगे और सब दूध बह जायेगा, ब्रा बाद में निकालूंगी."

"फ़िर क्या आज्ञा है इस दास के लिये?" मैंने हाथ जोड़ कर कहा. "बड़ी तपस्या की होगी मैंने पिछले जनम में जो दो दो अप्सराओं की सेवा करने का मौका मिला है आज"

मांजी मुंह छुपा कर हंसने लगीं. मीनल ने बड़ी शोखी से मेरी ओर देखा जैसे मेरी बात की दाद दे रही हो. फ़िर बोली "अभी तो हमें स्टैंडर्ड सेवा चाहिये अनिल, खेल बहुत हो गये. अब हम तीनों औरतों को बेचारा ललित अकेला क्या करे, और वो राधाबाई भी थोड़े छोड़ती है उसको! अभी नया नया जवान है. अब जरा इस सोंटे का ..." मेरा लंड पकड़कर हिलाते हुए बोली " ... ठीक से यूज़ करना है. कल से तुम तो बस पड़े हो, सब मेहनत हमने की, अब हम लेटेंगे और तुम मेहनत करोगे. ताईजी अब पहले आप ..."

सासूमां शरमा कर बुदबुदाईं "अरे बहू ... मैं कहां कुछ ... याने तू ही पहले ..."

मीनल ने एक ना सुनी. एक बड़ा तकिया रखकर मांजी की कमर के नीचे रखकर उनको जबरदस्ती चित सुला दिया और उनके पास लेटकर उन्हें चूमने लगी. मुझे बोली "चढ़ जाओ जमाईराजा, अब टाइम वेस्ट मत करो, अब तुम्हारे ना तो हाथ बंधे हैं ना पांव, जैसा मन चाहे, जितनी जोर से चाहे, करो, हमारी ममीजी बेचारी सीधी हैं इसलिये खुद कुछ नहीं कहतीं पर उनका हाल मैं समझती हूं"

मैंने फिर भी संयम रखा, अच्छा थोड़े ही लगता है कि वहशी जैसा चढ़ जाऊं! मांजी की गीली तपती चूत में मैंने जब लंड पेला जो वो ऐसे अंदर गया जैसा पके अमरूद में छुरी. फ़िर थोड़ा झुककर बैठे बैठे ही हौले हौले लंड सासू मां की बुर में अंदर बाहर करने लगा.

सासूमां कितनी भी शरमा रही हों पर अब उन्होंने जो सांस छोड़ी उसमें पूरी तृप्ति का भाव था. मीनल को बोलीं "बहुत अच्छा लगा बेटी, आखिर ठीक से सलीके से मेरे दामाद से मेरा मिलन हो ही गया. कल मेरी कमर दुखने लगी थी ऊपर से धक्के लगा लगा कर. पर क्या करूं, तू जतला के गयी थी ना कि अनिल को आज बस लिटाकर रखो ... ओह ... ओह ... उई मां .... बहुत अच्छा लग रहा है अनिल बेटे ... कितना प्यारा है तू ... अं ... अं ... और पास आ ना मेरे बच्चे ... ऐसा दूर ना रह ...." कहकर उन्होंने मुझे बाहों में भींच कर अपने ऊपर खींच लिया और अपनी टांगें मेरी कमर के इर्द गिर्द लपेट लीं. मैंने भी उनको ज्यादा तंग ना करके घचाघच चोदना शुरू कर दिया, जैसा लीना को चोदता हूं. सोचा लीना को चुदवाने की जो स्टाइल पसंद है वो इन दोनों को भी जच जायेगी.

ज्यादा डीटेल में वर्णन क्या करूं, आप बोर हो जायेंगे पर अगले घंटे भर में मैंने सास बहू को अलट पलट कर मस्त चोदा. बिलकुल उनकी इच्छा पूर्ति होने तक. पहले मां जी को दस पंद्रह मिनिट चोदा, दो बार झड़ाया, खुद बिना झड़े. वे तो मस्ती से ऐसे सीत्कार रही थीं जैसे बहुत दिनों में ठीक से चुदी ना हों. दो बार लगातार झड़ीं. फ़िर मुझे ध्यान में आया कि उनका बेटा हेमन्त याने लीना का भाई दो माह से परदेस में था, ललित के बस की थी नहीं इतनी चुदाई, बेचारी चुदें तो आखिर कैसे!

चोदते चोदते मैंने मन भरके उनके मीठे गुलाबी मुंह का रस पान किया. बीच बीच में वे मेरा सिर नीचे दबाती थीं, पहले तो मुझे लगा कि क्या कर रही हैं पर फ़िर समझ में आया कि उनको मम्मे चुसवाना था. अब उनकी उंचाई मुझसे इतनी कम थी कि सिर्फ़ होंठों का चुंबन लेने के लिये ही मुझे गर्दन बहुत झुकानी पड़ती थी. फ़िर जब उनकी मंशा समझ में आयी तो भरसक मैंने गर्दन और नीची करके उनके निपल भी चूसे. गर्दन दुखने लगती थी पर उनको जैसा आनंद मिलता था, उससे उस पीड़ा को भी मैं सहता गया. लगता है उनके निपल बहुत सेन्सिटिव थे और चुसवाकर उनकी वासना और भड़कती थी. और क्यों ना हो, किसी भी ममतामयी मां के निपल तो सेन्सिटिव होंगे ही!

आखिर जब वे आंखें बंद करके लस्त हो गयीं और बुदबुदाने लगीं कि बस ... बेटा बस ... तब मैंने लंड बाहर खींचा. मीनल अब तक एकदम गरमा गयी थी. जब तक मैं ताईजी को चोद रहा था, वह बस हमसे लिपट कर जो बन पड़े कर रही थी, कभी मुझे चूमती, कभी मांजी को, कभी उनके स्तन दबाती.

अब मांजी धराशायी होते ही मीनल तैयार हो गयी. मैडम को पीछे से करवाना शायद अच्छा लगता था, डॉगी स्टाइल में. मांजी पर मैं कुछ देर पड़ा रहा, उनकी झड़ी बुर में लंड जरा सा अंदर बाहर करता रहा. उन्होंने जब आंखें खोलीं तो उनमें जो भाव थे वो देख कर ही मन प्रसन्न हो गया कि उनको मैंने इतना सुख दिया. तब तक मैं मीनल भाभी के मांसल बदन पर हाथ फिरा कर उनको और गरमा रहा था. उनकी बुर को पकड़ा तो पता चला कि एकदम तपती गीली भट्टी बन चुकी थी.

मांजी के सम्भलते ही मीनल खुद झुक कर कोहनियों और घुटनों पर जम गयी. ताईजी उठ कर बैठ गयीं और फ़िर सरककर मीनल के सामने आ गयीं. बड़े प्यार से मीनल के चुम्मे लेने लगीं "बहू ... अब ठीक से मन भरके जो कराना है करा ले अनिल से. मेरा इतना खयाल रखती है मेरी रानी, अब मेरी फिकर छोड़ और खुद आनंद लूट ले. अनिल बेटे ... बहुत अच्छी है मेरी बहू ... ये मेरा भाग्य है जो ऐसी बहू मिली है ... बेटी जैसी ... अब इसे भी खूब सुख दे मेरे लाल जैसा मेरे को दिया"

"मीनल भाभी के लिये जान हाजिर है ताईजी, आप चिंता ना करें" कहके मैं मीनल के पीछे घुटने टेक कर बैठ गया और अपना तना मस्ताया लंड हाथ में ले लिया. अब क्या कहूं, आंखों के सामने जो सीन था वो ... याने .... स्वर्ग के दो दो दरवाजे एक साथ दिख रहे थे. फूली गोरी गोरी पाव रोटी जैसी बुर, काले बालों से भरी और उनमें वो लाल छेद, रिसता हुआ और उसके जरा ऊपर दो भरे गुदाज मांसल नितंबों के बीच जरा भूरा सा गुदा का छेद जो अभी एकदम बंद था. एक बार मन में आया कि डाल ही दूं सट से अंदर, बाद में जो होगा देखी जायेगी पर फ़िर लीना के गुस्से की याद आयी तो मन को काबू में किया. ऊपर वाले उस सकरे भूरे छेद लो बस एक बार हल्का सा उंगली से सहलाया और फ़िर लौड़े को बुर पर रखकर अंदर तक पेल दिया. फ़िर मीनल भाभी की कमर पकड़कर सटा सट चोदने लगा.

मीनल ने मन भर के मुझसे चुदवाया. "और जोर से अनिल ... और जोर से अनिल" ऐसा बार बार कहती. मैंने भी हचक हचक के वार करना शुरू कर दिया, ऐसी कोई चुदवाने वाली मिले तो चैलेंज लेने में मजा आता है. उसका बदन मेरे धक्कों से हिचकोले लेने लगा. अब वो मस्ती में "ममी ... ममी ... देखिये ना .... कैसा कर रहा है आपका दामाद ... ममी ममी ..." बड़बड़ाने लगी. ताईजी उसके सामने बैठ कर लगातार उसके चुंबन ले रही थीं. जब मीनल हल्के हल्के चीखने लगी तो उन्होंने अपना एक स्तन उसके मुंह में ठूंस कर उसकी बोलती बंद कर दी. मीनल अब कस कस के पीछे की ओर अपनी कमर ठेल ठेल कर मेरा लंड गहरे से गहरा लेने की कोशिश कर रही थी. आखिर आखिर में तो मैं भी इतना उत्तेजित हो गया कि करीब करीब मीनल पर पीछे से चढ़ ही गया. मीनल का भी जवाब नहीं, सुंदरता के साथ साथ अच्छा खासा मजबूत बदन था उसका, मेरे वजन को आराम से सहते हुए चुदवाती रही. आखिर जब झड़ी तो मुझे भी साथ लेकर. और रुकना मेरे लिये मुमकिन नहीं था. मीनल लस्त होकर पलंग पर लेट गयी और मैं उसकी पीठ के ऊपर.

उधर लीना ने बेचारे ललित की हवा टाइट कर रखी थी. मन भरके अपने छोटे भाई से चूत चुसवा रही थी. सनसनाते लंड से तंग होकर जब जब वो बेचारा उठने की कोशिश करता तो उसके कान पकड़कर फ़िर वो उसका मुंह अपनी बुर पर भींच लेती थी. एक दो बार ऐसा होने पर उसने अपनी जांघें ललित के सिर के इर्द गिर्द जकड़ लीं और तभी ढीली कीं जब ललित फ़िर चुपचाप उसकी चूत चूसने लगा.

मीनल को चोदते वक्त एक बात मैंने गौर की थी कि ललित बार बार नजर चुराके हमारी ओर देख रहा था. खास कर जब मीनल की चुदाई शुरू करने के पहले मैं लंड हाथ में लेकर उसके दोनों छेद देख रहा था तब उसकी नजर मेरे लंड पर जमी थी. शायद खुद के लंड से मेरे लंड की तुलना कर रहा हो. तब मैंने उसको एक स्माइल देकर फ़्रेंडली वे में आंख मारी थी कि जमे रहो. लीनाने तब उसको चपत मार कर फ़िर उसका सिर अपनी जांघों में दबोच लिया था और मेरी ओर देख कर शैतानी से हंस दी थी. उसकी हंसी के पीछे क्या सोच थी वो मैं नहीं समझ पा रहा था.

एक बात और मेरे मन में आयी. मांजी को चोदते वक्त मैं इतना मग्न था कि ललित की ओर ध्यान ही नहीं गया था. अगर देखता तो ललित के चेहरे पर क्या भाव होता? आखिर उसीके सामने मैं उसकी मां को चोद रहा था. अब भले ही ललित इस चुदैल परिवार का ही सदस्य था और खुद भी अक्सर अपनी मां को चोदता होगा पर अपने जीजाजी को अपनी मां को चोदते वक्त वह क्या सोच रहा होगा. विचार बड़ा लुभावना था और इसके बारे में सोच सोच कर मेरा लंड फ़िर से जागने लगा.

फ़िर ब्रेक हुआ. मीनलने आखिर ब्रा निकाली और सब को स्तनपान कराया. पहले मांजी और मुझे एक साथ और फ़िर लीना और ललित को. उसके स्तन खाली होते ही मैंने मीनल को बाहों में भर लिया और उसके मांसल मम्मे हथेली में लेकर दबाने लगा. कल से मेरा मन हो रहा था, पर अब मौका मिला था.

"लगता है चूंचियां मसलने का बड़ा शौक है जीजाजी को" मीनल ने लीना की ओर देखकर चुटकी ली.

"अरी तू नहीं जानती, एकदम पागल है ये आदमी उनके पीछे, मेरी तो बहुत हालत खराब करता है" लीना ने मेरी शिकायत की.

"अब मेरा क्या कसूर है, तुम लोगों ने इतनी मस्त चूंचियां उगाई ही क्यों? और मीनल रानी, तुम्हारे मम्मों को मसलने को तो कल से मरा जा रहा हूं, तुमने ही रोक लगा दी थी कि दूध बह जायेगा नहीं तो अब तक तो ..."

"कचूमर निकाल देते यही ना? तुम्हारे जैसा जालिम आदमी मैंने आज तक नहीं देखा" लीना बोली. "ललित चल लेट पलंग पर"

मांजी बड़े गर्व से बोलीं "पर ये बात सच है अनिल बेटा कि मीनल के स्तन लाखों में एक हैं, यह सुंदर तो है पर मुझे लगता है हेमन्त ने इसे पसंद सिर्फ़ इसकी छाती देखकर किया था. जिस दिन इसको हम देखने गये थे, तब क्या लो कट ब्लाउज़ पहना था इसने! वैसे हम सब को मीनल बहुत पसंद आयी थी.

मीनल शैतानी भरी आवाज में बोली "हां, मांजी सच कह रही हैं. हेमन्त को तो मैं पसंद आयी ही, ममी को भी इतनी पसंद आयी कि हमारे हनीमून पर भी ममी साथ थीं"

"चल बदमाश कहीं की" सासूमां लाल चेहरे से बोलीं "अरे अब हेमन्त ने ही मुझे कहा कि मां, तू भी साथ चल, मुझसे अकेले संभलेगी नहीं, बहुत गरम और तेज लगती है, तो मैं क्या करती?" ताईजी ने सफ़ाई दी.

मीनल मांजी के पास गयी और उनको चूम कर बोली "अरे ममी, नाराज मत होइये, मैं कंप्लेन्ट थोड़े कर रही हूं. आप साथ थीं तो मुझे भी बहुत अच्छा लगा, वो कहने को दो रूम लिये थे पर ममी हमारे साथ ही रहीं. वे दिन रात तो भुलाये नहीं भूलते, लगातार लाड़ प्यार हुआ मेरा, हेमन्त अलग होता था तो मांजी आगोश में ले लेती थीं."

इस प्यार भरी नोक झोंक से सभी फ़िर मूड में आ गये थे इसलिये अपने आप दूसरा राउंड शुरू हो गया था. ललित को नीचे लिटाकर लीना उसपर उलटी तरफ से चढ़ बैठी थी और लेट कर उसका लंड चूस रही थी. ललित ने शायद फ़िर से कहने की कोशिश की कि दीदी, अब तो चुदवा ले पर उसके पहले ही लीना ने उसके मुम्ह पर अपनी बुर सटाकर उसकी आवाज बंद कर दी थी.

उनका यह सिक्सटी नाइन देखकर मुझे भी फ़िर से मांजी का स्वाद लेने की इच्छा होने लगी. मीनल का भी ले सकता था पर उसे चोदा था और उसकी बुर में मेरा वीर्य भर गया था इसलिये खालिस स्वाद नहीं आता. और इस बार मुझे सासूमां की बुर जरा ठीक से पूरी निचोड़नी थी, अपने खास अंदाज में.

मैं पलंग के सिरहाने से टिक कर बैठ गया और ताईजी को मेरी ओर पैर करके सुला दिया. उनके पैर पकड़कर एक एक अपने दोनों कंधों पर रख लिये. उनकी महकती योनि अब मेरे मुंह के सामने थी. मैंने मुंह डाल दिया और चूसने लगा. ये आसन योनिरसपान के लिये बड़ा अच्छा है, आप चाहें तो अपनी प्रेमिका की बुर इस आसन में पूरी खा सकते हैं. मांजी दो मिनिट में असह्य आनंद में डूब गयीं. पांच मिनिट में उन्होंने दो बार झड़कर उन्होंने अपना तीन चार चम्मच अमरित भी मुझे पिला दिया. पर मैंने चूसना चालू रखा, अभी निचोड़ने की क्रिया तो बस शुरू हुई थी.

ताईजी पांच मिनिट में तड़पने सी लगीं. उनकी झड़ी बुर को मेरी जीभ का स्पर्ष सहन नहीं हो रहा था. "अनिल अब रुका ना बेटे ... आह ... उई मां ... अरे बस ... क्या कर रहे हो दामदजी ..." कहती हुई वे छूटने के लिये उठने की कोशिश करने लगीं. मैंने मीनल को आंख मारी, वो समझ गयी थी कि मैं क्या कर रहा हूं. उठकर उसके दोनों घुटने मांजी के सिर के आजू बाजू टेके और उनके मुंह पर अपनी चूत देकर बैठ ही गयी. मांजी की आवाज ही बंद हो गयी. वे हाथ मारने लगीं तो मीनल ने उनके हाथ पकड़ लिये और ऊपर नीचे होकर उनके मुंह को चोदती हुई खुद भी मजा लेने लगी. मैंने ताईजी के पैर पकड़े कि फटकार कर अलग होने की कोशिश ना करें और जीभ अंदर डाल डाल कर, उनकी पूरी बुर को मुंह में लेकर चूसता रहा. तभी छोड़ा जब अचानक उनका बदन ढीला पड़ गया, शायद सुख के अतिरेक को वे सहन न कर पाई थीं और बेहोश सी हो गयी थीं.

अब तक लीना ने भी ललित को चूस कर झड़ा डाला था और उठ कर बैठ गयी थी और मेरी करतूत देख रही थी. ललित बेचारा भी चुपचाप पड़ा था. थोड़ा फ़्रस्ट्रेटेड दिख रहा था, और क्यों ना हो, दो दिन से बेचारे को झड़ाया तो गया था पर मन भरके चोदने नहीं दिया था. मेरे भी मन में आया कि लीना उस बेचारे के पीछे क्यों ऐसी पड़ी है.

लीना मेरे पास आयी और धीरे से बोली "मेरे पर ऐसा जुल्म करते हो उससे पेट नहीं भरा क्या जो मेरी मां के पीछे पड़ गये?" फ़िर मेरा कान काट लिया. ये प्यार का उलाहना था. उसे मेरा ऐसा चूसना कितना अच्छा लगता था ये मैं जानता हूं.

"अब क्या करूं रानी, जब आम मीठा होता है तो सब रस निकल जाने पर भी कैसे हम छिलका और गुठली चूसते रहते हैं, बस वैसा ही करने का दिल हुआ ममी के साथ"

अब तक मीनल मेरे लंड को अपनी चूत में लेकर बैठ गयी थी. मैंने उसे पटक कर चोद डाला.

सब इतने मीठे थक गये कि शायद सब वैसे ही कब सो गये पता भी नहीं चला. कम से कम मुझे तो नहीं चला क्योंकि जब उठा तो शाम के सात बजने को थे. वैसे ही पड़ा रहा, बड़ा सुकून लग रहा था, मन और शरीर दोनों तृप्त हो गये थे.

मैं पड़ा पड़ा सोच ही रहा था कि अब उठा जाये, पैकिंग वगैरह की जाये. तभी सासूमां कमरे में आयीं. उन्होंने शायद नहा लिया था और कपड़े बदल लिये थे. फूलों के प्रिंट वाली एक सफ़ेद साड़ी और सादा सफ़ेद ब्लाउज़ पहना हुआ था. आकर उन्होंने इधर उधर कुछ सामान ठीक ठाक किया पर मुझे लगता है कि वे आयी थीं सिर्फ़ ये देखने को कि मैं सोया हुआ हूं या जाग गया हूं.

मुझे जगा देखकर उन्होंने पहले तो आंखें चुराईं, फ़िर न जाने क्या सोच कर मेरे पास मेरे सिरहाने आकर बैठ गयीं. मेरे बालों में उंगलियां चलाते हुए बड़े प्यार से बोलीं "अनिल बेटा, आराम हुआ कि नहीं? मुझे लगता है कि हम सब ने मिल कर तुमको जरा ज्यादा ही तकलीफ़ दी है"

मैं बोला "ममीजी, अगर आप वचन दें कि ऐसी तकलीफ़ देती रहेंगी तो मैं अपना सब काम धाम छोड़ कर यहीं आकर पड़ा रहूंगा आप के कदमों में"

वे बस मुस्करायीं. उनकी मुस्कान में एक शांति का भाव था जैसे मन की सब इच्छायें तृप्त हो गयी हों. मैं सरक कर उनके करीब आया और उनकी गोद में सिर दे कर लेट गया. मैंने पूछा "और मांजी, ज्यादा तकलीफ़ तो नहीं हुई ना? याने मैंने जो दोपहर को किया? मुझे अच्छा लगता है, कभी कभी रसीले फलों को ऐसे ही चूस चूस कर खाने का जी होता है. लीना के साथ मैं कई बार करता हूं, हफ़्ते में एकाध बार तो करता ही हूं. आज तो मीनल थी मेरी मदद को, वहां अकेले में तो लीना के हाथ पैर बांध कर करता हूं, बहुत तड़पती है बेचारी पर मजा भी बहुत आता है उसको"

"मैंने पहले ही कहा है कि बड़ी भाग्यवान है मेरी बेटी. इतना तेज न सहनेवाला सुख पहले नहीं चखा मैंने कभी अनिल ... सच में पागल हो जाऊंगी लगता था. बाद में जब नींद से उठी तो बहुत आनंद सा भरा था नस नस में ... अब जल्दी जल्दी आया करो बेटे, ऐसे साल में एकाध बार आना हमें गवारा नहीं होगा" ताईजी बोलीं.

"अब आप ही आइये ताईजी हमारे यहां, सब को लेकर आइये"

"अब कैसा क्या जमता है दामादजी, वो देखती हूं. वैसे आई तो शायद अकेली ही आ जाऊंगी, वैसे भी हेमन्त और मीनल को कहां छुट्टी मिलती है. लीना को कहीं जाना हो तो आ जाऊंगी, कहूंगी कि हो आ, तेरे पति की देख रेख के लिये मैं हूं ना!" मैं उनकी ओर देख रहा था इसलिये यह कहते ही वे शर्मा सी गयीं. उनकी मेरे साथ अकेले रहने की इच्छा थी याने! मैंने भी सोचा कि यार अनिल, तेरी सास तो तेरे पर बड़ी खुश है.

"ताईजी, ये बहुत अच्छा सोचा आप ने, लीना का कुछ प्लान है अगले महने में एक हफ़्ते का, तब आप आ जाइये. बस मैं और आप रहेंगे. ना जमे तो लीना रहेगी तब भी आइये ना. आप को अष्टविनायक की यात्रा करवा दूंगा, लीना तो आयेगी नहीं, हम दोनों ही चलेंगे, आराम से चलेंगे, दो तीन दिन होटल में रहना पड़ेगा" मैंने उनकी आंखों में आंखें डाल कर कहा.

ताईजी फिर से नयी नवेली दुल्हन जैसी शरमा गयीं. मैं उनके खूबसूरत चेहरे को देख रहा था जिसको गालों की लाली ने और सुंदर बना दिया था. अचानक मेरे दिल में आया कि शायद मुझे उनसे इश्क हो गया है, याने चुदाई वाला इश्क तो पहले से ही था, परसों से था जब लीना के मायकेवालों का असली रूप मैंने देखा था. पर अब सच में वे मुझे बड़ी प्यारी सी लगने लगी थीं. लीना को भी शायद मेरे दिल का उस समय का हाल पता चलता तो एक पल को वो डिस्टर्ब हो जाती कि कहीं उसकी मां ही उसकी सौत तो नहीं बन रही है. अब जब मैंने हंसी हंसी में उनको अष्टविनायक के टूर पर ले जाने की बात की तो मैं कल्पना करने लगा कि वे और मैं रात का खाना खाने के बाद अपने कमरे में जाते हैं और फ़िर ...? मुरादों की रातें ...? बेझिझक अकेले में उनसे जो मन आये वो करने का लाइसेंस?

इस वक्त मेरे मन में दो तरह की वासनायें उमड़ रही थीं. एक खालिस औरत मर्द सेक्स वाली ... बस पटककर चोद डालूं, मसल मसल कर उनके मुलायम गोरे बदन को चबा डालूं, जहां मन चाहे वहां मुंह लगा कर उनका रस पी जाऊं ये वासना .... दुसरी ये चाहत कि उनको बाहों में भर लूं, उनके सुंदर मुखड़े को चूम लूं, उनके गुलाबी पंखुड़ी जैसे होंठों के अमरित को चखूं ...

इनमें से कौनसी वासना जीतती ये कहना मुश्किल है. पर मेरा काम आसन करने को लीना अचानक अंदर आ गयी. मैं चौंका नहीं, वैसा ही मांजी की गोद में सिर रखे पड़ा रहा. लीना भी तैयार होकर आयी थी, एक अच्छा ड्रेस पहना था. लगता था बाहर जाने की तैयारी करके आई थी. हमें उस ममतामयी पोज़ में देख कर बोली "वाह ... जमाई के लाड़ प्यार चल रहे हैं लगता है मां"

"क्यों ना करूं?" मांजी सिर ऊंचा करके बोलीं "है ही मेरा जमाई लाखों में एक. अब ये बता तू कहां चली? आज घर में ही रहेंगे, कहीं जाकर टाइम वेस्ट होगा ऐसा कह रही थी ना तू? आखिर आज रात की ट्रेन है तुम लोगों की"

"ठहरा था पर काम है जरा .... मैं और भाभी मार्केट हो कर आते हैं"

ताईजी ने लीना की ओर देखा जैसे पूछ रही हों कि ऐसा क्या लेना है मार्केट से? लीना झुंझलाकर बोली "अब मां ... भूल गयी सुबह मैं और मीनल क्या बातें कर रहे थे?"

"हां ... वो ... सच में तुम दोनों निकली हो उसके लिये? मुझे लगा था मजाक चल रहा है. ठीक है, करो जो तुम्हारे मन आये" ताईजी पलकें झपका कर बोलीं

"तू बैठ ऐसे ही और अपने जमाईसे गप्पें कर. पर अब अच्छी बच्ची जैसे रहना, कुछ और नहीं करना शैतान बच्चों जैसे" लीना आंख मार कर बोली "और ललित अपने कमरे में है, उसको डिस्टर्ब मत करना, सो रहा है" लीना जाते जाते ताईजी के गाल पर प्यार से चूंटी काट कर गयी.

मुझे लगा कि दाल में कुछ काला है. "लगता है कुछ गड़बड़ चल रहा है, लीना का दिमाग हमेशा आगे रहता है उल्टी सीधी बातों में" मैंने कमेंट किया. सोचा शायद मांजी कुछ बतायें. पर वे बस बोलीं "अब करने दो ना उनको जो करना है, मन बहलता है उनका. मैं तो पड़ती ही नहीं उन लड़कियों के बीच में"

मांजी की गोद में सिर रखे रखे अब मुझपर फिर से मस्ती छाने लगी थी. उनके बदन की हल्की सी मादक खुशबू मुझे बेचैन करने लगी थी. मैंने अपना चेहरा उनकी जांघों के बीच और दबा दिया और उस नारी सुगंध का जायजा लेने लगा. वे कुछ नहीं बोलीं, बस मेरे बालों में उंगलियां चलाती रहीं. अनजाने में मेरा एक हाथ में उनकी साड़ी पकड़कर उसको ऊपर करने की कोशिश करने लगा तो मांजी ने मेरा हाथ पकड़ लिया. मैं समझ गया कि शायद अभी मूड ना हो या वे कुछ देर का आराम चाहती हों.

पर मुझे इस समय उनके प्रति जो आकर्षण लग रहा था वह बहुत तीव्र था. मैं उठ कर बैठ गया और उनको आगोश में ले लिया. "ममी ... आप मुझे पागल करके ही छोड़ेंगी लगता है, इतनी सुंदर हैं आप" कहकर फ़िर चुंबन लेते हुए साड़ी के पल्लू के ऊपर से ही मैंने उनका एक मुलायम स्तन पकड़ लिया. इस बार उन्होंने विरोध नहीं किया.

अगले आधा घंटे बस हमारे प्यार भरे चुंबन चलते रहे. बीच बीच में एकाध बातें भी करते थे पर अधिकतर बस खामोशी से तो प्रेमियों जैसी हमारी चूमा चाटी जारी थी. उस उत्तेजना में मैंने किसी तरह उनके ब्लाउज़ के बटन खोल लिये थे और अब उनके सफ़ेद ब्रा में बंधे मांसल स्तन मेरी आंखों के सामने थे. कहने में अजीब लगता है कि ब्रा में लिपटे वे उरोज मुझे इतना आकर्षित कर रहे थे क्योंकि पिछले दो दिनों में मैंने उनको पूरा नग्न भी देखा था और तरह तरह से उनके नग्न बदन का भोग भी लगाया था, याने उनके बदन का कोई भी अंग मेरे लिये नया नहीं था फ़िर भी ब्रा के कपों में कसे हुए उन आधे खुले स्तनों की सुंदरता का जो खुमार था वो उनके नग्न उरोजों में भी नहीं आया था. मैंने बार बार उनको ब्रा के ऊपर से चूमा, ब्रा के नुकीले छोर में फंसे उनके निपलों को कपड़े के ऊपर से ही चूसा, हल्के से चबाया भी.

ताईजी भी शायद मेरे दिल का हाल समझ गयी थीं क्योंकि बिना कुछ कहे वे भी अब भरसक मेरे चुंबनों का जवाब दे रही थीं. जब मैं बार बार उनकी ब्रा को चूमता या ब्रा के कपड़े पर से ही उनके निपल चूसता तो वे मेरा चेहरा अपने सीने पर छुपा लेतीं.

"बहुत अच्छे लगे ना मेरे स्तन बेटा तुम्हे?" बीच में वे भाव विभोर होकर बोलीं. मैंने बस सिर हिलाया. उन्होंने मुझे सीने से चिपटा लिया. बुदबुदाईं "बीस साल पहले देखते तो .... "

मैं उनके स्तनों में चेहरा दबा कर बोला "मुझे तो अभी मस्त लग रहे हैं मांजी ... इनके साथ क्या क्या करने का मन होता है मेरा ..."

मेरा लंड अब कस के खड़ा हो गया था. लगातार संभोग के बाद अब गोटियां थोड़ी दुख रही थीं पर फ़िर भी लंड एकदम मस्ती में आ गया था. मेरी सासूमां का जलवा ही कुछ ऐसा था. लगता है और कुछ देर हो जाती तो हमारी चुदाई फ़िर शुरू हो जाती. वैसे लीना कुछ कहती नहीं पर जिस तरह से वह हमें जतला कर गयी थी कि अब कुछ मत करना, उससे लगता था कि थोड़ा चिढ़ जरूर जाती.

फ़िर लीना की आवाज सुनाई दी. वह मीनल से कुछ बोल रही थी. शायद जान बूझकर जोर से बोल रही थी कि हम आगाह हो जायें. मैं मांजी से अलग होकर बैठ गया. ताईजी ने फटाफट अपने कपड़े ठीक किये और उठ कर एक अलमारी खोल कर उसमें कुछ जमाने लगीं.

लीना अंदर आयी. हम दोनों को ऐसा अलग अलग देख कर उसे शायद आश्चर्य हुआ पर वो खुश भी हुई. "अरे वा, दोनों कैसे आराम से बात चीत कर रहे हैं. मुझे तो लगा था कि जिस तरह से सास दामाद की आपस में मुहब्बत हो गयी है, वे न जाने किस हाल में मिलेंगे"

"चल बदमाश, तेरे को तो बस यही सूझता है" मांजी बोलीं. वैसे लीना की बात सच थी.

लीना मेरी ओर मुड़कर बोली "चलो अनिल, पैकिंग कर लें."

"तुमको जो खरीदना था वो सब मिल गया लीना बेटी?" मांजी ने पूछा.

"हां मां, बस एक दो ही चीजें चाहिये थीं, बाकी तो सब है घर में. अब जल्दी चलो अनिल"

मैं लीना के पीछे हो लिया. जाते जाते जब मुड़ कर देखा तो सासूमां मेरी ओर देख रही थीं. उनकी नजरों में इतने मीठे वायदे थे कि वो नजर एकदम दिल को छू गयी.

हमारे रूम में आकर मैंने अपना सूटकेस ऊपर पलंग पर रखा. लीना कपड़े रखने लगी. दो मिनिट बाद मुझे अचानक समझ में आया कि वो बस मेरे ही कपड़े रख रही है, खुद के नहीं. हम दोनों मिलकर बस एक बड़ी सूटकेस लाये थे.

"अपने कपड़े रखो ना डार्लिंग, या दूसरी बैग लेने वाली हो?" मैंने कहा.

लीना मेरे पास आयी और मेरे गले में बाहें डाल कर शोखी से बोली "डार्लिंग ... तुम नाराज तो नहीं होगे? ... वो क्या है कि मैं नहीं आ रही तुम्हारे साथ ... मीनल और मां दोनों चाहती हैं कि हम रुक जायें ... अब तुम्हारा तो ऑफ़िस है पर मैं सोच रही हूं कि मैं एकाध दो हफ़्ते को रुक जाती हूं"

मेरा चेहरा देख कर मुझे चूम कर बोली "सॉरी मेरे राजा ... मैं जानती हूं कि तुम्हारा एक मिनिट नहीं चलेगा मेरे बिना पर प्लीज़ ... ट्राइ करूंगी कि एक हफ़्ते में लौट आऊं. अब मां का भी तो खयाल करना है, उसके साथ मुझे टाइम ही नहीं मिला"

मैंने बेमन से कहा "ठीक है लीना रानी, अब तुम कह रही हो तो मैं कैसे मना कर सकता हूं? तुम्हारी कोई बात मैंने टाली है कभी"

लीना मुझे लिपटकर बोली "वैसे तुमको बिलकुल सूखे सूखे अकेले नहीं जाने दूंगी बंबई. लता को भेज रही हूं तुम्हारे साथ"

"लता कौन?" मैंने अचरज से पूछा?

"अरे भूल गये? कल नहीं देखा था मेरी मौसेरी बहन, बहुत कुछ मेरे जैसी दिखती है. लगता है भूल गये. खैर जाने दो, अब मिल लेना, आती ही होगी. पैकिंग हो गया तो अब चलो बाहर" हाथ पकड़कर मुझे लीना बाहर ले गयी. जाते जाते बोली "अब उसके साथ कुछ ऊल जलूल नहीं करना, सीधी है बेचारी."

"नहीं करूंगा, उतनी समझ है मेरे को. पर ऐसे क्यों भेज रही हो लता को इस वक्त मेरे साथ, वो क्या करेगी वहां, मैं तो ऑफ़िस में रहूंगा, वो बोर हो जायेगी"

"बोर क्यों? घुमाना बंबई रोज. ऑफ़िस से जल्दी आ जाया करना" वो ऐसे कह रही थी जैसे ये सब बड़ा आसान हो. मैं जरा धर्मसंकट में था. बीच में ये भी लगता कि ये फ़िर से लीना का कोई खेल तो नहीं है.

हम बाहर आये. ड्राइंग रूम में कोई नहीं था. लीना ने आवाज लगाई "भाभी कहां हो?"

मीनल के कमरे से आवाज आयी "यहां हूं ननद रानी, लता आई है, उससे जरा गप्पें लड़ा रही थी"

"अरे बाहर आओ ना. अनिल भी है यहां"

"दो मिनिट लीना. ये लता शरमा रही है अनिल के सामने आने को." मीनल की आवाज आयी.

लीना बोली "अब आ भी जाओ, अनिल कोई दूसरे थोड़े हैं. शरमाने की जरूरत नहीं है" फ़िर मुझसे बोली "फ़िर से मेकप कर रही होगी, सुंदर है ना, जरा सेन्सिटिव है, मेकप ठीक ठाक करके ही आयेगी देखना"

"अच्छा रानी पर ये तो बताओ, कि बंबई आने का ये प्लान अचानक कैसे बना? याने लता ने कहा कि मैं जाना चाहती हूं कि तुम दोनों ननद भौजी ने मिलके उसको उकसाया है?" मैंने धीमे स्वर में पूछा. लीना पर मेरा बिलकुल विश्वास नहीं है, ऐसे नटखट खेल वो अक्सर खेलती है और फ़िर मेरी परेशानी देखकर खुश होती है.

"अब क्या फरक पड़ता है? तुम बस ये देखो कि एक सुंदर कमसिन अठारह बरस की कन्या तुम्हारे साथ, अपने जीजाजी के साथ बंबई जा रही है, हफ़्ते भर अकेली रहेगी उनके साथ, अब और कोई होता तो अपनी किस्मत पर फूला नहीं समाता और तुम हो कि शंका कुशंका कर रहे हो"

मैं चुप हो गया. मन ही मन कहा कि रानी, तेरी नस नस पहचानता हूं इसलिये शंका कर रहा हूं. वैसे एक बात जरूर है, लीना ने जब जब मुझे ऐसा फंसाया है, उसका नतीजा मेरे लिये बड़ा मीठा ही निकला है हमेशा.

पांच मिनिट हो गये तो मैंने भी आवाज दी. आखिर अपना जीजापन दिखाकर उस कन्या की झेंप मिटाना भी जरूरी था. "अब आ भी जाओ भई लता, कहो तो मैं आंखें बंद कर लेता हूं"

मीनल की आवाज आयी "अनिल, मैं ले आती हूं उसको, बहुत शरमा रही है"

मीनल मुस्कराते हुए बाहर आयी. उसने एक लड़की का हाथ पकड़ रखा था और उसे खींचती हुई अपने पीछे ला रही थी. मुझे तो ऐसा कुछ दिखा नहीं कि वह ज्यादा शरमा रही हो, हां मंद मंद हंस रही थी.

लड़की सच में सुंदर थी. छरहरा नाजुक बदन था, डार्क ब्राउन कलर की साड़ी और स्लीवलेस ब्लाउज़ पहने थी. हाथों में एक एक फ़ैशन वाला कॉपर का कंगन था और एक स्लिम गोल्ड वाच थी. गोरे पैरों में ऊंची ऐड़ी के सैंडल थे. छरहरा बदन था, एकदम स्लिम, ऊंचाई लीना से तीन चार इंच कम थी. चेहरा काफ़ी कुछ लीना जैसा था, काफ़ी कुछ क्या, बहुत कुछ. बस बदन लीना के मुकाबले एकदम स्लिम था, लीना अच्छी खासी मांसल है, मोटी नहीं पर जहां मांस होना चाहिये वहां उसका एवरेज से ज्यादा ही मांस है. वजन थोड़ा ज्यादा होता और ऊंची होती तो एकदम लीना की जुड़वां लगती. हल्का मेकप किया था और होंठों पर हल्की गुलाबी लिपस्टिक थी. आंचल में से छोटे छोटे पर तन कर खड़े उरोजों का उभार दिख रहा था.

"याद आया? कल ही तो मिलवाया था बड़े घर में" लीना ने कमर पर हाथ रखकर मुझसे पूछा. मैं अचरज में पड़ गया. ऐसी सुंदर कमसिन कन्या, लीना से मिलते जुलते चेहरे की और मुझे याद ना रहे! अब क्या बोलूं ये भी नहीं समझ पा रहा था.

मेरी परेशानी देखकर मीनल आंचल मुंह में दबा कर हंसने लगी. मैंने सोचा कि कुछ तो बोलना पड़ेगा. बोला "हेलो लता. सॉरी कल जल्दी जल्दी में इतने लोगों से मिला कि ... पर चलो, अब बंबई आ रही हो तो जान पहचान हो ही जायेगी. वैसे सच में तुम चल रही हो या ये इन दोनों ने मिलकर कुछ शरारत की है" लीना और मीनल की ओर इशारा करके मैं बोला.

"पहले ये बताइये दामादजी कि हमारी लता कैसी है? बंबई की लड़कियों के मुकाबले जच रही है या नहीं?" मीनल बोली. लीना ने भी उसकी हां में हां जोड़ी. लता खड़ी खड़ी बस जरा सा शरमाते हुए सब को देख देख कर मुस्करा रही थी.

मैंने कहा "ऐसे किसी का कंपेरिज़न करने की बहुत बुरी आदत है तुमको लीना. वैसे मैं सच कहूं तो इस प्रश्न में कोई दम नहीं है. लता इज़ वेरी प्रेटी, बहुत फोटोजेनिक है"

मीनल और लीना ने पट से एक दूसरे से हाथ पर हाथ मारा जैसा आज कल का फ़ैशन है ये बताने को कि कैसे बाजी मार ली.

"सिर्फ़ सुंदर कहकर नहीं बचोगे दामादजी. अंग अंग का निरीक्षण करके डिस्क्राइब करो लता की सुंदरता. लता, जरा घूम ना, एक चक्कर तो लगा, अनिल को भी देखने दे तेरा जलवा"

अब अपने ही बड़े घर की, जहां एक अलग डिसिप्लिन चलता है, एक लड़की को ये लोग इस तरह से बोल रही थीं यह देखकर मेरा माथा ठनका कि कुछ गड़बड़ न हो जाये. लता क्या सोच रही होगी. मैंने उसकी ओर देखा तो वो भी मेरी ओर देख रही थी. कुछ शरमा कर बोली "अब ये बहुत हो गया भाभी, इस सब की क्या जरूरत है?"

बोल लता रही थी पर आवाज ललित की थी. एल पल को मैं हक्का बक्का रह गया पर फ़िर एकदम से दिमाग में रोशनी हुई. ये ललित ही था लड़की के रूप में.

मैंने दाद दी मीनल और लीना की कि कितने अच्छे से सिंगार किया था. बाकी सब तो ठीक है, आसानी से किया जा सकता है पर सिर में जो विग लगाया होगा वो बड़ा खूबसूरत था, बड़े खूबसूरत नरम सिलन शोल्डर लेंग्थ बाल थे. और ललित को भी मैं मान गया, साड़ी पहनकर सबके लिये चलना आसान नहीं है पर वह इस तरह से चल कर आया था जैसे जिंदगी भर साड़ी पहन रहा हो.

उधर लीना सिर पर हाथ मारकर हंस रही थी और ललित पर चिढ़ रही थी "सत्यानाश कर दिया उल्लू कहीं के. मैंने कहा था मत बोलना, अब बोल के सब भांडा फोड़ दिया. अभी तो अनिल को हम वो घुमाते कि ... "

ललित झेंप रहा था, लीना की डांट से और मेरा क्या रियेक्शन होगा इसके डर से.

मैंने तारीफ़ की "अरे उसको क्यों बोल रही हो, उसने ए-वन काम किया है ... मुझे जरा भी पता नहीं चला. यार ललित मान गये ... हैट्स ऑफ़. वैसे लता के बजाय ललिता नाम रख लो." फ़िर लीना की ओर मुड़ कर बोला "तुम्हारा और मीनल का भी जवाब नहीं, अब बॉलीवुड में ड्रेसिंग का काम देख लो. पर ये सब किसलिये? ललित कितना सुंदर है ये दिखाने को? मैंने तो पहले ही देख लिया है, बड़ा हैंडसम क्यूट लड़का है"

"लो, ललित आखिर जीजाजी तेरे फ़ैन हो ही गये, अब तो आराम से जा तू उनके साथ, तुझे जरूर बहुत इंटरेस्ट से ये बंबई घुमायेंगे" लीना बोली. फ़िर मेरे पास आकर मेरा हाथ पकड़कर बोली "वो क्या है कि ललित का बहुत मन है बंबई घूमने का. अपने साथ आने की जिद कर रहा था. अब इतनी जल्दी रिज़र्वेशन तो मिलेगा नहीं, ये कह रहा था कि दीदी, मैं नीचे फर्श पर सो लूंगा ट्रेन में पर वो एकाध खड़ूस टीसी फंस गया तो. अब कल से मीनल और मां ये भी कह रहे हैं कि लीना, रुक जा और हफ़्ते दो हफ़्ते के लिये तो मेरे दिमाग में एक खयाल आया कि मैं रुक जाती हूं और ललित मेरी जगह पर जा सकता है. हां उसे मेरे नाम पर सफ़र करना पड़ेगा, और वो भी स्त्री वेश में. ये तैयार हो गया, वैसे भी इसे बचपन से बड़ा शौक है लड़कियों के कपड़े पहनने का. मैंने कहा कि पहन कर दिखा और अनिल के सामने जा और वो भी पहचान ना पाये तो जरूर जा बंबई"

मीनल हंस कर बोली "मैदान मार लिया ललित ने आज, क्या खूबसूरत लड़की बना है"

लीना मुझे बोली "अनिल डार्लिंग, ललित शर्मायेगा बताने में पर अब तुमसे क्या छिपाना, ये ललित बचपन में ही नहीं, अभी भी लड़कियों के कपड़े पहनने का बहुत शौकीन है. सिर्फ़ हमारे ड्रेस, सलवार कमीज़ साड़ी ही नहीं, ब्रा और पैंटी भी पहनने का बड़ा शौक है इसको. मेरी ओर लीना की जब मौका मिलता है, पहन लेता है. ये तो मां की भी ब्रेसियर पहन ले पर वो उसको थोड़ी ढीली होती है."

इतने में सासूमां कमरे में आयीं. ललित को देखा और फ़िर लीना को बोलीं "तो तुम दोनों मानी नहीं, लड़की बना ही दिया बेचारे ललित को. अब ऐसे ट्रेन में भेजने के पहले अनिल को तो पूछ लिया होता, पर तुम दोनों कहां मेरा कहा मानती हो. और देखो कैसा शर्मा रहा है मेरा बच्चा. ललित बेटे, तेरे को ऐसे नहीं जाना हो तो साफ़ कह दे, इन दोनों छोरियों के कहने में ना आ, ये तो महा शैतान हैं दोनों"

लीना ने चिढ़ कर अपनी मां को कहा "अब तू चुप रह मां. इन बातों में अपना सिर मत खपा. देखो अनिल डार्लिंग, ललित तुम्हारे साथ जायेगा, बेचारे का बहुत मन है, घुमा देना उसको बंबई. और ये इसी स्त्री रूप में जायेगा मेरी जगह, टीसी को भी कोई शक नहीं होगा, और ट्रेन सुबह तड़के दादर पहुंचती है, ठीक से सुबह होने के पहले तुम लोग घर भी पहुंच जाओगे."

ललित मेरी ओर देख रहा था, बेचारा टेंशन में था कि मैं क्या कहता हूं.

मैंने सोचा कि बेचारे को और टंगाकर रखना ठीक नहीं है. उसकी पीठ थपथपा कर मैंने कहा "जाने दो ललित, जैसा ये कहती है वैसा ही करते हैं. इनको तो ऐसे टेढ़े आइडिया ही आते हैं और हम कर भी क्या सकते हैं! सुंदर कन्याओं की हर बात मानना ही पड़ती है. चल, तू लीना बनकर ही चल, आगे मैं संभाल लूंगा" उसकी पीठ पर हाथ फेरते वक्त उसके महीन ब्लाउज़ के नीचे से ललित ने पहनी हुई टाइट ब्रा के स्ट्रैप मेरी उंगलियों को महसूस हुए, न जाने क्यों एक मादक सी टीस मेरे सीने में दौड़ गयी.

ललित की बांछें खिल गयीं. मीनल बोली "देख, तू फालतू टेंशन कर रहा था कि जीजाजी क्या कहेंगे. अरे तू उनका लाड़ला साला है, जो मांगेगा वो मिलेगा"

सासूमां बोलीं "दामादजी, तुमको जमेगा ना? तुम्हारा ऑफ़िस होगा रोज, उसमें कहां इस घुमाओगे फिराओगे?"

"आप चिंता ना करें, मैं देख लूंगा, ऑफ़िस से जल्दी आ जाया करूंगा, दो दिन छुट्टी ले लूंगा पर ललित को खुश कर दूंगा, उसे जो चाहिये, वो उसको मिलेगा"

लीना ने ललित को हाथ पकड़कर मेरे साथ सोफ़े पर बिठाते हुए कहा "अब चुपचाप बैठो यहां, मैं फोटो निकालती हूं"

हम दोनों के काफ़ी फोटो लिये लीना ने, हर तरह के ऐंगल से. फ़िर लीना रानी जरा अपनी हमेशा की शैतानी पर उतर आयी. "अब कमर में हाथ डालो अनिल ... और पास खींचो ना उसको ... अब उसे उठाकर जरा गोद में बिठा लो ... अब कस के उसको भींच लो ... अब जरा किस करो ..." बेचारा ललित ये सब करते वक्त जरा परेशान था, एक बार बोला भी "अब दीदी ... ये सब क्या कर रही हो ..." पर लीना ने डांट कर उसे चुप कर दिया. "एकदम चुप ... एक भी लफ़्ज़ कहा तो तेरी ट्रिप कैंसल ... हां चलो अनिल ... अरे हाथ जरा उसके सीने पर रखो ना ... ऐसे"

अब ये सब हो रहा था तब अनजाने में मेरा लंड सिर उठाने लगा. याने भले ही वो ललित रहा हो पर उसका कमनीय रूप, उसने लगाया सेंट ... और अपनी बांहों में महसूस हो रहा उसका जवान छरहरा चिकना बदन जो काफ़ी कुछ हद तक एक कन्या के बदन से कम नहीं था ... अब इस सब का मेरे ऊपर असर होना ही था. किसी तरह मैंने कंट्रोल किया, पता नहीं ललित ने मेरी गोद में बैठे वक्त मेरे लंड का कड़ा होना महसूस किया कि नहीं पर बोला कुछ नहीं.

फोटो सेशन खतम होने पर लीना ललित से प्यार से बोली "अब मुंह ना लटकाओ, ये सब फोटो अपने प्राइवेट हैं, घर के बाहर किसी को नहीं दिखाऊंगी"

ललित पल्लू संभाल रहा था. मैंने लीना से कहा "डार्लिंग, ललित को जरा टॉप जीन्स वगैरह पहना दो, ऐसे साड़ी संभालने में बेचारे को ट्रेन में परेशानी होगी."

लीना को बात जच गयी. "हां ललित ऐसा ही करते हैं, मैंने तो ये सोचा ही नहीं. जा, वो मेरी जीन्स और टॉप पहन ले"

ललित टॉक टॉक टॉक करते हुए मीनल के कमरे में जाने लगा. उसके सैंडल एकदम मस्त आवाज कर रझे थे जैसे लड़कियों के हाइ हील करते हैं. मेरे मन में आया कि हाइ हील पहनकर चलते हुए उसे कंफ़र्टेबल लग रहा है, जरूर जनाब घर में बहुत बार पहन कर घूमते होंगे.

मीनल बोली "अरे यहीं बदल ले ना, शरमाता क्यों है? सब एक साथ नंगे एक दूसरे से लिपटे हुए थे तब तो नहीं शरमाया तू, अब क्यों शरमा रहा है. और अंदर ब्रा और पैंटी तो है ना, एकदम नंगी भी नहीं होगा तू"

मैं समझ गया कि ललित इसी लिये शरमा रहा होगा कि उसके जीजाजी उसको ब्रा और पैंटी में देख कर क्या कहेंगे. तब तक मीनल जाकर लीना की जीन्स और टॉप ले आयी थी. ललित वहीं मीनल के कमरे के दरवाजे पर खड़ा होकर कपड़े बदलने लगा. साड़ी और ब्लाउज़, पेटीकोट निकालने के बाद ललित जीन्स पहनने लगा. उसने अभी भी विग पहना हुआ था इसलिये एकदम एक कमसिन अर्धनग्न सुंदरी जैसा लग रहा था. उसके गोरे बदन पर काली ब्रा और पैंटी निखर आयी थी. बस एक फरक था कि उसकी पैंटी में उभार था, जितना आम तौर पर मर्दों का उभार दिखता है उससे ज्यादा था. मैं मन ही मन मुस्कराया, सोचा - बेटा ललित ... मजा आ रहा है ... मस्ती चढ़ रही है औरतों के कपड़े पहनकर. फ़िर खुद की ओर ध्यान गया तो मेरा भी हाल कोई अलग नहीं था, ललित के उस चिकने बदन को ब्रा और पैंटी में देखकर आधा खड़ा हो गया था.

ललितने जीन्स और टॉप पहने. अब वह कॉलेज की छोरी जैसा कमनीय लग रहा था. मैंने भी निकलने की तैयारी करना शुरू कर दी. मीनलने जल्दी से ललित का एक बैग पैक किया. बीच में सासूमां उनसे कुछ बोल रही थीं. शायद बता रही हों कि वहां ज्यादा तकलीफ़ ना देना अनिल को. फ़िर उन्होंने ललित को सीने से लगाकर पटापट चूम डाला. आखिर लाड़ला छोटा बेटा था उनका.

हम खाने बैठे. पिज़्ज़ा मंगाया गया था. खाते खाते सबको मस्ती चढ़ी थी. मीनल और लीना तो हाथ धोकर ललित के पीछे लगी थीं, ताने कस रही थीं, उल्टा सीधा कुछ कुछ सिखा भी रही थीं उसके कान में कुछ बोलकर. वह बेचारा बस झेंप कर पिज़्ज़ा खाता हुआ हंस रहा था.

निकलने के आधा घंटा पहले मीनल ने मुझे अंदर बुलाया. उसके कमरे में गया तो उसने मुझे अपने बिस्तर पर बिठाया और फ़िर गाउन के आगे के बटन खोलकर अपने भारी भारी भरे हुए मम्मे बाहर निकाले. "भूल गये क्या अनिल? आज दोपहर को ही बोले थे ना कि रात को मुझे पूरा पिला देना?"

"ऐसी बात मैं कैसे भूलूंगा मीनल, अब इतनी भागम भाग में तुमको और तंग नहीं करना चाहता था. पर जाते जाते ये अमरित मिल रहा है, एकाध दो दिन का दिलासा तो मिल जायेगा पर फ़िर ये प्यास कौन बुझायेगा मीनल?"

"अब खुद अपनी बीवी का दूध पी सको ऐसा कुछ करो." मीनल बोली और मुझे बिस्तर पर लिटाकर मेरे मुंह में अपना स्तनाग्र देकर लेट गयी. पूरा दोनों स्तनों का दूध मुझे पिलाया. दूध पीते पीते मेरा ऐसा तन्नाया कि क्या कहूं. मीनल ने उसे पैंट के ऊपर से ही पकड़कर कहा "आज रात ये तकलीफ़ देगा दामादजी. वैसे लता ... मेरा मतलब ललिता है साथ में पर अब वो पहले ट्रेन में फ़र्स्ट क्लास रहते थे वैसे कूपे भी नहीं है नहीं तो ललिता इस बेचारे को कुछ आराम जरूर देती, है ना अनिल" उसने मुझे आंख मारकर कहा.

"क्या मीनल, ऐसा मजाक मत करो. अरे आखिर मेरा साला है, भले ही लड़की के भेस में हो और लड़कियं से सुंदर दिखता हो. उसे तो मैं एकदम वी आइ पी ट्रीटमेंट देने वाला हूं"

स्टेशन जाने के लिये जब हम निकले तो लीना मुझे बाजू में ले गयी "अच्छा डार्लिंग, जरा खयाल रखना मेरे भैया का. मैं स्टेशन नहीं आ रही, फालतू हम दोनों को साथ देखकर कोई जान पहचान वाला बातें करने के लिये आ जाये तो लफ़ड़ा हो जायेगा. सिर्फ़ तुम दोनों होगे तो यही समझेंगे कि लीना अपने पति के साथ वापस जा रही है. वैसे ललित कैसा लगा ये बताओ, मेरा मतलब है ललिता कैसी लगी? अब सच बताना"

मैंने उस किस करते हुए कहा "एकदम हॉट और सेक्सी. पर तुमको आगाह करके रख रहा हूं जानेमन, तुमने शायद खुद अपनी सौत बना कर मेरे साथ भेज रही हो. अब कभी बहक कर याद ना रहे कि ये ललित है, ललिता नहीं, उसके साथ कुछ कर बैठूं तो मुझे दोष मत देना. और जरा उसको भी बता दो, नहीं तो घबरा कर चीखने चिल्लाने लगेगा"

"मैं बीच में नहीं पड़ती, दोनों एडल्ट हो, जो करना है वो करो. वैसे एक बात समझ लो कि ललित तुमसे ज्यादा बोलता नहीं इसका मतलब ये नहीं कि वो तुम्हारे साथ अनकंफ़र्टेबल है, वो बस जरा शर्मीला है. मां तो कह रही थी कि कल से कई बार तुम्हारी तारीफ़ कर चुका है मां के सामने"

फ़िर बाहर आते आते धीरे से बोली "एक बात और, उसके कपड़ों के साथ मैंने कुछ अपने खास कपड़े ..." एक आंख बंद करके हंसकर आगे बोली " ... रख दिये हैं. और घर में तो ढेरों हैं मेरे हर तरह के कपड़े. कभी उसे ललिता बनाकर डिनर को ले जा कर भी देखो, मैं बेट लगाती हूं कि कोई पहचान नहीं पायेगा. अगर मेरी बहुत याद आये कभी तो ललित को कहना कि यार ललिता बन जा और फ़िर उसके साथ गप्पें मारते बैठना."

"और अगर मन चाहे तो उसे ये भी कहूं कि ललिता बनकर मेरे बेडरूम में मेरे बिस्तर पर साथ सोने चल, लीना की बहुत याद आ रही है?"

"मुझे चलेगा, तुम लोग देखो" लीना बोली "ट्राइ करने में हर्ज नहीं है. बस उसका खयाल रखना जरा, मेरा प्यारा सा नाजुक सा भाई है"

"बिलकुल वैसा ही खयाल रखूंगा जैसा तुम्हारा रखता हूं डार्लिंग" मैंने कहा. टैक्सी में बैठते मैंने कहा.


हमने जैसा सोचा था, वैसा ही हुआ. ललित को किसी ने नहीं पहचाना कि वह लड़का है. टी सी ने भी टिकट चेक करके वापस कर दिया. रात के दस बज ही गये थे और अधिकतर लोग अपनी अपनी बर्थ पर सो गये थे. ललित पर किसी की नजर नहीं गयी. याने एक दो लोगों ने और एक दो स्त्रियों ने देखा पर बिलकुल नॉर्मल तरीके से जैसा हम किसी सुन्दर लड़की की ओर देखते हैं.

हम दोनों की बर्थ ऊपर की थी. मैं उसे चढ़ने में मदद करने लगा तो वो रुक कर मेरी ओर देखने लगा कि क्या कर रहे हो जीजाजी, मुझे मदद की जरूरत नहीं है. बोला नहीं यह गनीमत है क्योंकि उसे सख्त ताकीद दी थी कि बोलना नहीं, दिखने में वो भले लड़की जैसा नाजुक हो, उसकी आवाज अच्छी खासी नौजवान लड़के थी. मुझे उसके कान में हौले से कहना पड़ा कि यार लड़की है, ऐसा बिहेव कर ना, ऊपर चढ़ने में सहारा लगता है काफ़ी लड़कियों को. तब उसकी ट्यूब लाइट जली.

सुबह तड़के हम दादर पहुंचे. टैक्सी करके सीधे घर आये. गेट बंद था इसलिये बाहर ही उतर गये. बैग भी हल्के थे. अंदर आते आते गेट पर सुब्बू अंकल मिले. हमारी बाजू की बिल्डिंग में रहते हैं, ज्यादा जान पहचान या आना जाना नहीं है, पर हाय हेलो होता है हमेशा. सुबह सुबह घूमने जाते हैं. हमें देख कर उन्होंने ’गुड मॉर्निंग अनिल, गुड मॉर्निंग लीना’ किया और आगे बढ़ गये. ललित थोड़ा सकपका गया. ऊपर आते वक्त लिफ़्ट में मैंने उसकी पीठ पर हाथ मार कर कहा "कॉंग्रेच्युलेशन्स, सुब्बू अंकल को भी तुम लीना ही हो ऐसा लगा. याने जिसकी रोज की जान पहचान या मुलाकात नहीं है, उसे तुम्हारे और लीना के चेहरे में फ़रक नहीं लगेगा, कम से कम अंधेरे में."

फ़्लैट में आने पर हमने बैग अंदर रखे. मैंने चाय बनाई, तब तक ललित इधर उधर घूम कर फ़्लैट देख रहा था. हमारा फ़्लैट वैसे पॉश है, चार बेडरूम हैं.

"क्या ए-वन फ़्लैट है जीजाजी!" ललित बोला.

"अरे तभी तो कब से बुला रहे हैं तुम सब लोगों कि बंबई आओ पर कोई आया ही नहीं. चलो तुमसे शुरुआत तो हुई. अब मांजी, मीनल भी आयेंगी ये भरोसा है मेरे को. राधाबाई ने तो प्रॉमिस किया मुझे नाश्ता खिलाते वक्त कि वे दो महने बाद आने वाली हैं"

"हां जीजाजी, वे क्यों ना आयें, आप ने उन सब को क्लीन बोल्ड कर दिया दो दिन में" ललित बड़े उत्साह से बोला. अब वह मुझसे धीरे धीरे खुल कर बात करने लगा था. "मां तो कब से आप के ही बारे में बोल रही है"

"अच्छा? और तुम क्लीन बोल्ड हुए क्या?" मैंने मजाक में पूछा. ललित कुछ बोला नहीं, बस बड़ी मीठी मुस्कान दे दी मेरे को जैसे कह रहा हो कि अब लड़की के भेस में आपके साथ आया हूं तो और क्या चाहते हो मुझसे.

चाय पीकर मैं नहाने चला गया. ललित ने अपना सूटकेस गेस्ट बेडरूम में रखा और कपड़े जमाने लगा. मैंने नहा कर कपड़े पहने और ऑफ़िस जाने की तैयारी करने लगा. टाई बांधते बांधते ललित के कमरे में आया तो ललित चौंक गया. थोड़ा टेन्शन में था "आप कहीं जा रहे हैं जीजाजी?"

"हां ललित, मुझे ऑफ़िस जाना जरूरी है, मैंने आज जॉइन करूंगा ये प्रॉमिस किया था, नहीं तो वहीं नहीं रुक जाता सबके साथ? इसलिये आज तो जाना ही पड़ेगा. कल से देखूंगा, थोड़ा ऑफ़ या हाफ़ डे वगैरह मिलता है क्या. हो सके तो जल्दी आ जाऊंगा. फ़िर देखेंगे आगे का प्लान, घूमने वूमने चलेंगे"

ललित ने अपना विग निकाला और बाल सहला कर बोला "ठीक है जीजाजी, मैं भी कपड़े बदल लेता हूं"

मेरे मन में अब एक प्लान सा आने लगा था. वैसे वो कल से ही था जबसे अपने खूबसूरत साले को लड़की के भेस में देखा था. रात को ट्रेन में उसे मेरे बाजू वाली ऊपर की बर्थ पर सोते देखकर मेरा लंड अच्छा खासा खड़ा हो गया था जैसे भूल ही गया हो कि ये लीना नहीं, ललित है. मैंने सोचा कि इसे लड़की समझ कर वैसे ही थोड़ा फंसाने की कोशिश करने में कोई हर्ज नहीं है, देखें इस के मन में क्या है. "पर क्यों बदल रहा है? मुझे तो लगा था कि तेरे को ऐसे कपड़े पहनना अच्छा लगता है"

"बहुत अच्छा लगता है जीजाजी" ललित बड़ी उत्सुकता से बोला "पर कोई आ जाये तो ... अब आप भी नहीं हैं घर में"

"अरे मेरी जान, कोई नहीं आने वाला. अगर भूले भटके आया भी और बेल बजी तो दरवाजा मत खोलना. मैं तो कहता हूं कि अब ऐसा ही रह, मजा कर, अपने मन की इच्छा पूरी करने का ऐसा मौका बार बार नहीं मिलता"

"नहीं जीजाजी ..." ललित बोला. " ... कहीं कोई गड़बड़ ना हो जाये" लगता है थोड़ा शरमा रहा था. पर बात जच गयी थी, सारे दिन वैसे ही लड़की बनके रहने की बात से लौंडा मस्त हो गया था.

"अरे कर ना अपने मन की. यहां वैसे भी कौन तुझे पहचानता है? लीना मुझे बता रही थी कि तेरे को यह बचपन से कितना अच्छा लगता है. और ये शरमाना बंद कर, साले ...." मैंने प्यार से कहा "मेरे सामने बिना शरमाये अपनी दीदी की - मेरी बीवी की - चूत चूस रहा था ... मुझे तेरी मां और भाभी पर चढ़ा हुआ बड़े आराम से बिना शरमाये देख रहा था और अब सिर्फ़ अपना शौक पूरा करने में शरमा रहा है? लानत है यार! अरे यही तो टाइम है अपने मन की सब मस्ती कर लेने का. बस तू है और मैं हूं, और कोई नहीं है यहां"

ललित को बात जच गयी थी पर अभी भी उसका मन डांवाडोल हो रहा था. मैंने सोचा कि थोड़ा ललचाया जाये इन जनाब को "ललित डार्लिंग ..." मैंने बिलकुल उस लहजे में कहा जैसा मैं लीना को बुलाता था. "तेरे को एक इन्सेन्टिव देता हूं. एक हफ़्ते बाद लीना आने वाली है. तब तक तू अगर ऐसा ही लीना बन के रहेगा ... याने बाहर वाले लोगों के लिये लीना ... मैं तुझे ललिता ही कहूंगा ... तो जो कहेगा वह ले कर दूंगा"

"पर लोग मुझे पहचान लेंगे. घर आये लोगों से मैं क्या बोलूंगा?" ललित ने शंका प्रकट की. लड़का तैयार था पर अभी भी थोड़ा घबरा सा रहा था. "और अपने बाजू वाले फ़्लैट में जो हैं वो? वो तो जरूर बेल बजायेंगे जब पता चलेगा कि आप आ गये हैं"

"अरे वह मेहता फ़ैमिली भी अभी यहां नहीं है, एक माह को वे बाहर गये हैं. उनसे भी हमारा बस हेलो तक का ही संबंध है. वे भी सहसा बेल बजाकर नहीं आते. अरे ये बंबई है, यहां इतना आना जाना नहीं होता लोगों का. यहां लोग होटल जैसे रहते हैं. तू चिंता ना कर. मजा कर. और मैं सच कह रहा हूं. बेट लगा ले, अगर तू हफ़्ता भर लड़की बन के रहा तो जो चाहे वो ले दूंगा"

"जो चाहे याने जीजाजी ...?" लड़का स्मार्ट था, देख रहा था कि जीजाजी को कितनी पड़ी है उसे लड़की बना कर रखने की.

"स्मार्ट फोन .. टैब्लेट ... लैपटॉप ... ऐसी कोई चीज" मैंने जाल फैलाया. "बोल ... है तैयार?"

लैपटॉप वगैरह सुनकर ललित की बांछें खिल गयीं. "ठीक है जीजाजी ... पर बाहर जाते वक्त?"

"वो भी लड़की जैसा जाना पड़ेगा, ललिता बनकर, ऐसे ही सस्ते में नहीं मिलेगा तुझे स्मार्ट फोन. और यही तो मजा है कि लोगों के सामने लड़की बनकर जाओ, जैसे कल ट्रेन में आये थे. और एक बार बाहर जाने के बाद इतनी बड़ी बंबई में कौन तुझे पहचानेगा? और वैसे भी बेट यही है ना डार्लिंग कि तू सबको एक सुंदर नाजुक कन्या ही लगे. जरा देखें तो तेरे में कितनी हिम्मत है. अपने मन की पूरी करने को किस हद तक तैयार है तू? तो पक्का? मिलाओ हाथ"

साले का हाथ भी एकदम कोमल था. मैं सोचने लगा कि हाथ ऐसा नरम है तो ... फ़िर बोला "ललित, एक बार और ठीक से सब समझ ले. घर में भी लड़की जैसे रहना पड़ेगा. ऐसा नहीं कि कोई देख नहीं रहा है तो लड़के जैसे हो लिये. याने लिंगरी ... ब्रा ... पैंटी ... सब पहनना पड़ेगी"

"पर वो क्यों जीजाजी?" ललित बेचारा फिर थोड़ा सकपका सा गया.

"अरे तेरे को पहनने में मजा आता है और मुझे देखने में. इतना नहीं करेगा मेरे लिये? अरे अब लीना, मेरी वो चुदैल बीवी, तेरी वो शैतान दीदी यहां नहीं है तो उसकी कमी कम से कम मेरी आंखों को तो ना खलने दे, वो घर में बहुत बार सिर्फ़ ब्रा और पैंटी पहन कर घूमती है, तू भी करेगा तो मुझे यही लगेगा कि लीना घर में है"

ललित सोच रहा था कि क्या करूं. मैंने कहा "एक रास्ता है, ब्रा और पैंटी ना पहनना हो तो नंगा रहना पड़ेगा घर में. नहीं तो बेट इज़ ऑफ़. वैसे भी हम सब अधिकतर नंगे ही थे पिछले दो दिन तेरे घर में. तू काफ़ी चिकना लौंडा है, ब्रा पैंटी ना सही, वैसे ही देखकर शायद मेरी प्यास बुझ जायेगी. पर हां ... तेरे को नंगा देखकर बाद में मैं कुछ कर बैठूं तो उसकी जिम्मेदारी तेरी"

"नहीं जीजाजी ..." शरमा कर ललित बोला "मैं पहनूंगा ब्रा और पैंटी" उसने विग फ़िर से सिर पर चढ़ा लिया.

"शाबास. अब मैं नीचे से ब्रेड बटर अंडे बिस्किट वगैरह ले आता हूं. आज काम चला लेना. कल से देखेंगे खाने का. और तब तक तू जा और नहा ले. मैं लैच लगाकर निकल जाऊंगा. बेल बंद कर देता हूं, किसी को पता भी नहीं लगेगा कि हम वापस आ गये हैं"

सामान लाकर मैंने डाइनिंग टेबल पर रखा. गेस्ट रूम में देखा तो बाथरूम से शावर की आवाज आ रही थी. मन में आया कि अंदर जाकर उस चिकने शर्मीले लड़के को थोड़ा तंग किया जाये, पर फ़िर सोचा जाने दो, बिचक ना जाये, जरा और घुल मिल जाये तो आगे बढ़ा जाये, आखिर लीना का लाड़ला भाई था. और किसी लड़के के साथ, खूबसूरत ही सही, इश्क लड़ाने की कोशिश मेरे लिये भी पहली ही बार थी. इसलिये वैसे ही ऑफ़िस निकल गया.

मैं ऑफ़िस छूटने के पहले ही ही आ गया. करीब पांच बजे थे. लैच की से दरवाजा खोला. ड्राइंग रूम में कोई नहीं था. अंदर आकर देखा तो ललित अपने बेड पर सोया हुआ था. विग पहना था और लीना की एक नाइटी भी पहन ली थी. नायलान की नाइटी में से उसकी ब्रा और पैंटी दिख रही थी. याने मैंने जो बेट लगायी थी उसकी शर्त बचारा बिलकुल सही सही पूरा कर रहा था.



और उसका एक हाथ अपनी नाइटी के अंदर और फ़िर पैंटी के अंदर था. अपना लंड पकड़कर सोया था. मुझे लगा कि मुठ्ठ मार ली होगी पर पास से देखा तो ऐसा कुछ नहीं था. हां नींद में भी उसका लंड आधा खड़ा था, एकदम रसिक मिजाज का साला था मेरा.



उसका वह रूप बड़ा रसीला था. क्षण भरको उसकी पैंटी के उभार को नजरंदाज करें तो एकदम मस्त चुदाई के लिये तैयार लड़की जैसा लग रहा था. स्किन का काम्प्लेक्शन किसी कोमल कन्या से कम नहीं था, होंठ भी मुलायम और गुलाबी थे. मेरा लंड खड़ा होने लगा. मैंने सोचा कि सच में लीना की बहन, मेरी साली होती तो कब का चख चुका होता. अब यह जानकर भी वह एक लड़का है, उसकी खूबसूरती मुझे कोई कम नहीं लग रही थी बल्कि अब उसकी वजह से मेरी चाहत में एक अजीब तरह की तीख आने लगी थी, शायद टाबू करम का अपना अलग स्वाद होता है. मुझे खुद की इस चाहत पर भी थोड़ा अचरज हुआ. अब तक काफ़ी तरह की मस्ती कर चुका था, अधिकतर लीना के साथ और कुछ उसे बिना बताये. पर अब तक उसमें दूसरे पुरुष के साथ रति का समावेश नहीं था. शायद ललित की बात ही निराली थी, लीना का छोटा लाड़ला भाई होना, मेरी कोई साली ना होना, ललित का चिकना रूप और लीना से मिलता जुलता चेहरा, ये सब बातें मिल जुलकर गरम मसाला बन गयी थीं.

किसी तरह मैंने अपने आप पर काबू किया और अपने कमरे में आकर लेट गया. ट्रेन में ठीक से सोया नहीं था इसलिये नींद आ गयी. दो घंटे बाद खुली. फ़िर मैंने भी थोड़ा सामान जमाया, घर को ठीक ठाक किया. ललित और देर से उठा. किशोरावस्था की जवानी में खूब नींद आती है. किसी का बाहर जाने का मूड नहीं था इसलिये मैंने घर पर पिज़्ज़ा मंगवा लिया.

डिनर खतम होते होते साढ़े नौ बज गये. आधे घंटे बाद लैपटॉप पर ईमेल वगैरह देखहर मैं सब कपड़े निकाल कर सिर्फ़ शॉर्ट्स में ड्राइंग रूम में बैठ गया. ये मेरी रोज की आदत है. ललित वहीं था, टी वी लगाकर प्रोग्राम सर्फ़ कर रहा था. बेचारा थोड़ा बोर हुआ सा लग रहा था. मुझे देखकर थोड़ा संभल कर बैठ गया. शायद मेरे ब्रीफ़ में आधे उठे लंड का उभार देखकर थोड़ा कतरा गया होगा. अब रात को मेरी ये हालत होती ही है. और सामने वो सुंदर सी छोकरी - छोकरा भी था. टी वी देखते देखते एक दो बार उसकी नजर अपने आप मेरे ब्रीफ़्स पर गयी.

"ललित डार्लिंग, चलेगा ना अगर मैं ऐसे बैठूं? वो क्या है कि लीना और मैं रहते हैं और ऐसे ही फ़्री स्टाइल रहते हैं ... बल्कि इससे भी ज्यादा" वैसे कहने की जरूरत नहीं थी, उसने मेरा लंड कई बार देखा था, वो भी अपनी मां और भाभी की चूत में चलते हुए.

ललित बस थोड़े शर्मीले अंदाज से मुस्करा दिया. मैंने कहा "तू भी चाहे तो फ़्री हो जा. वो नाइटी पहनने की जरूरत नहीं है. हां विग लगाये रखो मेरे राजा, क्या करूं, बड़ी प्यारी छोकरी जैसा लगता है तू विग पहन कर"

"ब्रा और पैंटी रहने दूं जीजाजी?" उसने नाइटी निकालते हुए पूछा.

"तेरी मर्जी. जैसे में मजा आता है वैसा कर. वैसे ब्रा और पैंटी पहनकर तू बिलकुल लीना जैसा लगता है. वो तो रात को हमेशा ऐसे ही बैठती है. और शादी के बाद पहली बार मैं ऐसा अकेला हूं घर में, तू है तो लीना ही यहां है ऐसा लगता है"

ललित ने नाइटी निकाली और जाकर अंदर रख आया. फ़िर मेरे सामने वाले सोफ़े पर बैठ गया. मैंने उससे कहा "ललित, कुछ भी कहो, तुम्हारे यहां सब एक से एक हैं. याने इतनी सारी सुंदर और सेक्सी औरतें एक ही फ़ैमिली में होना ये कितने लक की बात है. और ऊपर से उन सब से ये सुख मिलना याने इससे बड़ा सुख और क्या होगा. बड़ा तगड़ा भाग्य लेकर पैदा हुआ है तू. और राधाबाई भी हैं, उनके बारे में जो कहा जाये वो कम है"

ललित अब थोड़ा फ़्री हो गया था "हां जीजाजी. पर राधाबाई बड़ी मतवाली भले ही हों, मुझे तो उनसे डर लगता था पहले"

"मैं अक्सर अकेला पकड़ा जाता था घर में. मेरा स्कूल सुबह का था. लीना दीदी कॉलेज जाती थी और हेमन्त भैया और मीनल भाभी सर्विस पर. मां रहती थी पर अक्सर दोपहर को महिला मंडल चली जाती थी. बस राधाबाई मेरे को पकड़कर ... "

"क्यों? तेरे को मजा नहीं आता था? जवानी की दहलीज पर तो और मजा आता होगा."

"हां जीजाजी पर मुझे जिसमें मजा आता था उसके बजाय उनको जिसमें मजा आता था, वही मुझसे जबरदस्ती करवाती थीं"

"तुमने शिकायत की क्या उनकी कभी?"

ललित मुस्करा दिया "अब किससे शिकायत करूं, राधाबाई तो सबकी प्यारी थीं. घर की मालकिन जैसी ही थीं करीब करीब, जो वे कहतीं, उसे कोई टालता नहीं था. आपने उनकी वो स्पेशल गुझिया खाई ना?"

मैंने हां कहा "मानना पड़ेगा, दाद देनी पड़ेगी उनकी इस तरह की सोच की"

"मुझे तो हमेशा देती हैं. आजकल कॉलेज से आता हूं तो अक्सर तैयार रखती हैं. पर खिलाने के बाद आधा घंटा वसूली करती हैं."

"एक बात बताओ ललित" मैंने बड़े इंटरेस्ट से पूछा "इस सब का तुम्हाई पढ़ाई पर असर नहीं पड़ा? याने ऐसा मेरे साथ होता मेरी टीन एज में तो मैं शायद फ़ेल हो जाता हर साल."

"वो जीजाजी असल में ... याने मां बहुत स्ट्रिक्ट है इस मामले में, वैसे इतनी प्यारी और सीधी साधी है पर अगर मार्क्स कम हो जायें तो बिथर जाती है. एक बार बारहवीं में प्रीलिम में फ़ेल हो गया था तो एक हफ़्ते तक मेरा उपवास करा दिया"

"उपवास याने ...?"

"मुझे कट ऑफ़ कर दिया, न खुद पास आती थी न किसी को आने देती थी. मीनल भाभी को भी नहीं, राधाबाई को भी नहीं. एक रात को तो हाथ पैर भी बांध दिये थे मेरे. बड़ी बुरी हालत हुई मेरी, पागल होते होते बचा. तब से पढ़ाई को निग्लेक्ट करना ही भूल गया मैं"

ललित अब सोफ़े पर अपने पैर ऊपर करके घुटने मोड़ कर बड़ी नजाकत से बैठा था, लड़कियों के फ़ेवरेट पोज़ में. उसकी चिकनी गोरी छरहरी जांघें कमाल कर रही थीं. अब वह जान बूझकर कर रहा था तो बड़ी स्टडी की थी उसने लड़कियों के हाव भाव की. यदि अनजाने में कर रहा था तो शायद अब तक वह लड़की के रूप से काफ़ी घुल मिल गया था. एक क्षण को मुझे भ्रम हुआ कि यह सच में बड़ी तीखी छुरी मेरे सामने बैठी है. लंड कस के खड़ा हो गया और ब्रीफ़ के सामने का फ़ोल्ड हटा कर बाहर आ गया.

ललित का ध्यान उसपर गया तो उसके गाल लाल हो गये. पर उसने नजर नहीं हटाई. मैंने नीचे अपने तन्नाये लंड को देखा और बोला "देखो ललिता डार्लिंग, देखो, अपने रूप का कमाल देखो, एकदम बेचैन हो गया ये साला तुमको देख कर"

ललित अब लड़की के रूप में और भिनता जा रहा था. उसकी नजर नहीं हट रही थी मेरे लंड से, अगर सच में कोई गरम कन्या बैठी होती तो उसकी नजर जैसी भूखी होती वैसी ही भूख ललित की नजर में थी. मैंने अपने पास सोफ़े को थपथपा कर कहा "अब ललिता डार्लिंग, जरा यहां आ जाओ ना, ऐसे दूर कब तक बैठोगी. जरा तुमसे जान पहचान बढ़ाने का मौका तो दो"

ललित मेरे पास आ कर बैठ गया. उसकी पैंटी में अब अच्छा खासा तंबू सा बन गया था. मैंने उसकी कमर में हाथ डाला और पास खींच लिया. क्षण भर को उसका बदन कड़ा हो गया जैसे प्रतिकार करना चाहता हो, पर फ़िर उसने अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया. मैंने उसके गाल चूम कर कहा "ललिता डार्लिंग ... अब मैं तुमको ललिता ही कहा करूंगा ... मेरे लिये तू अब एक बहुत खूबसूरत लड़की है ... मेरी प्यारी साली है ... बीवी से बढ़कर मीठी है ... ठीक है ना?"

उसने गर्दन डुला कर हां कहा. मैंने उसे पूछा "ललिता ... तुम्हारे हेमन्त भैया ने तुम्हारा ये रूप नहीं देखा अब तक? कभी किस किया तेरे को ... याने ऐसे?" उसकी ठुड्डी पकड़कर मैंने उसका चेहरा अपनी ओर किया और उसके मुलायम होंठों का चुंबन लिया. ललित एकदम शांत बैठा रहा. न मेरा विरोध किया न मुझे साथ दिया. किस खतम होने पर बोला "मैं सिर्फ़ भाभी या दीदी के सामने ही ब्रा पैंटी पहनता ... पहनती हूं जीजाजी"

"याने जैसे मां भाभी लीना आपस में प्यार मुहब्बत कर लेते हैं , वैसे तेरे में और तेरे भैया में कभी नहीं हुई?"

"नहीं जीजाजी. भैया को मेरे इस शौक के बारे में याने ये लिंगरी पहनना वगैरह - मालूम नहीं है. वैसे हम जब सब साथ होते हैं और चुदाई ... याने आपस में कर रहे होते हैं तब हेमन्त भैया कभी मेरी कमर पकड़कर जोर से धक्के मारना सिखाता है ... खास कर जब मैं मीनल भाभी पर चढ़ा होता हूं तो कभी मेरे गाल चूम कर और कभी पीठ पर हाथ फ़िराकर मुझे उकसाता है कि कचूमर बना दे तेरी भाभी का ... पर और कुछ नहीं करता"

मैंने फ़िर से उसका चुंबन लिया "बड़ा नीरस है तेरा भैया ... इतनी मीठी मिठाई और चखी नहीं अब तक" इस बार ललित ने भी मेरे चुंबन के उत्तर में मेरे होंठ थोड़ी देर के लिये अपने होंठों में पकड़ लिये.

फ़िर मैंने उसे उठाकर गोद में ही बिठा लिया. उसने थोड़ा प्रतिकार किया तो मैं बोला "अब मत तरसाओ ललित राजा ... मेरा मतलब है ललिता रानी. इस भंवरे को इस फूल का जरा ठीक से रसपान तो करने दो"

उसके बाद मैं काफ़ी देर उससे चूमा चाटी करता रहा. मजे की बात यह कि काफ़ी देर तक मैंने उसे कहीं और हाथ नहीं लगाया. अपने आप को मानों मैंने हिप्नोटाइज़ कर लिया था कि यह एक नाजुक लड़की है जो मेरे आगोश में है. फ़िर उसकी ब्रा पर हाथ रखा. कप अच्छे भरे भरे से थे, ठोस और स्पंज जैसे गुदाज, करीब करीब असली स्तनों जैसे. लगता है लीना और मीनल ने ब्रा और अंदर की फ़ाल्सी बड़े प्यार से समय देकर चुनी थी. मैं स्तनमर्दन करने लगा. ललित ने मेरी ओर देखा जैसे सच में उसके मम्मे मसले जा रहे हों. बड़ी प्यास थी उसकी निगाहों में, जैसे उन नकली स्तनों को दबवाकर उसे असली मम्मे दबवाने का मजा आ रहा हो.

"एकदम मस्त ललिता रानी ... एकदम रसीले फ़ल हैं तेरे ... खा जाने का मन होता है" कहकर मैंने झुक कर ब्रा की नोकों को चूम भी लिया.

ललित ने हुमककर मेरी जीभ अपने होंठों में ले ली और चूसने लगा. अब वह लंबी लंबी सांसें ले रहा था. लगता है एकदम गरमा गया था. अब भी मैंने उसकी कमर के नीचे कहीं हाथ नहीं लगाया था. आखिर शुरुआत उसी ने की. धीरे धीरे उसका हाथ सरककर मेरे लंड पर पहुंच गया. लंड को मुठ्ठी में भरके वो बस एक मिनिट बैठा ही रहा, जैसे मनचाही मुराद मिल गयी हो, मुझे जरूर पटापट चूमता रहा.

फ़िर धीरे से बोला "क्या मस्त है आपका जीजाजी ... इतना सख्त और तना हुआ"

मैंने उसके कान के नीचे चूम कर कहा "तुझे पसंद आया मेरी जान. मैं तो परसों ही समझ गया था जब तेरी नजर उसपर जमी हुई थी"

"उस दिन मां को आप चोद रहे थे तब कितना सूज गया था, ये सुपाड़ा भी लाल लाल हो गया था. और आप चोद रहे थे तो मां की चूत से कैसी पुच पुच आवाज आ रही थी ... मुझे ... मुझे एकदम से ... याने मैं तो फिदा हो गया इसपर जीजाजी" ललित धीमी आवाज में रुक रुक कर बोला. बेचारा शरमा भी रहा था और मस्ती में भी था.

"तुम्हारी मां भी तो एकदम गरम गरम रसीली चीज है मेरे राजा ... मेरा मतलब है मेरी रानी ... वो भी इस उमर में ... और ऐसी कि जवान लड़कियों को भी मात कर दे ... इतनी गीली तपती बुर हो तो फच फच आवाज होगी ही."

"जीजाजी ... मुझे तो मां पर बहुत जलन हो रही थी कि आप का लंड उसको मिल रहा है ... जीजाजी मैं इसे ठीक से देखूं?" अचानक मेरी गोद से उतरकर मेरे बाजू में बैठते हुए ललित ने पूछा. उसकी आंखों में तीव्र चाहत उतर आई थी.

जवाब में मैं हाथ उठाकर सिर के पीछे लेकर टिक कर बैठ गया "कर ले मेरी जान जो करना है ... तुझे आज जो करना है वो कर ले, जैसे खेलना है इससे वैसे खेल ले"

ललित मेरे सामने सोफ़े पर बैठ गया और मेरा लंड अपनी दो मुठ्ठियों में पकड़ लिया. "कितना लंबा है जीजाजी, दो मुठ्ठियों में भी पूरा नहीं आता, सुपाड़ा ऊपर से झांक रहा है. मेरा तो बस एक मुठ्ठी में ही ..."

मैंने उसके मुंह पर अपना हाथ रख दिया. "ललिता रानी .... अब भूल मत कि तू लड़की है ... क्यों बार बार ललित के माइंडसेट में आ जाती है? जैसी भी है, तू बड़ी प्यारी है"

ललित ने एक दो बार लंड को ऊपर नीचे करके मुठियाया और फ़िर उसके सुपाड़े पर उंगली फिराने लगा. "कितना सिल्किश है जीजाजी ... एकदम चिकना ...और इतना फूला हुआ"

"तभी तो तेरी दीदी मेरे जैसे इन्सान को भी अपने साथ बहुत कुछ करने देती है नहीं तो मेरी क्या बिसात है तेरी दीदी के आगे!"

"नहीं जीजाजी, आप कितने हैंडसम हैं, नहीं तो दीदी शादी के छह महने के बाद घर आती? वो भी बार बार बुलाने पर? ये नसें कितनी फूल गयी हैं जीजाजी!" सुपाड़े के साथ साथ अब ललित उंगली से मेरे लंड के डंडे पर उभर आयी नसें ट्रेस कर रहा था.

मेरे लंड से खेलते खेलते उसने जब अनजाने में अपनी जीभ अपने गुलाबी होंठों पर फ़िरायी तो मैं समझ गया कि साला चूसने के मूड में था, चूसने को मरा जा रहा था पर हिम्मत नहीं हो रही थी. उसके वो नरम होंठ देखकर मैं भी कल्पना कर रहा था कि वे होंठ अगर मेरे लंड के इर्द गिर्द जमे हों तो? लंड और तन गया.

"कितना सख्त है जीजाजी ... जैसे कच्चा गाजर ..." उसकी हथेली अब फ़िर से मेरे सुपाड़े पर फ़िर रही थी.

मुझे भी अब लगने लगा था कि मस्ती ज्यादा देर मैं नहीं सह पाऊंगा. ललित के विग के बालों में से उंगलियां चलाते मैं बोला "तूने खाया है क्या कभी कच्चा गाजर?"

वो शरमा कर नहीं बोला. फ़िर मुझे पूछा "दीदी इसको कैसे चूसती है जीजाजी? याने जैसा मेरे को कर रही थी मुझे लिटा कर या ..."

"अरे उसके पास बहुत तरीके हैं. कभी लिटा कर, कभी मेरे बाजू में लेटकर, कभी मेरे सामने नीचे जमीन पर बैठकर ... पर बहुत देर इस डंडे से खेल खेलने का मजा लेना हो तो वो मेरी गोद में सिर रखकर लेट जाती है और घंटे घंटे खेलती है" कहते ही मुझे लगा कि गलती कर दी, यह नहीं बताना था. अब अगर ये सेक्सी छोकरा ... छोकरी वैसे कर बैठे तो? मैं घंटे भर रुकने के बिलकुल मूड में नहीं था.

पर अब पछताना बेकार था क्योंकि ललित ने मेरी बात मान ली थी. बिना और कुछ कहे वह मेरी जांघ पर सिर रखकर सो गया. फ़िर उसने लंड पकड़कर अपने गाल पर रगड़ना शुरू कर दिया. उसके नरम नरम गोरे गालों पर सुपाड़े के घिसे जाने से मुझे ऐसा हो गया कि पकड़कर उसके मुंह में पेल दूं. पर मैंने किसी तरह सब्र बनाये रखा.

अब ललित के भी सब्र का बांध टूट गया था, शर्म वगैरह भी पूरी खतम हो गयी थी. उसने लंड को पकड़कर जीभ से उसकी नोक पर थोड़ा गुदगुदाया. जैसे टेस्ट देख रहा हो. फ़िर चाटने लगा. उसकी जीभ मेरे सुपाड़े की तनी चमड़ी पर चलनी थी कि मेरी सिर घूमने लगा. सहन नहीं हो रहा था, लीना भी ऐसा करती है और मुझे आदत हो गयी है पर यहां ये चिकना लड़का था, लड़की नहीं और सिर्फ़ इस बात में निहित निषिद्ध यौन संबंध एक ऐसी शराब थी जो दिमाग में चढ़नी ही थी.

"ओह लीना रानी ... मेरी लीना .... मेरा मतलब है ललिता डार्लिंग ... मुझे अब मार ही डालोगी ..." फ़िर झुक कर ललित का गाल चूम कर मैंने कहा "एक पल को भूल ही गया था कि तू है ... वैसे अब जरा देख ललिता ... लंड थरथरा रहा है ना?"

"हां जीजाजी"

"याने अब ज्यादा देर नहीं है ... लंड को इस तरह से मस्ताने के बाद या तो उसे चूस लेना चाहिये या चुदवा लेना चाहिये" मैंने उसकी ब्रा मसलते हुए कहा.

"दीदी क्या करती है जीजाजी?"

"इस हद तक आकर तो वो चूस लेती है क्योंकि इसके बाद ज्यादा देर चुदवाना पॉसिबल नहीं है. आखिर मैं भी इन्सान हूं मेरी रानी, कोई साधु वाधु नहीं हूं कि सहता रहूं. अब तू क्या करेगी ललिता जान ... तू ही डिसाइड कर"

ललित शायद पहले ही डिसाइड कर चुका था, क्योंकि चुदवाने का ऑप्शन तो था नहीं, याने मेरे लिये था पर वो बेचारा क्या चुदवाये, कैसे चुदवाये, चूत तो थी नहीं, उसके पास बस एक ही चीज थी चुदवाने के लिये, और ये पक्का था कि वह खुद उसको ऑफ़र नहीं करेगा.

उसने मुंह बाया और मेरा सुपाड़ा मुंह में भर लिया. थोड़ा चूसा और फ़िर मुंह से निकाल दिया. उसके मुंह में सुपाड़ा जाना था कि मेरी नस नस में खुमार सा भर गया. इसलिये सुपाड़ा जब उसने निकाला तो बड़ी झल्लाहट हुई. पर मैंने प्यार से पूछा "क्या हुआ रानी? अच्छा नहीं लगा?"

"बहुत रसीला है जीजाजी, बड़ी चेरी जैसा पर ... कहीं आप को मेरे दांत ना लग जायें?" मेरी ओर देख कर ललित बोला.

"अरे तू क्यों चिंता करती है ललिता जान? नहीं लगेंगे, दुनिया में तू पहला ... पहली नहीं है जिसने लंड चूसा है. मुझे आदत है, लीना तो क्या क्या करती है इसके साथ चूसते वक्त!"

"जीजाजी ... दीदी ... मां ... भाभी जब मेरा चूसती हैं तो पूरा निगल लेती हैं, कभी थूकती नहीं ... वो अच्छा लगता होगा उनको? ... " उसको वीर्य निगलने का थोड़ा टेन्शन था. मैंने सोचा कि अभी तो समझाना जरूरी है नहीं तो बिचक गया तो मेरी के.एल.डी हो जायेगी, इतना सब करने के बाद मुठ्ठ मारनी पड़ेगी. अब तो मुझे ऐसा लग रहा था कि सीधे जबरदस्ती अपना लौड़ा उसके हलक में उतार दूं और पटक पटक कर उसका प्यारा सा मुंह चोद डालूं.

"अब ये मैं क्या बताऊं डार्लिंग ... हां ये सब मस्त चूसती हैं जैसे चासनी पी रही हों, अब अच्छा ही लगता होगा. पर तू चिंता मत कर डार्लिंग, मैं तेरे को बता दूंगा, तू तुरंत मुंह से बाहर निकाल लेना"

उसे दूसरी बार नहीं कहना पड़ा. झट से उसने मुंह खोला और मेरा पूरा सुपाड़ा मुंह में लेकर चूसने लगा.

मैंने उसके गाल सहलाये और हौले हौले आगे पीछे होने लगा, उसके मुंह में लंड पेलने लगा. फ़िर ललित का हाथ मेरे लंड की डंडे पर रखकर उसकी मुठ्ठी बंद की और उसका हाथ आगे पीछे किया. वह समझ गया कि मैं क्या चाहता हूं. सुपाड़ा चूसते चूसते वह मेरी मुठ्ठ मारने लगा.

अब रुकना मेरे लिये मुश्किल था, मैं रुकना भी नहीं चाहता था, ललित का गीला कोमल मुंह और उसकी लपलपाती जीभ - इस कॉम्बिनेशन को झेलना अब मुश्किल था. मैं जल्दी ही झड़ने की कगार पर आ गया, पर मैंने उससे कुछ नहीं कहा, बल्कि जैसे ही मैं झड़ा और मेरे मुंह से एक सिसकी निकली, मैंने कस के उसका सिर अपने पेट पर दबा लिया और लंड उसके मुंह में और अंदर पेलकर सीधा उसके मुंह में अपनी फ़ुहारें छोड़ने लगा.

बेचारा ललित एकदम हड़बड़ा सा गया. मेरे झड़ने का पता उसे तब चला जब उसके मुंह में गरम चिपचिपी फ़ुहार छूटने लगी. उसने अपना सिर हटाने की कोशिश की पर मैं कस के पकड़ा हुआ था. आखिर उसने हार कर अपनी कोशिश छोड़ दे और चुपचाप निगलने लगा. मैं बस ’आह’ ’आह’ ’आह मेरी डार्लिंग ललिता’ ’आह’ कहता हुआ ऐसे दिखा रहा था जैसे मुझे इस नशे में पता ही ना हो कि क्या हो रहा है.

ललित को पूरी मलाई खिलाने के बाद ही मैंने उसका सिर छोड़ा. आंखें खोल कर उसकी ओर देखा और फ़िर बोला "सॉरी ललित ... मेरा मतलब है ललिता ... क्या चूसा है तूने ... लीना भी इतना मस्त नहीं चूसती, मेरा कंट्रोल ही नहीं रहा"

ललित बेचारा उठकर बैठ गया. अब भी कुछ वीर्य उसके मुंह में था पर उसे समझ में नहीं आ रहा था कि निगल जाये या थूक दे. जिस तरह से वह मेरी मेरी ओर देख रहा था, मैं समझ गया कि सोच रहा है कि थूक डालूंगा तो जीजाजी माइंड कर लेंगे. इसलिये चुपचाप निगल गया.

"सॉरी मेरी जान ... सॉरी ... तुझे शायद अच्छा नहीं लग रहा टेस्ट. वो लीना का क्या है कि झड़ने के बाद भी चूसती रहती है, बूंद बूंद निचोड़ लेती है, तेरी मां और भाभी भी वही करती है, इसलिये मुझे ध्यान ही नहीं रहा कि तेरी पहली बार है. अब नहीं करूंगा"

"नहीं जीजाजी, कोई बात नहीं, चूसने में बहुत मजा आ रहा था मेरे को. वैसे टेस्ट बुरा नहीं है, खारा खारा सा है" ललित ने जीभ मुंह में घुमाते हुए कहा. "कितना चिपचिपा है, लेई जैसा, तालू पर चिपक सा गया है.

"तू ऐसा कर, जा कुल्ला कर आ, तेरी पहली बार है"

ललित जाकर कुल्ला कर आया. जब मेरे पास बैठा तो मैंने उसे फ़िर से बांहों में ले लिया. बांहों में भरके उसे कस के भींचा और पटापट उसके चुंबन लेने लगा. बेचारा फ़िर थोड़ा शरमा सा गया. वैसे चूमा चाटी जनाब को अच्छी लग रही थी और जब मैं थोड़ा रुकता. तो ललित मेरे चुम्मे लेने लगता.

"अगर तू सोच रही है ललिता कि इतना लाड़ क्यों आ रहा है मुझे, तो मुझे लीना पर भी आता है जब वह मुझे ऐसा सुख देती है. अब ललिता ... नहीं थोड़ी देर को अब ललित कहूंगा तेरे को, यार न जाने क्या हो गया है मुझे ... मालूम है कि तू लड़का है फ़िर भी तेरे पर मरने सा लगा हूं. शायद तुझमें दोनों की, मर्दों और औरतों की, सबसे मीठी, सबसे मतवाली खूबियां हैं. अब ये बता कि मेरे साथ सोयेगा या अकेले? मेरे बेडरूम में मेरे बेड पर सोने में अटपटा लगेगा तेरे को तो रहने दे. वैसे इतने दिनों में पहली बार लीना नहीं है और अकेले सोने की मेरी आदत ही खतम हो गयी है."

ललित ने तुरंत हां कह दिया. उसे बांहों में भींचते वक्त अब मुझे उसके सख्त लंड का आभास हो रहा था जो पैंटी के अंदर ही खड़ा होकर मेरे पेट पर चुभ रहा था. मुझे ललित पर थोड़ा तरस भी आया, वो बेचारा कितनी देर से मस्ताया हुआ था पर मैंने उसकी ओर ध्यान ही नहीं दिया था.

"ऐसा करो ललित कि अब ये ब्रा और पैंटी निकाल दो. सोते समय कोई शर्त नहीं, अपने नेचरल अंदाज में आराम से सो." वह मेरे बेडरूम में गया और मैंने घर में एक बार सब चेक करके लाइट ऑफ़ किये, दरवाजा ठीक से लगाया और अपना ब्रीफ़ निकालकर वहीं सोफ़े पर डाल दिया. जब पूरा नंगा होकर मैं अपने बेडरूम में आया, तो ऊपर की लाइट ऑफ़ थी. टेबल लैंप की धीमी रोशनी ललित के नंगे बदन पर पड़ रही थी. वह थोड़ा दुबक कर बेड पर एक तरफ़ लेटा हुआ था, लंड एकदम तन कर खड़ा था. मुझे देख कर थोड़ा और सरक गया. सरकते वक्त मुझे उसकी गोरी सपाट पीठ और थोड़े छोटे पर भरे हुए कसे कसे गोरे चिकने नितंब दिखे.

अब यह बताने की जरूरत नहीं कि मैं गांड का कितना दीवाना हूं. लीना की गांड पर तो मरता हूं, इतने गुदाज मांसल और फूले हुए एकदम गोल नितंब हैं उसके कि मेरा बस चले तो चौबीस घंटे उनसे चिपका रहूं. लीना को यह मालूम है इसलिये रेशन कर रखा है. मुझे महने में दो तीन बार से ज्यादा गांड नहीं मारने देती. अब गांड की इतनी प्यास होने पर जब मैंने अपनी ससुराल में सासू मां और मीनल के भरे भरे चूतड़ देखे थे तो दिल बाग बाग हो गया था, कि कुछ तो मौका मिलेगा. वहां मेरी सच में के.एल.डी हुई जब लीना ने वीटो लगा दिया. तब सामूहिक चुदाई के दौरान ललित के गोरे कसे चूतड़ देख कर भी मेरे मन में आया था कि यार यही मिल जायें मारने को. अब जब ललित मेरे सामने असहाय अकेला था, तो इससे अच्छा मौका नहीं था. पर मैंने सोचा कि जल्दबाजी करूंगा तो कहीं सब किये कराये पर पानी ना फिर जाये. आखिर मुझे अपने इस चिकने खूबसूरत साले को फांसना था तो वो लंबे समय के लिये, एक रात के लिये नहीं. इसलिये आज की रात इस चिड़िया को और फंसाने में ज्यादा फायदा था.

यही सब सोच कर मैं उसपर झपटने के बजाय धीरे से पलंग पर बैठ गया "ललित राजा, ये अच्छा हुआ कि तू यहां सो रहा है नहीं तो सच में अकेले सोने में मुझे बड़ा अजीब सा लगता. वैसे वहां घर में किस के साथ सोता है तू" मैंने उसके बाजू में लेटते हुए पूछा.

’अक्सर तो हम सब एक साथ ही सोते हैं जीजाजी, मां के बेडरूम में उस बड़े वाले पलंग पर. कभी कभी जब हेमन्त भैया मीनल भाभी के साथ उनके बेडरूम में सोते हैं तो मैं मां के साथ सोता हूं. कभी कभी मां हेमन्त भैया को बुला लेती है अपने कमरे में सोने को, तब मैं भाभी के कमरे में सो जाता हूं. और जब भैया बाहर होते हैं टूर पर तो मैं, मां और भाभी साथ सोते हैं"

"वो राधाबाई नहीं सोतीं वहां?" उसे पास खींचकर चिपटाते हुए मैंने पूछा.

"नहीं जीजाजी, वे बस दिन में आती हैं. वो तो अच्छा है, अगर रात को रहें तो हम सब से अपने मन का करा लेंगी, हम लोगों को कोई मौका ही नहीं मिलेगा अपने मन की करने का"

उसका चेहरा अब बिलकुल मेरे सामने था. उसने विग निकाल दिया था फ़िर भी उसके चेहरे पर एक गजब की मिठास थी जैसी लीना के चेहरे में है. मैंने उसके होंठ अपने होंठों में दबाये और चुंबन लेने लगा. जल्द ही ये चुंबन प्रखर हो गये. दांतों में दबा दबा कर मैंने उसके वे कोमल होंठ चूसे. उसकी जीभ चूसी और खुद अपनी जीभ उसके मुंह में घुसेड़ी. अब ललित मेरी जीभ चूसते चूसते धक्के मार रहा था, उसका लंड मेरे पेट को कस के दबा रहा था. मैंने सोचा कि यह ठीक नहीं है, उस बेचारे ने मुझे इतने सुखद स्खलन का आनंद दिया है तो उसको भी सुख देना मेरी ड्यूटी है.

मैंने चुंबन तोड़ा तो तो जोर से सांसें लेता हुआ वह बोला "आप सॉलिड किसिंग करते हैं जीजाजी"

"क्यों, और कोई नहीं किस करता तेरे को ऐसे? इतना क्यूट लड़का है तू"

"भाभी करती है ऐसे कई बार. कभी कभी मां करती है"

मैंने उसे पलट कर दूसरी करवट पर लेटने को कहा. "अब जरा ऐसे चिपक मेरे को, मुझे सहूलियत होगी" मैंने उसे पीछे से आगोश में ले लिया. मेरा लंड अब फ़िर से खड़ा होकर उसके नितंबों के बीच की लकीर में आड़ा धंसा हुआ था. उसका छरहरा बदन बांहों में लेकर ऐसे ही लग रहा था जैसे किसी कमसिन कन्या को भींचे हुए हूं. एक हाथ से मैंने उसका लंड पकड़ा और सहलाने लगा. जरा छोटा था पर एकदम रसीले गन्ने जैसा था. मैंने उसका सुपाड़ा मुठ्ठी में भरकर दबाया और फ़िर अपने खास तरीके से उसकी मुठ्ठ मारने लगा, जैसा मुझे खुद पसंद है.

"आह ... ओह ... क्या मस्त करते हैं आप जीजाजी!" ललित ने सिहरकर कहा. जवाब में मैंने उसकी गर्दन पीछे से चूमना शुरू कर दी. लीना के बाल उठाकर मैं जब उसकी गर्दन ऐसे चूमता हूं तो कितनी भी थकी हो या मूड में न हो, फ़िर भी पांच मिनिट में गरमा जाती है. ललित का लंड भी अब मेरी मुठ्ठी में उछल कूद कर रहा था. दिख भी एकदम रसीला रहा था. गोरा डंडा और लाल लाल चेरी. मैंने कभी सोचा नहीं था कि मैं ये करूंगा पर एक तो ललित का रूप और दूसरे उसने मुझे जो सुख दिया था उसके उत्तर में उसे सुख देने की चाह!

"ललित राजा, अब मेरी सुनो. इसके बाद का रूल यह है कि मैं कुछ भी करूं, तुम बस पड़े रहोगे ऐसे ही सीधे. न हाथ लगाओगे, न धक्के मारोगे. ठीक है?" उसके लंड को सहलाते हुए मैंने कहा. उसने हां कहा, अब तो वो ऐसी हालत में था कि मैं कुछ भी कहता तो मान लेता.

उसे सीधा लिटा कर मैं उसके लंड पर टूट पड़ा. उसको चूमा, सुपाड़ा थोड़ी देर चूसा, फ़िर जीभ से चारों और से चाटा. ललित गर्दन दायें बायें करने लगा, साले को सहन नहीं हो रहा था. "जीजाजी प्लीज़ ... कैसा तो भी होता है"

"अब कैसा भी तो होता है इसका मतलब मैं क्या समझूं यार? तू तो ऐसे तड़प रहा है जैसे आज तक किसीने तेरा लंड नहीं चूसा हो. घर में तो सब जुटे रहते हैं ना इसपर, तेरी दीदी, भाभी, मां, राधाबाई ... फ़िर?"

"पर आप करते हैं तो सच में रहा नहीं जाता जीजाजी ... ओह .. आह ... जीजाजी प्लीज़"

पर मैं तंग करता रहा. अब मेरा भी मूड बन गया था, एक तो पहली बार लंड चूस रहा था, और किस्मत से वह भी ऐसा रसीला खूबसूरत लंड. मन आया वैसे किया, कुछ एक्सपेरिमेंट भी किये. हां ललित को बहुत देर झड़ने नहीं दिया. ललित आखिर कराहने लगा "जीजाजी ... प्लीज़ ... दिस इज़ नॉट फ़ेयर ... इतना क्यों तंग कर रहे हैं?"

"तेरी दीदी मुझे सताती है उसका बदला ले रहा हूं, ऐसा ही समझ ले. मालूम है कि कभी जब तेरी दीदी दुष्ट मूड में होती है तो मेरा क्या हालत करती है? मेरे हाथ पैर बांध कर मुझे कैसे कैसे सताती है? अब उससे तो मैं झगड़ नहीं सकता, पर उसका बदला तुझपर निकालने का मौका मिला है तो क्यों न निकालूं? बहन का बदला भाई से! यही गनीमत समझ ले कि मैंने तेरी मुश्क नहीं बांधी"

काफ़ी देर ये खेल चलता रहा. आखिर अखिर में बेचारी की बुरी हालत हो गयी, लंड सूज कर लाल हो गया, मैंने खुद को मन ही मन शाबाशी दी कि उसकी ऐसी हालत करने में मैं कामयाब हुआ था. आखिर में उसने मेरा सिर पकड़ा, कस के अपने पेट पर दबाया और मेरे मुंह में लंड पूरा पेल कर धक्के मारने लगा. मैं चुपचाप पड़ा रहा कि देखें क्या करता है. आखिर आखिर में तो मुझे नीचे करके उसने मेरे मुंह को चोद ही डाला. जब झड़ा तब भी मैं चुपचाप पड़ा रहा, बिना झिझके उसका वीर्य निगल गया. उसकी बात सच थी, खारा कसैला सा स्वाद था पर मुझे खराब नहीं लगा, शायद इसलिये कि अब मेरा लंड भी फ़िर से पूरा तन कर खड़ा हो गया था.

आखिर जब ललित मुझपर से हट कर लस्त होकर लेट गया तो मैंने उसकी छाती सहलाकर कहा "रूल तोड़ दिया तूने ललित, ये अच्छा नहीं किया. इसकी पेनाल्टी पड़ेगी तेरे को"

"सॉरी जीजाजी" ललित बोला. पर उसकी आंखों में चमक थी "आप ने सब पी लिया जीजाजी?"

मैंने कहा "हां, वो तो चखना ही था. जवानी की क्रीम है आखिर, कौन छोड़ेगा! मजा आया तेरे को?"

"हां जीजाजी, बहुत मस्त, इतना मजा तो मां और दीदी के चूसने में भी नहीं आता" ललित मुझसे चिपक कर बोला.

"ठीक है, तो उसकी कीमत दे दे अब मेरे को. बोल, इसको कैसे खुश करेगा?" अपना तन्नाया लंड उसे दिखा कर मैंने पूछा.

वो चुप रहा. सोच रहा था कि क्या करूं. वैसे शायद खुशी खुशी वो मुझे एक बार और चूस डालता, पर उसके कुछ कहने के पहले की मैंने कहा "अब तो चोद ही डालता हूं तेरे को, उसके बिना ये दिल की आग नहीं ठंडी नहीं होगी मेरी"

बेचारा घबरा गया. मेरे उछलते लंड को देखकर उसकी हालत ये सोच कर ही खराब हो गयी होगी कि ये गांड में गया तो फाड़ ही देगा. पर बेचारा बोला कुछ नहीं, शायद मैं सच में मारता तो वो चुपचाप गांड मरवा लेता.

पर अपने उस चिकने लाड़ले साले को ऐसे दुखाने की मेरी इच्छा नहीं थी, वो भी पहली रात में.

"घबरा गया ना? डरपोक कहीं का, चल ये टांगें जरा फैला और करवट पर लेट जा" उसकी जांघों के बीच मैंने पीछे से लंड घुसेड़ा और कहा "अब चिपका ले टांगें और पकड़ मेरे लंड को उनके बीच. तुझे क्या लगा कि मैं तेरी गांड मारने वाला हूं. ऐसी ड्राइ फ़किंग नहीं देखी कभी? लीना भी करवाती है कई बार"

उसे पीछे से कस के भींच कर मैं अपना लंड उसकी जांघों के बीच पेलने लगा. उसकी जान में जान आयी. "थैन्क यू जीजाजी ... वैसे आप जो कहेंगे वो मैं करूंगा जीजाजी" मुड़ कर मेरी ओर देखते हुए ललित बोला. अपनी जांघों के बीच से निकले लंड के सुपाड़े को उसने अब अपनी हथेली में पकड़ लिया था और जिस लय में मैं उसकी जांघें चोद रहा था, उसी लय में वह मेरी मुठ्ठ भी मार रहा था.

उसका सिर अपनी ओर मोड़ कर उसके चुम्मे लेते हुए मैंने उसकी जांघें चोद दीं. एक मिनिट में मेरे वीर्य की फुहार ने उसकी जांघें भिगो दीं. बड़ा सुकून मिला, आने वाले स्वर्ग सुख का थोड़ा टेस्ट भी मिल गया.

बाद में टॉवेल से उनको पोछता हुआ ललित बोला "जीजाजी ... ये वेस्ट हो गया"

"याने?" मैंने पूछा.

"याने आप कहते तो मैं आप को फ़िर से एक बार चूस लेता" ललित बोला.

"आह हा ... याने स्वाद अब पसंद आ गया है मेरी ललिता रानी को. अब मुझे क्या मालूम था, पिछली बार तो ऐसा मुंह बनाया था तूने ... खैर आगे याद रखूंगा. और ये मत समझ कि आज छूट गयी वैसे हमेशा बचती रहेगी. तुझे चोदे बिना वापस नहीं भेजूंगा ललिता डार्लिंग. चल लाइट ऑफ़ कर और सो जा अब"

पांच मिनिट बाद मुझे महसूस हुआ कि ललित सरककर मेरे पास आया और पीछे से मुझे चिपक गया.

"क्या हुआ ललित?" मैंने पूछा.

"कुछ नहीं जीजाजी, आज बहुत मजा आया, इतना कभी नहीं आया था. थैंक यू जीजाजी ... और .. और .. आइ लव यू जीजाजी"

मैं मन ही मन मुस्कराया और आंखें बंद कर लीं. आज एक से एक मीठी बातें हुई थीं, खूबसूरत कमसिन लड़की जैसे जवान साले के साथ सेक्स किया, उसे खुश किया और खास कर अपनी बीवी के छोटे भाई को इतना आनंद दिया, इसका मुझे काफ़ी संतोष था.

जब नींद खुली तो ललित मुझे पीछे से चिपका हुआ था. गहरी नींद में था पर उसका एक पैर मेरे बदन पर था. लंड भी खड़ा था, और मेरी पीठ अर उसका दबाव महसूस हो रहा था. मेरा लंड भी टनटनाया हुआ था जैसा सुबह अधिकतर होता है. लीना के साथ जब होता हूं तो ऐसे में उसे चोद कर ही उठता हूं पर इस वक्त आठ बज गये थे, ऑफ़िस भी जाना था.

मैं तैयार हुआ और फिर जाते वक्त चाय बनाकर ललित को जगाया. लगता है कल के सेक्स से काफ़ी रिलैक्स होकर गहरी नींद आयी थी उसे. बेचारा उठ ही नहीं रहा था. आखिर जब उसके लंड को पकड़कर जोर से हिलाया तब उठा.

चाय पीते पीते मैंने अपना दिन का प्लान उसको बताया "ललित, अब फ़िर से ललिता बन जा. जल्दी. मैं नही हूं फ़िर भी घर में ललिता बनकर ही रहना, ठीक है ना? अपनी शर्त याद है ना?"

उसने सिर हिलाया, मैंने आगे कहा "आज मैं हाफ़ डे की ट्राइ करता हूं. तुम तैयार रहना, घूमने चलेंगे. क्या पहनोगे?"

ललित थोड़ा घबराकर बोला "बाहर जाना है घूमने, वो भी दिन में? फ़िर मैं शर्ट पैंट ही पहनता हूं जीजाजी"

"नथिंग डूइंग, अपनी शर्त लगी है तो लगी है. साड़ी में तू बहुत अच्छा लगता है, आज साड़ी पहन"

"पर मुझे साड़ी पहनना नहीं आता जीजाजी. उस दिन तो मीनल भाभी ने पहना दी थी"

"चलो, ठीक है, फिर तू लीना की कोई जीन्स और टॉप ही पहन ले. हां, हाइ हील सैंडल भी पहनना पड़ेगी"

"मुझे चलने में तकलीफ़ होगी जीजाजी, अब घूमना है तो ... " ललित सकुचाकर बोला.

"तकलीफ़ होगी तो सहन करो उसे. शर्त शर्त है. दिन में प्रैक्टिस कर लेना. और वैसे भी अधिकतर कार से ही जायेंगे, इतना नहीं चलना पड़ेगा"

दोपहर को मैं जब वापस आया तो ललित एकदम मीठी कटारी बना था. किसी मॉडर्न कॉलेज गोइंग दुबली पतली लड़की जैसा मोहक लग रहा था. और उसने लीना की सफ़ेद हाई हील पहनी हुई थी. जब चलता तो थोड़ा संभल संभल कर, पर उस सधी चाल में भी वह सेक्सी लगता था जैसे वो रैंप पर मॉडल्स चलती हैं. मैंने मन ही मन कहा कि ललिता रानी, तुम्हारा रूप इसी लायक है कि अभी तुम्हें बेडरूम में ले जाऊं और कस के - हचक हचक के - पटक पटक के चोद मारूं पर तुमको वायदा किया है तो अभी तो बंबई घुमाऊंगा, वापस आकर आगे की देखूंगा.

मैंने उसे काफ़ी जगहों पर ले गया. गेटवे, नरिमन पॉइन्ट, मरीन ड्राइव. आखिर में अंधेरा होने पर हम मलाबार हिल गये. उसे ज्यादा चलना नहीं पड़ा था, हां जब चलता तो बीच में थोड़ा बैलेंस जाता था. लीना की वो हाई हील पहनना आसान नहीं है. फ़िर भी बेचारे ने मेरे कहने पर पहनीं ये देखकर मुझे उसपर बड़ा प्यार सा आ रहा था. मैं बीच बीच में उसका हाथ पकड़ लेता जब ऐसा लगता कि चलने में तकलीफ़ हो रही है. एक दो बार तो मैंने कमर में हाथ डालकर सहारा दिया. आजू बाजू के लोगों को कोई परवाह नहीं थी, बंबई के लिये ये आम बात थी. हां कुछ मनचले बड़ी आशिकी नजर से ललित की ओर देख लेते थे, फ़िर मुझे देखते जैसे मन ही मन कह रहे हों कि बड़ा लकी है यार जो ऐसी गर्ल फ़्रेंड मिली है.

फ़िर हम गार्डन के एक कोने में कुछ देर बैठे. मैंने अचानक उसे पास खींच कर किस कर लिया. आस पास एक दो जोड़े और थे, वे भी बस यही सब कर रहे थे. ललित कुछ बोल नहीं, बस बदन सिकोड कर चुपचाप बैठा रहा.

मैंने पूछा "अच्छा नहीं लगा डार्लिंग मेरा किस करना? अब सच में तू बहुत सुंदर लग रही है ललिता डार्लिंग"

"बहुत अच्छा लगा जीजाजी, और आप के साथ ऐसे लड़की बनकर हाई हील पहनकर ... लचक लचक लचक कर चलने में ... भी मजा आया. जीजाजी ... मैं गे हूं क्या?"

बेचारा जरा कन्फ़्यूज़्ड लग रहा था. मैंने दिलासा दिया "अरे इस तरह से क्यों सोचता है? अगर हो भी तो कोई गुनाह थोड़े है. पर मेरी ठीक से सुन, परेशान न हो, तू गे नहीं है, पूरा गे होता तो ऐसे अपनी मां, दीदी को मस्ती में चोदता? हां बाइसेक्सुअल जरूर है. तेरे साथ दो दिन बिता कर मुझे भी लगा है कि शायद मैं भी हूं थोड़ा बहुत, शायद सभी मर्द और औरत थोड़े बहुत बाइसेक्सुअल होते हैं, तू जरा ज्यादा है, और ऊपर से तुझे क्रॉसड्रेसिंग करना भी अच्छा लगता है, बस इतनी सी बात है.

मेरी बात से उसे थोड़ा दिलासा मिला क्योंकि जब हम वापस आये तो उसका चेहरा काफ़ी प्रसन्न था, टेन्शन खतम हो गया था.

हम खाना खाकर ही घर वापस लौटे. ललित ने बड़े सलीके से होटल में बिहेव किया. बैठना, उठना, खाना - कहीं ऐसा नहीं लगा कि वह लड़की के भेस में लड़का है. वापस आते समय मैंने सोसायटी के गेट पर कार रोकी और ललित को कहा कि जाकर कुछ फल वगैरह ले आये. उसे लड़की बनके कॉन्फ़िडेन्ट्ली अकेले घूमने का मौका मैं देना चाहता था.

वापस आने के दस मिनिट बाद बेल बजी. ललित अंदर आया. खुश नजर आ रहा था. कोई परेशानी नहीं हुई थी. बस एक घटना हुई थी जिसे वह समझ नहीं पाया था. "जीजाजी, मैं वापस आ रहा था तो मेन रोड के उस ओर एक औरत खड़ी होकर मेरी ओर देख रही थी. मुझे देखकर हंसी और कुछ इशारा किया, मैं समझा नहीं, इसलिये बस मुस्करा दिया और खिसक लिया."

मैं सोचने लगा कि कौन होगी. "यार अपनी सोसायटी की तो नहीं होगी. नहीं तो रोड के उस पार से इशारे करने का मतलब ही नहीं है. दिखने में कैसी थी? याने अच्छी अपने नेबर्स जैसी थी या नौकरानी वगैरह थी?"

"यहां रहने वाली तो नहीं लग रही थी. उसे देखकर मुझे थोड़ा राधाबाई की याद आयी, वैसे वो औरत राधाबाई से कम उमर की थी"

मेरे दिमाग में अचानक बिजली कौंधी "साड़ी पहने थी?"

"हां जीजाजी, हाथ में खूब सारी चूड़ियां थीं, शायद बड़ी बिन्दी भी लगायी थी. थोड़ी भरे भरे खाते पीते बदन की थी. चेहरा ठीक से नहीं दिखा. कौन थी?"

मैं अपने माथे पर हाथ मारने वाला था पर किसी तरह खुद को रोका, बेचारे ललित को टेंशन हो जाता. इसलिये मैंने उसे कहा "क्या पता! तू मत चिन्ता कर. कोई कल आयेगा तो मैं देख लूंगा. तू जाकर फ़्रेश हो, मैं भी नहा लेता हूं"

जाते जाते ललित ने मुड़ कर बड़ी नजाकत से बिलकुल लड़की के अंदाज में पूछा "जीजू डार्लिंग, आप भी आ जाओ ना नहाने मेरे साथ! मुझे पता है कि आप लीना दीदी के साथ हमेशा बाथ लेते हैं "

मैंने उसे पीछे से पकड़कर कहा "चुदवाना पड़ेगा नहाते वक्त. आऊं?"

ललित मेरी ओर देखने लगा. मैंने जरा छेड़ा "लीना दीदी ने ये नहीं बताया कि नहाते वक्त उसको खड़े खड़े शॉवर के नीचे जब तक चोद नहीं लेता तब तक हमारा नहाना खतम नहीं होता"

थोड़ा संभल कर ललित बोला "पर जीजू ... "

"डर मत मेरी जान, इसीलिये तेरे साथ नहाना बाद में होगा ... अभी तू जा और नहा ले, मुझे कुछ काम है"

ललित के जाने के बाद मैंने लीना को फोन लगाया. आने के बाद उससे बात ही नहीं हुई थी. उसने भी फोन नहीं किया था. वैसे कोई अचरज की बात नहीं थी, तीनों गरम गरम नारियों में - मां, बेटी और बहू - अकेले में जम के इश्क चल रहा होगा - ये तय था.

लीना को फोन लगाया. पहले पांच मिनिट डांट फटकार और ताने सुने कि कैसे मैं उसको भूल गया, इतना भी वक्त नहीं है जनाब को कि पांच मिनिट फोन कर लेते. फ़िर दस मिनिट उसने बड़े इन्टरेस्ट से ललित के कारनामे सुने कि कैसे वह अब तक लड़की जैसा ही रह रहा है, घर में भी ब्रा पैंटी पहनता है, कैसे मेरे साथ पूरा दिन लड़की के भेस में हाई हील पहनकर घूमा इत्यादि इत्यादि.

"असल बात तो बताओ. बस जीजा साले की तरह रह रहे हो कि कुछ साली और जीजा जैसा भी हुआ है? तुमने उसे परेशान तो नहीं किया अकेले में? "

"अरे ललित एकदम खुश है. कल मेरे साथ सोया भी था हमारे बेड में"

"सिर्फ़ सोया? " लीना ने पूछा.

"अब मिलने पर बताऊंगा रानी, जरा सस्पेंस तो रहने दो, अगर जीजा साली का चक्कर चल सकता है तो जीजा साले का क्यों नहीं? वैसे तुम्हारे छोटे भाई को बिलकुल फूल - या कली जैसा संभाल कर रख रहा हूं."

"हां वैसे ही रहो. जबरदस्ती मत करना मेरे नाजुक भैया के साथ. तुम्हारा कोई ठिकाना नहीं, तुम्हारा एक बार खड़ा हो जाये तो तुमको जरा होश नहीं रहता ... फ़िर उस बेचारे को अकेले में ... उसपर सांड जैसे चढ़ मत जाना"

"अरे डार्लिंग - सारी दुनिया एक तरफ़ और जोरू का भाई एक तरफ़ - और वो तो साले से ज्यादा मेरी प्यारी नाजुक साली है. अब जरा मेरी सुनो, जरा सीरियस बात है. आज शांताबाई ने लगता है ललित को देख लिया दूर से. वैसे वो तुम्हारी ड्रेस में था और दूर से उसने उसे लीना समझ लिया होगा - यही बात मेरे को जरा खटक रही है. अब देखना, वो कल पक्का आकर बेल बजायेगी यह समझ कर कि तुम वापस आ गयी हो"

लीना हंसने लगी "अरे वा... मुझे नहीं लगा था कि ललित इतने अच्छे तरीके से मेरी ड्रेसेज़ पहनने लगेगा, जो शांताबाई भी दूर से धोखा खा जाये. पर इसमें परेशानी की क्या बात है? आती है तो आने दो. तुम्हारा उपवास भी खतम हो जायेगा" अब ये उपवास से ऐसा न समझें कि वह पेट वाले उपवास की बात कर रही थी. वैसे शांताबाई खाना भी बहुत अच्छा बनाती है.

"मुझे ये उपवास मेरे प्यारे साले ... सॉरी साली के साथ ही छोड़ना है. अब तो कहीं जरा घुला मिला है मुझसे, इश्क विश्क भी करने लगा है, अब जब असली बात के करीब आ गये हैं तो ये शांताबाई आ टपकी. बेवजह का लफ़ड़ा शुरू हो गया"

"कोई लफ़ड़ा नहीं होगा. तुम शांताबाई को सब बता दो, तुमको मालूम है कि वो मेरे पर तुम्हारे ऊपर भी कितनी जान छिड़कती है, मदद ही करेगी तुम्हारी, जैसी उस दिन की थी" लीना का स्वर थोड़ा शैतानी भरा था.

"मुझे उनकी मदद नहीं चाहिये, जो करना है मैं खुद कर लूंगा. और ऐसी क्या मदद की थी शांताबाई ने?" मैंने पूछा.

"भूल गये? उस दिन दोपहर को ... तुम्हारा जम के मूड था पर मैं तैयार नहीं थी क्योंकि वेसेलीन खतम हो गयी थी ... नयी बोतल लाना भूल गये थे तुम"

मुझे याद आया. याद आने के साथ ही लंड में गुदगुदी होने लगी, तुरंत खड़ा होने लगा. मैंने दाद दी "याद आया रानी साहिबा, बस, यही ठीक रहेगा, शांताबाई जिंदाबाद."

"और देखो, मुझे एक दो दिन और देरी हो सकती है आने में. अब मां नहीं आने देगी जल्दी. इसलिये ललित को भी बता देना कि वो भी वापस आने की जल्दी ना करे. वैसे भी उसके कॉलेज की छुट्टी एक हफ़्ते के लिये बढ़ गयी है. चलो, शांताबाई आ गयी ये सुन कर मुझे दिलासा मिला. कल वो रहेगी तो तुम पर कंट्रोल रहेगा. नहीं तो तुम ललित की हालत कर देते"

"इतना क्यों बदनाम कर रही हो डार्लिंग? ललित को एकदम लाड़ प्यार से संभाल रहा हूं मैं. कल सोते वक्त तो ’आइ लव यू जीजाजी’ भी बोला.

"अरे वाह. याने तुमपर अच्छा खासा मरने लगा है ललित. चलो अच्छा है, साले और जीजा के मधुर संबंध हों तो और क्या चाहिये. अब कितने मधुर ये तो उन दोनों पर ही छोड़ देना चाहिये है ना" कहकर लीना हंसने लगी. फ़िर बोली "और अब शांताबाई आ ही रही है तो दोनों काम रोज करने दो अब उसको"

"दोनों काम याने?"

"अब भोले मत बनो. घर का काम और वो ... दूसरा वाला काम. समझे?"

"समझ गया मेरी मां. वैसे काम करने में शांताबाई होशियार है. देखें ललित को उनका काम कितना अच्छा लगता है. वैसे तुम बताओ, हमारी सासू मां कैसी हैं? और भाभी जी? उन्होंने जो मुंह मीठा कराया था निकलते वक्त, उसका स्वाद अब भी मुंह में है"

"मां बहुत खुश है, एकदम मस्ती में है, हां जरा परेशान है बेचारी" लीना बोली

"क्यों डार्लिंग?"

"हम दोनों मिलकर जो उसके पीछे लगे हैं कल से. असल में बाजी जरा पलट गयी है. मां ने मीनल भाभी के साथ प्लान बनाया था कि जब लीना आयेगी और हमारे साथ अकेली रहेगी तो उसके साथ ऐसा करेंगे, वैसे करेंगे. पर मीनल भाभी गद्दारी कर बैठी. भाभी को सीधा करना मेरे को आता है. उसके बाद हम दोनों मिलकर मां पर टूट पड़े हैं. मीनल भाभी को भी मौका मिला है अपनी सास के साथ जो मन चाहे करने का. अकेले में तो शायद करने की हिम्मत नहीं होती. कल से मां बेचारी को बेडरूम में ही कैद रखा है, निकलने ही नहीं दिया. उसको बचाने को अब राधाबाई भी नहीं है, गांव गयी है."

"अरे अरे ... ऐसा मत करो ... कैसी दुष्ट हो ... वो भी मां के साथ ..."

"हां हां रहने दो अपनी सिम्पैथी, तुम होते तो ऐसा ही करते ... सच अनिल ... मां का इतना मीठा रस निकाला है हम दोनों ने मिलके ... और अपना रस निकलवाने में उसे भी मजा आता है ... वैसे मां तुमको भी याद करती है ... दिल जीत लिया है तुमने उसका"

दो तीन मिनिट और नोक झोंक करके मैंने फोन रख दिया. लीना से बात करके हमेशा अच्छा लगता है मुझे.

इसके बाद मैंने थोड़ी वर्जिश की, उठक बैठक लगाईं. वैसे मैं सोसायटीके जिम में जाता हूं रोज पर अभी जरा अज्ञातवास चल रहा था इसलिये अवॉइड कर रहा था. व्यायाम करने के बाद मैं नहाया. बदन पोछकर वैसे ही बाहर आ गया, बिना कपड़े पहने. पहले सोचा देखूं ललित तैयार हुआ या नहीं, फ़िर सोचा इस तरह से उसके पीछे लगना ठीक नहीं है. ईमेल देखने बैठ गया और काम में जुट गया.

जब दो बाहें मेरे गले में पीछे से पड़ीं तब मैंने लैपटॉप से ऊपर देखा. क्षण भर लगा लीना ही है, वो हमेशा बड़े प्यार से ऐसे ही पीछे से मेरी गर्दन में बाहें डालती है. पर ललित था, या ये कहना ज्यादा ठीक होगा कि ललिता थी. अब वहां जो लड़की खड़ी थी उसमें से जैसे ललित का नामोनिशान गुम हो गया था. बदन से भीनी भीनी खुशबू आ रही थी, काली ब्रा और पैंटी में बला की हसीन लग रही थी. मैंने उसे गोद में खींच लिया. देखा तो पैरों में लीना की सिल्वर कलर वाली चार इंची हाई हील थी. याने मुझपर डोरे डालने की पूरी तैयारी करके आई थी ललिता -- या ललित? मैंने उसका धीरे से चुंबन लिया. आज उसने हल्की गुलाबी लिपस्टिक भी लगाई थी, स्ट्राबेरी के टेस्ट वाली. मैं उस स्ट्राबेरी को खाने में जुट गया. उस मीठी स्ट्राबेरी को - उन गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होंठों का स्वाद लेते लेते इस बार मेरे हाथ ललित के पूरे बदन पर घूम रहे थे. आज मैं उसके बदन को ठीक से जान लेना चाहता था. कभी उसकी पीठ सहलाता, उसकी ब्रा के स्ट्रैप को खींचता और ट्रेस करता, कभी उसकी कमर हाथ से टटोलता, कभी उसकी छरहरी जांघों की पुष्टता को महसूस करता और कभी उसके नितंबों को पकड़कर दबाता. और अब आखिर में एक हाथ मैंने उसकी पैंटी में डालकर उन मुलायम नितंबों को दबा कर, मसलकर, रगड़कर उनकी नरमी और चिकनाई को पूरा महसूस किया.

उस रात भी मैंने ललिता को नहीं चोदा. याने नहीं चोदना चाहता था ऐसी बात नहीं है, उन खूबसूरत नितंबों के बीच अपना सोंटा गाड़ने को मैं मरा जा रहा था पर जैसे मैं और ललित में टेलीपैथी से ऐसे जुड़ गये थे कि एक दूसरे के मन की बातें बिनकहे समझ रहे थे. ललित ने मेरी तीव्र वासना को पहचान लिया था. मुझे भी यह समझ में आ रहा था कि इस समय ललित पूरा लड़की के माइन्डसेट में आ चुका था और मेरे आगे पूरा समर्पण करना चाहता था, मुझसे हर तरह का सेक्स करना चाहता था पर अब भी मेरी तना हुआ मूसल अपनी गांड में लेने से डर रहा था.

इसलिये वह रात थी बड़ी मादक पर उसमें चुदाई नहीं हुई. आधे घंटे की बेहिसाब चूमाचाटी के बाद जब मैं और रुकने की हालत में नहीं था, तब ललित ने मुझे कुरसी में बिठा कर मेरे सामने नीचे बैठ कर मुझे वह ब्लो जॉब दिया जैसा शायद लीना ने भी कम ही दिया होगा. बहुत देर तक मेरे लंड को कर तरह से चूस कर आखिर जब मुझे झड़ाया तो मुझे ऐसा लगा कि मेरी वासना की शांति के साथ साथ मेरी जान भी निकल गयी हो. इस बार पूरा वीर्य उसने आंखें बंद करके चाव से निगला और बाद में भी निचोड़ता रहा.

इस सुख के बदले में मैंने जब उसे वही सुख देने को पास खींचा तो वह अलग हो गया, जबकि उसका लंड इतना कस के खड़ा था कि पैंटी के अंदर सीधा उसके पेट से सट गया था. मैंने उसके कान में प्यार से कहा "घबराओ मत ललिता डार्लिंग, तुम्हें आज मैं नहीं चोदूंगा. असल में तुम्हारे इस मुलायम बदन में अपना लंड घुसेड़ने को मैं मरा जा रहा हूं, कोई भी कीमत दे सकता हूं फ़िर भी आज नहीं चोदूंगा क्योंकि मुझे इस बात का एहसास है कि तुम अभी तैयार नहीं हो. पर मेरी जान, अब अपने आप को तैयार कर लो, किसी भी हालत में कल तो तुमको मुझसे चुदाना ही होगा. पर आज तुमको मैं इस मस्ताई हालत में सूखा सूखा छोड़ दूं तो पाप लगेगा, अब तू बैठ और मैं तेरे को प्यार करता हूं"

ललित नजर झुका कर बोला "जीजाजी ... आज रहने दीजिये, मुझे ऐसा ही चलेगा. मस्ती कल के लिये संभाल कर रखता - रखती हूं, ये ऐसी हालत रहेगी तो कल आपसे चुदाने में आसानी होगी"

मैं समझ गया. बेचारा अपने लंड की मस्ती ऐसे ही बचा कर रखना चाहता था, याने इस मस्ती में मेरे लंड को अपनी गांड में लेने में उसको आसानी होगी ऐसा उसको लग रहा था. बात सच थी, मैंने उसे चूमा और कहा "ठीक है ललिता रानी, जो तुम कहो वैसा ही होगा. अब फ़िर ऐसा करो, कि आज वहां लीना के कमरे में सो जाओ, मैं अपने बेडरूम में सोता हूं. और देखो, सो जाना, इसको ..." उसके लंड को पैंटी के ऊपर से दबाकर मैं बोला "हाथ भी मत लगाना"

"ठीक है जीजाजी" ललित बोला.

"नींद आयेगी?"

ललित जरा शर्मिंदगी में मुस्करा दिया, उसका लंड जिस हालत में था उसमें सोना असंभव था. मैंने कहा "चल, स्लीपिंग पिल देता हूं, सिर्फ़ आज के लिये, कल से इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी, नींद नहीं आयेगी तो रात भर चुदाई किया करेंगे"

रात को मुझे भी स्लीपिंग पिल लेना पड़ी क्योंकि के ने दो बार मुझे चूसने के बावजूद मेरा फिर खड़ा हो गया था. अब कल का इंतजार था, और कल की उस मादक घड़ी के पहले शांताबाई आकर क्या गुल खिलायेगी, आयेगी भी या नहीं, इसका भी मुझे अंदाजा नहीं था.

रात को सोने के पहले मैंने ललित से कहा था कि कल मैं छुट्टी ले लेता हूं "और घूमेंगे. एलीफैंटा चलते हैं"

वो पहले खुश हुआ "सुपर जीजाजी. मजा आयेगा" फ़िर नीचे देख कर बोला "वैसे आप छुट्टी ले रहे हैं तो ... हम घर में भी रह सकते हैं"

मैं समझ गया कि वो क्या कह रहा है. मेरे साथ और मौज मस्ती करना चाहता था, यह मालूम होते हुए भी कि आज तो उसकी गांड की खैर नहीं है. मुझे उसकी यह अदा बहुत प्यारी लगी. मैंने कहा कि कल सोचेंगे क्या करना है.

इसलिये सुबह मैंने उसे देर तक सोने दिया. मैं लैपटॉप लेकर बैठा काम कर रहा था. बेल बंद कर दी थी कि ललित को डिस्टर्ब ना हो. थोड़ी देर से मुझे बेल स्विच दबाने की आवाज आयी. मैंने पीप होल से देखा तो शान्ताबाई ही थीं. मैंने दरवाजा खोला और उसे अंदर आने दिया. दरवाजा बंद किया और शान्ताबाई की ओर देखा.

शान्ताबाई आज एकदम सज धज कर - साज सिन्गार करके आई थीं. लीना ने उनको दीवाली पर अपनी एक शादी की सिल्क की साड़ी दी थी, वही पहनी थीं. ब्लाउज़ उन्होंने नया सिलाया था क्योंकि लीना का ब्लाउज़ तो शान्ताबाई को हो ही नहीं सकता था, ब्लाउज़ की छाती को ही डेढ़ गुना कपड़ा लगता.

"कल लीना बाई को देखा तो हैरान रह गयी मैं भैयाजी" वो बोलीं. "जाते बखत तो यही बोली थी कि एक दो हफ़्ते बाद आऊंगी. अब कल देखा तो यकीन ही नहीं हुआ. मैं तो रोड के पार आकर बात करने वाली थी पर बाई रुकी ही नहीं. बस मुस्करा कर चली गयी. मैंने भी सोचा कि ऐसा क्या जल्दी थी मोड़ी को कि मेरे से बात किये बिना चली गयी नहीं तो हमेशा तो मेरे बिना एक दिन नहीं जाता उसका. वैसे है कहां लीना दीदी? अंदर ही होगी."

मैंने हां कहा. शान्ताबाई अंदर जाने लगी तो मैंने हाथ पकड़ किया. "अब लीना से मिलने की ऐसी भी क्या जल्दी है शान्ताबाई? हम भी तो हैं ना यहां, आप के चाहने वाले. जरा हमसे मीठी मीठी बातें कीजिये, हमारा मुंह मीठा कराइये, फ़िर अंदर जाइये अपनी प्यारी छोरी से मिलने, वैसे भी वो सो रही है अभी" कहकर मैंने खींचकर शान्ताबाई को अपने से चिपटा लिया. फ़िर उनको गोद में ले कर सोफ़े में बैठ गया.

"ये क्या भैयाजी! छोड़ो मेरे को. ऐसे खुले में बैठक के कमरे में अच्छा लगता है क्या?" शान्ताबाई थोड़ा शर्मा कर बोलीं. वे हमेशा शुरू में थोड़ा शरमाती हैं और मुझे उनकी ये अदा बड़ी लुभावनी लगती है. मैंने उनकी एक ना सुनी और उनको कस के भींच कर उनका एक चुंबन ले लिया. वे मेरी गिरफ़्त से छूटने की बेमन की कोशिश करते हुए बोलीं. "अब भैयाजी, जरा सबर करो, सबर ना हो रहा हो तो कम से कम अंदर तो चलो. ऐसे खुले आम क्या करम करवाते हो मेरे से. पहले मेरे को देखने दो कि हमारी बिटिया कैसी है, उसको कुछ चाहिये क्या? फ़िर घर का भी तो काम पड़ा है, वो तो जरा कर लेने दो"

"घर का काम बाद में बाई, पहले यह वाला काम करना जरूरी है. और इस वाली दीवाली की मिठाई तो अब तक मैंने चखी ही नहीं" मैंने उनके जरा से मोटे मोटे पर एकदम नरम मुलायम पान से लाल होंठों को कस के चूमते हुए कहा. फ़िर उनकी वो एक विशाल चूंची पकड़ कर बोला "और ये माल तो और मालदार हो गया लगता है बाई सिर्फ़ एक हफ़्ते में. जरा देखें तो ऐसा क्या हो गया इस खोये के गोले को?"

"कुछ भी कहते हो आप भैयाजी" गर्दन को एक खूबसूरत झटका देकर शांताबाई बोलीं. "वजन बढ़ गया है मेरा, अब जाते वक्त लीना बिटिया इतनी सारी मिठाई मेवा मेरे को दे कर गयी, घर में और कोई खानेवाला है नहीं, फ़िर मैंने ही सारी खा डालीं. अब बदन फूलेगा नहीं तो क्या होगा. अब छोड़ो भी, ये क्या कर रहे हो" उन्होंने उठने की एक झूट मूट की कोशिश की पर मैंने पकड़कर नीचे खींचा तो धप से मेरी गोद में वापस बैठ गयीं. फ़िर खुद ही मेरे चुंबन लेने लगीं. विरोध प्रकट करने का नाटक कहिये या लज्जाशील औरतों की तरह पहले नहीं नहीं कहने का एक औपचारिक प्रोटोकॉल कहिये - वो उन्होंने पूरा कर लिया था. अब वे भी अपनी प्यारी दुलारी लीना बिटिया के पति के लाड़ दुलार करने में लग गयीं.

मैंने मौके का फायदा उठाया. मुझे ऐसा एकांत उनके साथ बहुत कम मिलता है, करीब करीब नहीं के बराबर क्योंकि लीना साथ में होती है. इसलिये आज मिले एकांत का मैंने पूरा उपयोग कर लिया. पहले उनके उन भरे भरे होंठों के खूब चुंबन लिये, ऐसे चुंबन शान्ताबाई को बड़े अच्छे लगते हैं, जब मस्त गरम हो गयीं तो उनका ब्लाउज़ सामने से खोला और चुम्मे लेते लेते उनके मोटे मोटे स्तनों को हाथेली में भरके खेलने लगा. वे ब्रा पैंटी वगैरह नहीं पहनती हैं इसलिये सीधे असली काम पर आने को वक्त नहीं लगता. जब मेरी हथेली में उनके निपल खड़े होकर चुभने लगे तो उनको थोड़ी देर तक बारी बारी से चूसा. जब वे मेरी गोद में बैठे बैठे मेरी टांग को अपनी जांघों में लेने की कोशिश करने लगीं तब मैं समझ गया कि भट्टी गरम हो गयी है और रस की फ़ैक्टरी ने अपना काम शुरू कर दिया है.

इसलिये मैंने उन्हें वहीं सोफ़े पर लिटा कर उनकी साड़ी ऊपर की और उनकी घने काले बालों वाली बुर में मुंह डाल दिया. गजब का रस है उनका, अगर लीना का रस किसी महंगी वाइन जैसा है तो शान्ताबाई का खालिस देसी ठर्रा है जो सीधा दिमाग में चढ़ता है. मन भरके रस पीकर मैं उनपर चढ़ गया और लंड उनकी तपती चूत में घुसेड़कर चोद डाला. कहने को शान्ताबाई नाक सिकोड़ कर "ये क्या भैयाजी ... ऐसे यहीं ... लीना बिटिया आ गयी तो क्या कहेगी ... बोलेगी कि मुझसे मिली भी नहीं और सीधे मेरे मर्द को अपने ऊपर ले लिया ..." पर ये सब कहते कहते वे खुद मुझसे चिपक कर, मुझे बाहों और टांगों में जकड़कर चूतड़ उछाल उछाल कर चुदवा रही थीं. ये हमेशा होता है, लीना से उनको भले मुहब्बत हो, मुझसे चुदवाने को वे हमेशा तैयार रहती हैं, आखिर जवान लंड से चुदवाना उन जैसी रसिक गरम औरत कैसे छोड़ेगी!

मैंने झुक कर उनका वो काले जामुन जैसा निपल मुंह में लिया और चूसते चूसते जम के धक्के लगाने शुरू कर दिये. चोद कर बड़ी शांति मिली, ऐसे बस लंड चुसवा चुसवाकर आदमी फ़्रस्ट्रेट हो जाता है, घचाघच चोदे बिना सुकून नहीं मिलता.

मैं पड़ा पड़ा हांफ़ रहा था. दो मिनिट बाद जब जरा शांत हुआ तो मुझे हटाकर शान्ताबाई उठ बैठीं और कपड़े और बाल ठीक ठाक करके बोलीं "चलो ... हो गया ना आपके मन जैसा? ... अब जरा अंदर जाने दो मेरे को नहीं तो लीना बाई चिल्लाएगी"

"वो सो रही है शान्ताबाई. नहीं तो मुझमें इतनी हिम्मत कहां कि बिना उसकी इजाजत के आपको हाथ तक लगाऊं!"

उठकर साड़ी ठीक करके शान्ताबाई बोलीं "आज क्या छुट्टी पर हो भैयाजी?"

मैंने हां कहा. वे बोलीं "फिर फालतू में इतनी जल्दबाजी की. लीना बिटिया हमेशा आप की छुट्टी के दिन आप को भी अंदर बुला लेती है, किसी बात को ना नहीं कहती. आराम से जरा मस्ती ले लेकर करते तो मुझे भी जरा तसल्ली होती"

मैंने उनकी कमर में हाथ डालकर कहा "दिल छोटा ना करो शांताबाई. इस जवान लंड को तो तुम जानती हो, जब कहोगी तब फ़िर से चोद दूंगा, आपकी इच्छा नुसार"

अपनी नाक सिकोड़ कर आंख मटकाकर उन्होंने मुझे अपना झटका दिखा दिया और अंदर चली गयीं. लगता है लीना से मिलने को बहुत उत्सुक थीं. मैं सोफ़े पर लेट कर राह देखने लगा कि अब क्या कहकर बाहर आयेंगी. शान्ताबाई हमारे यहां कैसे काम करने लगीं वह भी मेरे दिमाग में चलने लगा.

शान्ताबाई को ढूंढकर लाने का श्रेय लीना को ही जाता है. लीना लाखों में एक है और उसकी कामवासना भी लाखों में एक है. जैसे दिन रात धधकते रहने वाली आग. शादी के बार जैसे लाइसेन्स मिल गया है तो और तीव्र हो गयी है. पहले वह सर्विस करती थी, अब छोड़ दी है, घर में अकेले रह कर जैसे उसका टॉर्चर होता है. अच्छा वह ऐसी स्लट नहीं है कि कहीं भी किसी से सेक्स कर ले, उस मामले में बिना परखे या बिना जान पहचान के, बिना उस व्यक्ति के लिये मन में थोड़ी मृदुल भावना आये कुछ नहीं करती. अब मेरा एक मित्र अरुण और लीना की एक सहेली सोनल ने भी शादी कर ली है और उनसे हमारी अच्छी जमती है, हर बात में! दो तीन दिन का वीकेन्ड हो तो साथ रहते हैं, हर चीज शेयर करते हैं, बेड तक. तब लीना को अपनी आग थोड़ी धीमी कर लेने का मौका मिलता है. पर उनके साथ वीकेन्ड बिताने का मौका बस महने में एकाध बार ही आ पाता है.

लीना को मैं बहुत प्यार करता हूं, इतना कि उसकी यह तड़प मुझसे नहीं देखी जाती. मैं तो इतनी हद तक सोचने लगा था कि कोई हैंडसम नौकर रख लूं जो दोपहर में उसे खुश रखे.

पर लीना ने दन से यह आइडिया ठुकरा दिया. "मुझे नहीं चाहिये. वो अरुण और सोनल हैं ना, उतना ठीक है. और मेरे राजा, मुझे तुम समझते क्या हो? आखिर तुम मेरे पति हो. ऐसे किसी ऐरे गैरे के साथ मुझे बिलकुल नहीं चलेगा. वो भी नौकर. हां नौकरानी की बात और है"

तब मुझे याद आया कि उमर में बड़ी औरतों के प्रति भी लीना को बड़ी आसक्ति है, बाद में कारण समझ में आया जब उसकी मां और राधाबाई को मिला. अब ऐसी नौकरानी ढूंढना जो लीना के दिल में उतर जाये, मेरे लिये मुमकिन नहीं था, पर लीना खुद ही ढूंढ लेगी इसका मुझे विश्वास था.

हुआ भी ऐसा ही. तब शान्ताबाई पास के मार्केट में सब्जी का ठेला लगाती थी. लीना अक्सर उसीके यहां से सब्जी खरीदती थी. एक दिन मुझे बोली "वो सब्जी वाली बाई देखी डार्लिंग?"

"कौन सी सब्जी वाली" मैंने अनजान बनकर कहा. वैसे मैं जानता था. शान्ताबाई के यहां से जो भी सब्जी खरीदता था, वह उनके एकदम देसी जोबन से अछूता नहीं रह सकता था.

"अब बनो मत, सब्जी तौलते वक्त कैसे उसकी छाती की ओर टुकुर टुकुर देखते रहते हो, मुझे क्या मालूम नहीं है?"

"अब वो ... याने डार्लिंग" मैंने लीपा पोती की कोशिश की तो लीना और भड़क गयी. "देखो मुझे गुस्सा ना दिलाओ अब ..." फ़िर अचानक शांत हो गयी "मैं नाराज नहीं हो रही हूं, तुम ये जो बिना बात झूट बोलते हो वो मुझे नहीं सहा जाता. शान्ताबाई ... याने वो सब्जी वाली ... तुम देखो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है, है ही वह देखने लायक. उसके वे मम्मे देखे? पपीते जैसे हैं. है थोड़ी सांवली पर एकदम चिकनी है"

"जरा उमर में बड़ी है. पैंतीस छत्तीस के ऊपर की तो होगी."

"तुमको इतने साल की लगी याने चालीस या पैंतालीस की भी होगी. पर मुझे चलेगा." लीना पलक झपका कर बोली.

"चलेगा याने ..." मैंने पूछा तो तुनक कर बोली "किस काम के लिये ये सब मुझे चलेगा ये अब समझाने की जरूरत नहीं है. इस उमर की औरतें अक्सर बड़े मीठे स्वभाव की होती हैं, खुद भी मीठी होती हैं, इस शान्ताबाई की मिठास चखने का मूड हो रहा है. और उसका इन्टरेस्ट भी है मुझमें."

"अब ये तुमको कैसे मालूम डार्लिंग" मैंने सवाल किया तो लीना बोली "वो बताने की बात नहीं है, समझने की बात है. मैं सब्जी लेने जाती हूं तो बस मुझसे गप्पें लड़ाने लगाती है, मेरी आंखों में बेझिझक देखती है. दूसरे ग्राहक रहें या चले जायें, उससे उसको फरक नहीं पड़ता. मुझे सबसे अच्छी और ज्यादा सब्जी देती है. सब्जी चुनते वक्त जरूरत से ज्यादा झुकती है और अपनी चोली में से मोटे मोटे स्तनों का दर्शन कराती है. मुझे बहुत सेक्सी लगी डार्लिंग वो औरत. ये अपने यहां काम करने को राजी हो जाये तो ... उफ़्फ़ ... मजा आ जायेगा .... और तुम जो परेशान रहते हो मेरी परेशानी देख कर, वो भी खतम हो जायेगी."

मुझे भरोसा नहीं था. "देख लो डार्लिंग, वो है तो सेक्सी और जैसा तुम कहती हो, वैसे तुमपर मरती भी होगी पर आखिर उसका सब्जी बेचने का पुराना व्यवसाय है, वो छोड़कर घर का काम करने को राजी हो जायेगी ये मुझे नहीं लगता"

"तुम बस देखो, और ये सब फ़्री में थोड़े कराऊंगी उससे, अच्छी सैलरी दूंगी."

लीना का कहना सच निकला, शान्ताबाई तो जैसे बस राह देख रहे थी कि लीना कुछ कहे. लीना के बात छेड़ते ही तुरंत तैयार हो गयी, न पैसे की बात की, न क्या काम करना होगा इसकी बात. वो तो लीना पर ऐसी फिदा थी कि तुरंत ठेला बंद करके दूसरे ही दिन हाजिर हो गयी. लगता है लीना पर मर मिटी थी, वैसे लीना है ही इतनी सुंदर और उतनी ही चुदैल. और शान्ताबाई ने उसकी चुदासी पहचान ली थी.

शान्ताबाई हमारे यहां काम करने लगी उस दिन से लीना के चेहरे पर जो सुकून मुझे दिखने लगा, उससे मैंने भी मन ही मन शान्ताबाई को धन्यवाद दिया. लीना वैसे उसे बहुत खुश रझती थी. अच्छे खासे पैसे, खाना पीना, साड़ी कपड़े. और शान्ताबाई भी ऐसी हो गयी थी जैसे स्वर्ग में आ गयी हो. और उसे भले मालूम हो कि उसका असली काम क्या है, घर का काम भी बड़ी मेहनत से करती थी, लीना को कुछ भी नहीं करना पड़ता था.

और शान्ताबाई को बस एक हफ़्ता ट्राइ करके लीना ने छुट्टी के दिन शान्ताबाई के साथ चलते अपने इश्क में मुझे भी शामिल कर लिया. हां वह खुद उस समय रहती थी. शान्ताबाई को भी ऐसा हो गया कि अंधा मांगे एक आंख, और मिल जायें दो. भले लीना के साथ उसका जम के प्यार दुलार चलता था पर मर्द से चुदाने में उसे उतना ही आनंद आता था.

ये सब याद करते करते मेरा खड़ा हो गया और फ़िर अचानक मैं यह सोचने कगा कि अंदर क्या चल रहा होगा.

दो मिनिट में शान्ताबाई बाहर आयीं. थोड़ी अपसेट लग रही थीं. "ये क्या चल रहा है भैयाजी? कौन है वो लड़का जो अंदर सोया है? मुए ने लीना बाई की बॉडी और चड्डी भी पहन रखी है लगता है"

मुझे हंसी आ गयी पर किसी तरह से मैंने उसे दबाते हुए कहा "कहां शान्ताबाई? लीना ही तो है. आपने चेहरा नहीं देखा?"

"इतना बड़ा तंबू बना है उसकी चड्डी में और तुम कहते हो लड़की है. मैं सब समझती हूं कि क्या चल रहा है." शान्ताबाई ने कमर पर हाथ रखकर कहा. लीना से छिपाकर मैं कुछ लफ़ड़ा कर रहा हूं, और वो भी एक जवान लड़के के साथ, यह विचार उसे सहन नहीं हो रहा था.

"शांत हो जाओ मेरी प्यारी शान्ताबाई. वो लीना का भाई है, मेरे साथ बंबई घूमने आया है. लीना वहीं है अपने मायके. मेरे को लगा कि तुम अपने आप समझ जाओगी"

वे थोड़ा नरम पड़ीं, फ़िर बोलीं "ऐसे औरतों की अंगिया क्यों पहने है? अजीब लड़का है, वैसे लंड तो अच्छा खासा लगता है, कितनी जम के खड़ा था नींद में. मैंने हाथ लगाया तो जाग गया, फ़िर घबरा गया कि ये कौन औरत अंदर बेडरूम में है"

मैंने उन्हें ललित की फ़ेतिश के बारे में समझाया. वैसे वे होशियार हैं, एक मिनिट में सब समझ गयीं. हंसकर बोलीं "बस इतनी सी बात है ये कुछ हजम नहीं होता भैयाजी. माना उस छोकरे को ये पहनने की आदत है पर इधर आप दोनों अकेले घर में, वो छोकरा सोते वक्त भी वो सब पहने ... ब्रा व्रा ... मस्ती चल रही है लगता है बाई की पीठ पीछे. याने आप को भी लौंडेबाजी का शौक चढ़ ही गया"

"अब शान्ताबाई ... क्या कहूं .... वो इतना सुन्दर छोकरा है और हूबहू लीना जैसा लगता है. ऊपर से उसका ये औरतों के कपड़े पहनने का शौक, अब अगर उसको लीना समझकर मेरा मन डोल जाता है तो बुरा क्या है? और भले लौंडेबाजी हो, अगर दिल आ गया तो बुरा क्या है? आप नहीं करतीं लीना के साथ लौंडीबाजी? साली नहीं है तो साले को साली समझा तो इसमें क्या गैर है?"

इस बात पर शान्ताबाई मुंह पर आंचल रखकर हंसने लगी. फ़िर बोली "भैयाजी, मैं चलती हूं, लगता है मैं फालतू ही आ गयी. आप की रंग रेलियां चलने दो, जब लीना बाई आ जायेगी तो मेरे को बता देना"

"अरे नहीं शान्ताबाई, मुझे आपकी जरूरत है, आपकी मदद के बिना ये काम नहीं होगा, बड़ी नाजुक जगह आकर मामला अटक गया है"

"आप दो जवान मर्द ... आपको मेरी क्या जरूरत होगी भैयाजी"

मैंने धीरे धीरे सब समझाया कि कैसे पिछले चार दिनों में ललित -ललिता के साथ सब तो कर लिया मैंने पर अब तक चोद नहीं पाया उसके घबराने की वजह से. फ़िर बोला "याद है शान्ताबाई, एक दिन आपने कैसी मदद की थी? वेसेलीन नहीं था और लीना जरा ऐसे रूठे चिढ़े मूड में ही थी?"

उस दिन असल में ये हुआ था कि मेरा जम के मूड था लीना की गांड मारने का. शादी के बाद उसने बस एक बार मुझसे मरवाई थी. मैं वैसे हठ नहीं करता पर दो दिन से लीना जैसी टाइट जीन पहनकर घूम रही थी, उसके गोल मटोल चूतड़ एकदम लंड को पागल कर गये थे. अब संयोग ऐसा कि वेसेलीन की बॉटल नहीं मिल रही थी. लीना वैसे भी इस बात से दूर भागती थी, अब तो बहाना मिल गया था. इस बात पर मैं उसे मना रहा था, वो शान्ताबाई ने काम करते करते सुन लिया था. फ़िर उन्होंने मदद की, और उस दिन लीना को दुखा भी कम, और काफ़ी मजा भी आया.

"हां भैयाजी, अच्छी तरह याद है" मुंह चढ़ा कर शान्ताबाई बोली "मैंने ठंडा मख्खन लाकर दिया था फ़्रिज से और फ़िर बाई को अपने ऊपर लेकर सोई थी उसको दिलासा देने को. आप मर्द लोग भी कैसे गांड के पीछे पड़ जाते हैं ये देखकर मेरे को तो बड़ी हैरत होती है. इतनी गरम रसीली रेशमी चूत से क्या आप का मन नहीं भरता?"

"अब कैसे समझाऊं शान्ताबाई, बस समझ लो किसी वजह से दिल जुड़ गये हैं मेरे और ललित के. रही गांड की बात, लीना की मैं नहीं मारता क्या? उतनी ही खूबसूरत ललित की गांड है. आखिर मिठाई तो मिठाई है. और वह भी मिठाई चखाने को एकदम तैयार है, जरा घबरा रहा है बस."

"ठीक है ठीक है भैयाजी, मैं समझ गयी, चलो मैं तैयार कर लूंगी उसको, अब जरा अंदर चलो और उसे समझाओ, मुझे देख कर नींद से जागते ही घबरा गया बेचारा" शान्ताबाई बोली.

मैं उनके साथ अंदर गया. जाते जाते बोली "बस एक घंटा लगेगा मुझे, उस छोकरे को भी फुसला लूंगी और आप के लिये तैयार रखूंगी"

मैं अंदर गया. ललित पलंग पर बैठा था. आधी नींद में था. पर अब अचानक शान्ताबाई के आने से जरा परेशान लग रहा था. मैंने उसके पास बैठ कर कहा "ललिता डार्लिंग - यह है शान्ताबाई, बस जैसे वहां राधाबाई हैं वैसे ही समझ लो." सुनकर ललित जरा आश्वस्त सा होता दिखा.

"फिर ठीक है जीजाजी, नहीं तो क्या धक्का लगा मेरे को - नींद खुली और .... ये बैठी थीं यहां ... मेरा पकड़कर ..."

"अरे मैंने ही उन्हें अंदर भेजा था कि लीना सोई है अंदर. सोचा जरा मजाक कर लूं. वैसे शान्ताबाई बहुत लाड़ दुलार करती हैं लीना दीदी के" मैंने ललित को समझाया.

"तू मत टेन्सन ले बेटे." ललित के बाजू में बैठ कर उसके गालों को सहलाती शान्ताबाई बोलीं. अब तक लगता है वे भी फिदा हो गयी थीं ललित पर. छोकरे की जवानी ही ऐसी थी. "ये तेरे जीजाजी जरा ऐसे ही मजाकिया हैं. अब उठो. दस बजने को आये, तुम लोगों ने नाश्ता भी नहीं किया होगा, मैं बनाती हूं. उसके बाद नहा धो लो. भैयाजी - आप जाकर अपना काम करो, मैं उपमा बनाती हूं. ललित बेटा, जरा मुंह धो लो और आकर मुझे थोड़ी मदद करो"

बीस मिनिट बाद शान्ताबाईने बुलाया. मैं डाइनिंग रूम में गया तो देखा कि शान्ताबाई चम्मच से ललित को उपमा खिला रही थीं. ललित भी आराम से खा रहा था. लगता है इतनी सी देर में ही शान्ताबाई का वशीकरण मंत्र चल चुका था.

"बहुत अच्छा उपमा है मौसी, एकदम सॉफ़्ट और टेस्टी. आप दोसे भी बनाती हो क्या?" ललित बोला. याने अब पहली बार मिली शान्ताबाई बीस मिनिट में मौसी बन गयी थी.

"खाओगे? वो भी बना दूंगी, चलो अब जल्दी जल्दी इतना और खा लो और नहाने चलो, मैं तुमको नहला देती हूं. भैयाजी, नाश्ता करके आप भी नहा वहा लो"

मैं खाने लगा. उधर ललित बोला "अब मैं बच्चा थोड़े ही हूं मौसी कि ..."

"जानती हूं मेरे लाल" उसके अब भी आधे खड़े लंड को पकड़कर शान्ताबाई बोलीं "तभी तो कह रही हूं, अब बच्चों को नहलाने में मेरा क्या फायदा?"

"करवा ले करवा ले मौसी से नहाने का करम. ये मुझे और लीना को भी कभी कभी नहला देती हैं." मैंने ललित को कहा.

शान्ताबाई ने ने बचा हुआ उपमा ललित को खिलाया और फ़िर हाथ पकड़कर खींच कर ले गयीं. ललित बेचारा अभी भी जरा परेशान था. शान्ताबाई के पीछे जाते वक्त मुड़ कर मेरी ओर देखा जैसे कह रहा हो कि बचा लो जीजाजी, पर मैंने बस उसे आंख मार दी.

नाश्ता खतम करके मैंने भी आराम से नहाया, बदन पोछा और थोड़ी देर तक ईमेल देखीं. आधे घंटे के बाद बेडरूम में दाखिल हुआ.

शान्ताबाई एकदम नंगी बिस्तर पर पड़ी हुई थीं. उनके जरा गीले से बालों से लग रहा था कि उन्होंने भी नहा लिया था. उनकी मोटी मोटी टांगें फैली हुई थीं और उनके बीच ललित झुक कर मजे से उनकी चूत चाट रहा था. इतना मग्न था कि मेरे आने का पता भी उसको नहीं चला.

ललित को देखकर मैं दंग रह गया. शान्ताबाई ने एकदम खास सजाया था उसको. याने था वही ब्रा और पैंटी में पर क्या पैंटी थी! काली, छोटी सी और एकदम तंग. लीना ने शायद हनीमून पर पहनी वाली थी. ललित के आधे से ज्यादा गोरे गोरे चूतड़ नंगे थे. और ऊपर से उस पैंटी में पीछे से एक छेद था, बड़ा सावधानी से जैसे किसी ने ठीक गुदा के ऊपर एक दो इंच का छेद कर दिया था. उसमें से ललित का लाल गुलाबी गुदा दिख रहा था. पहले मैं अचंभे में पड़ गया कि ये क्या चक्कर है, फ़िर देखा तो शायद शान्ताबाई ने उसपर हल्की लिपस्टिक से चूत जैसी बना दी थी.

ब्रा गुलाबी रंग की थी. लगता है कहीं अंदर से ढूंढ कर निकाली थी. और विग वही था पर शोल्डर लेंग्थ बालों को पीछे से एक जरा सी चोटी में क्लिप से बांध दिया था जिससे ललित का रूप ही बदल गया था.

शान्ताबाई लेटे लेटे ललित के सिर को पकड़कर अपनी चूत पर दबाये हुए थीं और मस्ती में गुनगुना रही थीं. "बहुत अच्छे बेटे ... बहुत अच्छे मेरे लाल ... कितना प्यार से चाटता है राजा मेरी चूत को ... तेरी दीदी की याद आ गयी ... लीना बाई भी एक बार शुरू होती हैं तो घंटे घंटे सिर दिये रहती हैं मेरी टांगों में ..."

मुझे देखकर बोलीं "भैयाजी, आपने ये नहीं बताया कि हमारा ललित बेटा चूत का कितना दीवाना है. बाथरूम में मेरी बुर देखी तो सीधे उसके पीछे ही पड़ गया. यहां भी देखो कैसे चूस रहा है. कहता है कि पूरा रस निचोड़ कर ही उठूंगा"

ललित उनकी बुर में से मुंह निकाल कर बोला "तुम्हारा रस तो खतम ही नहीं होता मौसी ... अब चोदने दो ना, जैसा तुमने वायदा किया था."

उसके सिर को कस के वापस अपनी जांघों के बीच खोंसते हुए शान्ताबाई बोलीं "पहले अपना काम तो पूरा कर, फ़िर वायदे की बात कर. तुमने कहा था ना कि एक एक बूंद निचोड़ लूंगा मौसी, तो पहले निचोड़. और आप भैयाजी, ऐसे क्यों खड़े हो? आओ ना यहां" अपने बाजू में बिस्तर को थपथपा कर वे बोलीं.

मैं जाकर उनके पास बैठ गया. उन्होंने मेरा सिर नीचे खींच कर कस के मेरा चुंबन लिया, दो तीन मिनिट शान्ताबाई से चूमा चाटी करने में गये, उनके चूमने के अंदाज से ही लगता था कि कितनी गरमा गयी थीं वे. मैंने उनकी मांसल चूंचियां एक दो मिनिट मसलीं और फ़िर उनके निपल एक एक करने चूसने लगा.

"आह ... हाय ... आज कितने दिनों के बाद दो मर्द मेरे से लगे हैं .... और चूसो भैयाजी ... आह अरे कितने जोर से काटते हो ... दुखता है ना" सिसककर वे बोलीं पर मैंने निपल चबाना चालू रखा. उन्होंने मेरा सिर अपनी छाती पर दबा लिया और बोलीं "वैसे ये लौंडा लाखों में एक है भैयाजी ... इतना चिकना लौंडा नहीं देखा ... ये इसके चूतड़ देखो, लीना बाई की बराबरी के हैं ... और लंड भी कोई कम नहीं है भैयाजी ... एकदम कड़क गाजर जैसा ..."

मैं ललित के नितंबों पर हाथ फेरने लगा. अब मेरा लंड कस के तन्ना गया था. मुंह में पानी आ रहा था तंग काली पैंटी में से आधी दिखती उस गोरी गोरी गांड को देख कर, असल में लीना की गांड मारे भी तीन चार हफ़्ते हो गये थे और मेरा लंड बेचारा गांड को तरस गया था. मैंने ललित के पेट के नीचे हाथ डालकर टटोला तो उसका भी हाल बुरा था, लंड एकदम तना हुआ था. मैं ललित के चूतड़ मसलने लगा.

"शान्ताबाई ... अब नहीं रहा जाता" मैंने उनकी ओर देख कर कहा. वे बोलीं "तो चख लो ना मिठाई, ऐसे दूर से क्या ललचा रहे हो"

मैंने झुक कर ललित के नितंबों को चूम लिया. कब से यह करने की इच्छा थी मेरी. उसके बदन में सिरहन सी दौड़ गयी. मैंने पैंटी के छेद में से उसके नरम नरम छेद को थोड़ा सहलाया और उंगली की टिप उसमें फंसा दी. उसका छेद कस सा गया. शान्ताबाई ने देख लिया और मुस्कराने लगीं "ललित ... याने हमारी ललिता रानी अभी कुआरी है भैयाजी, ऐसे बिचके तो कोई नयी बात नहीं. पर अब चोद ही लो, क्यों ललिता ... ललित बेटा ... चुदवा ही ले अब अपने जीजाजी से"

"दुखेगा मौसी?" ललित थोड़े कपते स्वर में बोला.

"बिलकुल दुखेगा, आखिर तेरे जीजाजी का सोंटा है, कोई जरा सी लुल्ली थोड़े है. पर इतना मर्द का बच्चा तू, ऐसे क्या डरता है? इससे तो लड़कियां बहादुर होती हैं, एक बार दिल आये, तो जैसे कहो, जिस छेद में कहो, चुदवा लेती हैं. और मैं हूं ना बेटा. भैयाजी, आप जरा वो डिब्बा इधर करो"

पलंग के पास के स्टैंड पर एक स्टील का डिब्बा रखा था. मैंने उसे खोला तो देखा अंदर मख्खन है, घर में बना चिकना ठंडा मख्खन. शान्ताबाई मुस्करायीं, मुझे याद आ गया कि कैसे उन्होंने उस दिन मख्खन लगवाकर लीना की गांड मुझसे मरवाई थी.

"अब ऊपर आ जा मेरे राजा बेटा. ऐसा लेट मेरे पर" कहकर उन्होंने ललित को अपने ऊपर लिटा लिया. ललित उन्हें बेतहाशा चूमता हुआ उनकी चूत में लंड घुसेड़ने की कोशिश करने लगा. "अभी रुक राजा ... जरा तेरे जीजाजी को भी तो तैयार होने दे ... आप ऐसे इधर आओ भैयाजी"

शान्ताबाई ने हथेली पर मख्खन का एक लौंदा लिया और मेरे लंड पर चुपड़ने लगी. बोली "आप लोग क्यों वेसलीन के पीछे पड़ते हो मेरे पल्ले नहीं पड़ता. अरे मख्खन इतना चिकना है, वो भी घर का मख्खन, इससे अच्छी क्रीम नहीं मिलेगी दुनिया में चोदने के लिये, और चूमा चाटी के दौरान मुंह में चला जाये तो भी अच्छा लगता है, वो वेसलीन तो कड़वा कड़वा रहता है" अपनी मुठ्ठी ऊपर नीचे करके पूरे लंड को एकदम चिकना कर दिया. इतना मजा आ रहा था कि लगा कि ऐसे ही मुठ्ठ मरवा लूं उनसे. उन्होंने उंगली पर थोड़ा और मख्खन लेकर मेरे सुपाड़े पर लगाया और फ़िर हथेली चाटने लगीं "अब आप खुद ही लगा लो ललिता रानी के छेद में. जरा ठीक से लगाना, चिकना कर लेना"

मैंने उंगली पर मख्खन लिया और ललित के गुदा में चुपड़ने लगा. उसने फ़िर गुदा सिकोड़ लिया, लगता है अनजाने में वो अपने कौमार्य को - वर्जिनिटी को बचाने की कोशिश कर रहा था. मैंने शान्ताबाई की ओर देखा और आंखों आंखों में गुज़ारिश की कि आप मदद करो, ये तो गांड भी नहीं खोल रहा है. वे उंगली में मख्खन लेकर ललित की गांड में लगाने लगीं. बोलीं "अब छेद तो ढीला करो ललिता रानी - मेरी उंगली ही नहीं जा रही है तो जीजाजी का ये मूसल कैसे जायेगा! मरवाना है ना? चुदवाना है?" ललित के मुंडी हिला कर हां कहा. "फ़िर छेद ढीला कर अच्छे बच्चे -- बच्ची जैसे" मुझे उन्होंने आंखों आंखों में इशारा किया और फ़िर हाथ मिला कर अलग किये. मैं समझ गया कि वे मेरे को ललित के चूतड़ पकड़कर चौड़े करने को कह रही हैं.

मैंने वो मुलायम चूतड़ फैलाये और शान्ताबाई उंगली उसके गुदा पर उंगली रखकर दबाने लगीं. अब उनकी उंगली अंदर धंसने लगी. कई बार उन्होंने मख्खन लेकर छेद में लगाया और उंगली अंदर तक आधी घुसाई. जिस तरह से ललित का गुलाबी छेद चौड़ा होकर उंगली को अंदर ले रहा था, मेरा पागलपन पढ़ रहा था. क्या टाइट कुआरा छेद था! मन में बस यही था कि आज पटक पटक कर चोदूंगा भले फट जाये.

उधर गांड में उंगली करवाने से ललित महाराज भी मस्ता रहे थे, बार बार धक्के मारकर शान्ताबाई की चूत छेदने की कोशिश कर रहे थे. शान्ताबाई ने भी उसको कस के पकड़ रखा था "ऐसे उतावले ना हो मेरे राजा ... धक्के मत मार अभी ... तेरे जीजाजी को चढ़ जाने दे एक बार ... फ़िर तू भी मन भरके चोद लेना. मजा आयेगा. तू मेरे को चोदेगा और तेरे जीजाजी तेरे को चोदेंगे. चलिये, आ जाइये भैयाजी"

पर ललित से रुका नहीं जा रहा था, वह शान्ताबाई से चिपटा जा रहा था और उनकी बुर में लंड डालने की भरसक कोशिश कर रहा था. देख कर उसपर तरस खाकर शान्ताबाई ने अपनी चूत खोल ली और अगले ही पल ललितने अपना लंड पेल दिया. फ़िर चहक कर बोला "कितनी टाइट चूत है मौसी ... आह .. ओह"

शान्ताबाई की बुर सच में इतनी टाइट है कि लगता है जैसे किसी एकदम जवान लड़की की हो. प्रकृति का यह चमत्कार ही है कि इतने मांसल खाये पिये बदन के साथ ऐसी सकरी चूत उनको मिली हो.

ललित अब तक सपासप चोदने लगा था. शान्ताबाई ने उसको अपने हाथों पैरों में कसकर उसके धक्के बंद किये और बोलीं "अब जरा रुक मेरे राजा ... इतना उतावला ना हो ... तेरे को अकेले अकेले ये मजा नहीं करने दूंगी मैं ... अपने जीजाजी को भी अंदर डाल लेने दे, फ़िर तुम दोनों चोदना एक साथ. चलिये भैयाजी, अब देरी मत कीजिये"

उन्होंने मेरी मदद की. सिर्फ़ होंठ हिला कर बिना आवाज किये मूक स्वर में बोलीं "धी ऽ रे ऽ धी ऽ रे ऽ प्या ऽ र से ऽ" फ़िर ललित के चूतड़ पकड़कर चौड़े किये, पैंटी के छेद में से उसका सकरा गुलाबी छेद दिख रहा था, खुला हुआ. मैंने सुपाड़ा जमाया और धीरे धीरे पेलने लगा. लगता था कि सटक जायेगा, छेद इतना सकरा था पर मैंने सुपाड़ा जमाये रखा. उसकी टिप अंदर फंसने के बाद मैं थोड़ा रुका. ललित ने गुदा सिकोड़ लिया था इसलिये मैंने जबरदस्ती नहीं की. शान्ताबाई प्यार से उसके नितंबों को सहलाने लगीं. "अब जरा खोल ना बेटे ... बेटी तेरे जीजाजी के लिये, बेचारे कैसे तरस रहे हैं देख जरा. बस जरा ढीला छोड़ .... "

उनके पुचकारने का असर हुआ, धीरे धीरे ललित का छेद ढीला होता सा लगा, मैंने तुरंत मौका देख कर पूरा सुपाड़ा ’पक्क’ से अंदर कर दिया. अब मेरा सुपाड़ा अच्छा खासा मोटा है, उसे दुखा होगा क्योंकि उसका बदन थोड़ा ऐंठा और मुंह से एक हल्की सी आवाज निकली, हल्की सी क्योंकि शान्ताबाई ने ललित के मुंह में अपनी एक नरम नरम चूंची ठूंस रखी थी. यहां ललित थोड़ा तड़पा, और वहां उन्होंने कस के उसका सिर अपनी छाती पर और भींच कर आधा मम्मा मुंह में भर दिया. फ़िर मुस्कराकर मुझे इशारा किया कि अब पेल दो. उनकी भी आंखें चमक रही थीं, ऐसे अपनी मालकिन के छोटे भाई की गांड मारी जाती देख कर शायद बड़ी एक्साइटेड हो गयी थीं. उधर मैं एकदम मस्त था, ऐसा लग रहा था कि किसी ने कस के मेरा सुपाड़ा मुठ्ठी में पकड़ा हो.

मैंने जोर लगाया और आधा लंड ललित के नितंबों के बीच उतार दिया. ललित का बदन एकदम कड़ा हो गया. शान्ताबाई ने इशारा किया कि बस अब रहने दो. ललित फ़िर जरा तड़पने सा लगा था पर मेरे लंड पेलना बंद करते ही फ़िर रिलैक्स होकर शान्ताबाई की बाहों में समा गया.

"बस हो गया राजा .... देखा फालतू घबराता था तू. अब चोद मेरे को, तब से लगा है कि मौसी चोदूंगा, अब कर ले अपने मन की"

ललित धीरे धीरे शान्ताबाई को चोदने लगा. मैं वैसे ही उसके ऊपर झुक कर बैठा रहा. उसके चोदने से अपने आप मेरा लंड इंच भर उसकी गांड के अंदर बाहर हो रहा था. ललित की गांड ऐसी टाइट थी जैसी शायद किसी लड़की की चूत नहीं होती होगी. अपार सुख का आनंद लेता हुआ मैं अब भी किसी तरह अपने आप पर संयम रख कर बैठा रहा.

कुछ देर के बाद अचानक ललित ने कस के धक्के मारने शुरू कर दिये, लगता है शान्ताबाई की टाइट योनि ने उसको गाय के थन की तरह दुहना शुरू कर दिया था जो उनकी स्पेशलिटी थी. बेचारा कामदेव के उस बाण को कैसे सहता.

अब अपने आप ललित की गांड चुद रही थी. एक दो मिनिट मैंने और सहन किया, फ़िर मुझसे ना रहा गया. मैंने झुक कर ललित के बदन को बाहों में लिया और उसके नकली स्तन पकड़कर दबाते हुए घचाघच चोदने लगा. ललित का सिर तो शान्ताबाई की छाती पर दबा हुआ था, वे उसके मुंह में अपनी चूंची ठूंसी हुई थीं, पर उनका वो मादकता से दमकता चेहरा मेरे सामने था. मैंने शान्ताबाई के रसीले होंठ अपने होंठों में पकड़े और उनके मुखरस का पान करते हुए लंड पेलने लगा. दो चार धक्कों में ही मेरा पूरा लंड जड़ तक ललित की सकरी नली में समा गया. मुझे लगा था कि ललित चिलायेगा या तड़पेगा पर शायद अब वह इतना गरमा गया था कि बिना रुके शान्ताबाई को चोदता रहा. मैंने अपने स्ट्रोक उससे मैच कर लिये याने जब वह अपना लंड शान्ताबाई की चूत में पेलता, तो मैं अपना लंड उसकी गांड से करीब करीब सुपाड़े तक बाहर निकालता और जब वह लंड बाहर की तरफ़ खींचता तो मैं जड़ तक उसके नितंबों के बीच अपना लंड गाड़ देता.

यह तीव्र चुदाई अधिक देर चलना संभव ही नहीं था. मैं ऐसा कस के झड़ा कि जैसे जान ही निकल गयी. हांफ़ते हांफ़ते मैं नंगे शरीरों के उस ढेर के ऊपर पड़ रहा. शान्ताबाई और ललित अब भी जोश में थे, ललित हचक हचक कर चोद रहा था और शान्ताबाई नीचे से चूतड़ उछाल उछाल कर चुदवा रही थीं. मैं झड़ जरूर गया था पर लंड अब भी तना हुआ था, एक दो मिनिट लगे लंड को जरा बैठने को, तब तक ललित की चुदाई चलती रही और मेरे चुदे लंड के ललित की नली के घर्षण से मेरे सुपाड़े में अजीब सी असहनयीय गुदगुदी होती रही. मुझसे और सहा नहीं जा रहा था पर फ़िर जल्दी ही ललित भी भलभला कर झड़ गया.

शान्ताबाई ने मुझे आंख मारी और आंखों आंखों में पूछा कि मजा आया, मन जैसा हुआ कि नहीं. मैंने पलक झपका कर हां कहा. फ़िर शान्ताबाई ने ललित के कान खींच कर कहा "बस इतना सा चोद के रह गया? अब मैं क्या करूं? मुझे लगा था कि जवान लड़का है, पंधरा बीस मिनिट तो कस के चोदेगा.

ललित बेचारा कुछ कहने की स्थिति में नहीं था. आंखें बंद करके हांफ़ता हुआ पड़ा था.

मैंने कहा "शान्ताबाई, आप को ऐसे नहीं टंगा हुआ छोड़ेंगे, ललिता डार्लिंग, जरा बाजू हट रानी" ललित को बाजू में करके मैं शान्तबाई की टांगों के बीच लेट गया और उनकी बुर को जीभ से चाटने लगा. हमेशा की तरह का मादक टेस्ट था, पर आज उसमें कुछ गाढ़ी सफ़ेद मलाई भी मिली हुई थी. झड़ा होने के बावजूद मेरा मस्ती गयी नहीं थी इसलिये उनकी चूत को निचोड़ता रहा जब तक वे भी एक सिसकी के साथ स्खलित नहीं हो गयीं.

थोड़ी देर से शान्ताबाई ने उठकर कपड़े पहने. "ये क्या शान्ताबाई, जा रही हो? अभी तो शुरुआत हुई है मीठी मीठी"

"अब ये आगे की प्यार मुहब्बत तुम दोनों में ही होने दो, मेरा काम हो गया, मैं तो लीना बाई आ गयी यह सोच कर आयी थी. तुम दोनों का मिलन करवाने को रुक गयी, अब जीजा साले के बीच मैं क्यों आऊं"

"रुक भी जाओ बाई, ये जीजा साला नहीं, जीजा साली का चक्कर है, ये मेरा साला साली से ज्यादा खूबसूरत है, अब ललित लड़का है इसमें मैं क्या करूं. आप रहेंगी तो ऐसे ही ठीक से इसको प्यार कर पाऊंगा"

"मैं आ जाऊंगी परसों."

"परसों क्यों? कल क्यों नहीं?" मैंने पूछा.

शान्ताबाई उठ कर किचन में गयीं. उनके इशारे से मैं समझ गया कि कुछ बात करना चाहती हैं. मैंने ललित की ओर देखा, वो अब भी पड़ा पड़ा आराम कर रहा था. मैंने उसे किस किया और बोला "ललिता डार्लिंग, ज्यादा दुख रहा है क्या?"

उसने मुंडी हिला कर ना कहा. मैंने उसे पलटाकर उसकी गांड देखी कि सच में फाड़ तो नहीं दी मैंने. गांड ठीक ठाक थी, शान्ताबाई ने लगाये मख्खन ने उसकी तकलीफ़ काफ़ी कम कर दी थी. हां गांड का छेद जो हमेशा बंद रहता है, थोड़ा खुला था और उसमें से उसके गुदा के अंदर का गुलाबी भाग दिख रहा था. ऐसा ही लीना के साथ हुआ था इसलिये मैंने राहत की सांस ली नहीं तो लीना मुझे कच्चा चबा जाती. मैंने ललित को कहा "आराम करो रानी, मैं अभी आया"

ललित बोला "जीजाजी, मौसी को आज रोक लीजिये, बड़ा मजा आया उनके साथ"

"कोशिश करता हूं" कहकर जब मैं किचन में आया तो शान्ताबाई बादाम काट रही थीं. "बादाम का हलुआ बना रही हूं भैयाजी, अब जरा शक्ति चाहिये ना ये सब रंगरेलियां करने को?"

मैंने पूछा कि मुझे क्यों बुलाया था, कुछ कहना है क्या?

शान्ताबाई बोलीं "अब आज इस लड़के को और तंग मत करना भैयाजी"

मैंने कहा कि ललित तो ठीक लगता है, मजे में है, आपके मख्खन ने कमाल कर दिया तो बोलीं "अरे तुम नहीं जानते कि इतने हलब्बी लंड से चुदवाने पर गांड की क्या हालत होती है. उस दिन लीना बाई की भी गांड कैसी ठुक ठुक कर छिल सी गयी थी. वो तो रोने को आ गयी थी, मैंने संभाला था उसको इसलिये कहती हूं कि आज रहने दो, कल से करना फिर से, भले ललित कुछ ना कहे, उसे दुख जरूर रहा होगा, कल तुम दोनों ही जरा सबर से रहो, परसों मैं आ जाऊंगी"

मैं उनको पकड़कर उनके मम्मे दबाते हुए बोला "फ़िर तो आप अभी रुक ही जाओ मौसीजी, आप के भांजे के लिये. और जरा मुझे भी मौका दीजिये, आप आज ठीक से चुदी कहां हैं? आप को ऐसे सूखे सूखे वापस भेजना मुझे अच्छा नहीं लगता"

शान्ताबाई बोलीं "कुछ भी कहते हो भैयाजी, आते ही आपने नहीं चिद दिया था मेरे को?" पर मेरी बात से उनके चेहरे पर लाली सी आगयी थी.

"वो तो जल्दी जल्दी, आप जैसे जोबन वाली अप्सरा को तो फ़ुरसत में मन लगा कर चोदना चाहिये"

उन्होंने एक दो बार ना नुकुर की पर फ़िर तुरंत मान गयीं. वैसे इतना मस्त माहौल छोड़ कर जाने का उनका भी मन नहीं था.

जब तक वे खाना बना रही थीं, तब तक मैंने थोड़ा ऑफ़िस का काम कर लिया. ललित रसोई में उनकी सहायता कर रहा था और गप्पें मार रहा था.

एकाध घंटे बाद खाना खाकर मैं और ललित आकर बेडरूम में आकर शान्ताबाई की राह देखने लगे. मेरे साथ आते वक्त ललित ने शान्ताबाई की ओर देखा तो वे बोलीं "शाम को प्रैक्टिस करवा दूंगी ललिता रानी" और हंस कर उसे आंख मार दी. मुझे बड़ा कुतूहल था कि क्या बातें कर रहे हैं पर मैं कुछ बोला नहीं.

मैं ललित को पास लेकर बोला "तो ललिता रानी, अब बताओ कि बहुत दुखा तो नहीं?"

"बहुत दुखा जीजाजी, कितना बड़ा है आपका, मैंने नहीं सोचा था कि ऐसे मेरी चौड़ी कर देगा. पर ... मजा भी आया जीजाजी, बाद में आप चोद रहे थे तो ... दुखता भी था और ... मस्त गुदगुदी भी होती थी. ... मुझे चोद कर आप को कैसा लगा जीजाजी .... याने दीदी को तो आपने इतनी बार चोदा है ... उसके कंपेरिज़न में?"

"बहुत मजा आया मेरी जान ... क्या मखमली गांड है तेरी जालिम ... पर अपनी दीदी को मत बताना प्लीज़ नहीं तो मुझे जिंदा नहीं छोड़ेगी, कहेगी कि गांड मेरी मारते हो और तारीफ़ और किसी की गांड की करते हो, भले वो उसके छोटे भाई की गांड हो. पर यार ललित ... मेरा मतलब है ललिता रानी, तेरी गांड की बात ही और है, कसी हुई, कोमल, मखमली, गरम गरम ... एकदम हॉट. मैं तो गुलाम हो गया इस गांड का, अब चाहे तो तू मुझे ब्लैकमेल कर सकता है, मैं कुछ भी कर लूंगा तेरी ये गांड पाने को"

"मैं आप को क्यों ब्लैकमेल करूंगा जीजाजी! आप के साथ तो इतनी मौज मस्ती चल रही है मेरी" वो बोला.

थोड़ी देर से घर का काम निपटाकर शान्ताबाई अंदर आयीं. "क्यों ललित बेटे, ठीक ठाक है ना?"

"हां मौसी, आप ठीक कह रही थीं कि दुखेगा पर मजा आयेगा. वैसा ही हुआ"

"चलो, ये अच्छा हुआ. वैसे तेरी तारीफ़ करनी चाहिये कि तेरे जीजाजी का तूने ऐसे आसानी से ले लिया. तेरी दीदी भी करीब करीब रो दी थी उस दिन"

घर का काम करने के लिये उन्होंने लीना का एक ढीला गाउन पहन किया था. गाउन निकालकर वे बिस्तर पर बैठ गयीं. "चलिये भैयाजी, आप को जो करना है, कीजिये, बहुत देर हो गयी, अब मेरे को जाना है" कहने को वे जल्दबाजी कर रही थीं पर मुझे पता था कि रात भर रोक कर चोदता तो भी वे आसानी से मान जातीं.

"अब पहले आपकी जरा वो स्पेशल बैठक हो जाये शान्ताबाई. आज आपके इस मुलायम माल में घुस जाने का मन हो रहा है" कहकर मैं बिस्तर पर लेट गया और खिसक कर अपना सिर एक बाजू के किनारे पर कर लिया.

"अब ये क्या शौक चर्राया है आज आपको" शान्ताबाई मेरी ओर देख कर बोलीं "पिछली बार दम घुटने लगा था, लीना बाई ने क्या क्या नहीं कहा मेरे को तब"

"अब लीना कभी कभी उलटा सीधा करती है तो मैं क्या करूं बाई? उस दिन मेरा दम वम कुछ नहीं घुटा था, जरा मूड में आकर आपके इस मुलायम बदन की खुशबू ले रहा था मुंह और नाक से, तो वो न जाने क्या समझ बैठी"

"ठीक है, मैं बैठती हूं, मुझे भी अच्छा लगता है ऐसा किसी शौकीन के मुंह पर बैठना. पर एक बार बैठूंगी तो पंधरा बीस मिनिट नहीं उठूंगी ये पहले ही समझ लो. फ़िर मेरे को नहीं बोलना"

"घंटे भर बैठिये ना शान्ताबाई, मुझे ये जन्नत थोड़ी देर और मिलेगी. ललित राजा, तू भी देख, ये नया तरीका है मौसी जैसी मतवाली नार के जोबन को चखने का" ललित बड़े इन्टरेस्ट से ये नया करम देख रहा था.

शान्ताबाई बिस्तर के पास आ कर मेरी ओर पीठ करके खड़ी हो गयीं. मैंने उनके भारी भरकम चूतड़ हाथों में पकड़ लिये और दबाने लगा. एकदम तरबूज थे, रसीले तरबूज. फ़िर टांगों के बीच हाथ डालकर उनकी घुंघराले बालों में छिपी बुर में उंगली की, मस्त एकदम गीली चिकनी थी. वे पीछे देखकर बोलीं "चलो हाथ हटाओ, अब जो कुछ करना है वो मुंह से करो" और वे धप्प से मेरे चेहरे पर अपना पूरा वजन दे कर बैठ गयीं. उनकी मुलायम तपती गीली चूत और नरम नरम नितंबों ने मेरा पूरा चेहरा ढक लिया. मेरा मुंह और नाक दोनों उनके निचले अंगों में समा गये. होठ और ठुड्डी उनकी बुर के पपोटों में दब गये और नाक उनकी गांड के छेद में फंस गयी. मैं बुर के पपोटे चूसने लगा.

ललित की आवाज आयी, वो बेचारा थोड़ा परेशान लग रहा था "मौसी ... अरे ये क्या कर रही हो! जीजाजी का तो पूरा चेहरा तुमने दबा लिया, उनको सांस लेने में तकलीफ़ हो रही होगी"

"हो तकलीफ़ तो हो मेरी बला से, मुझे तो मजा आ रहा है. और मैंने तो कहा नहीं था, ये उन्हींकी फ़रमाइश है" शान्ताबाई बोलीं. फ़िर एक मिनिट बाद हंसकर बोलीं "अरे ऐसा क्या परेशान हो रहा है, कुछ नहीं होगा तेरे जीजाजी को. उनको बहुत मजा आता है. पहले मैं भी सोचती थी कि यह क्या पागलपन करते हैं पर उनको अच्छा लगता है तो ठीक है ना. अब तू आ मेरे पास बैठ और मुझको जरा अपने इस प्यारे प्यारे मुखड़े के चुम्मे दे"

फ़िर चूमाचाटी की आवाज आने लगी. शान्ताबाई की ’अं .. उं ... अं ... चुम ... चुम ..’ ज्यादा सुनाई दे रही थी, वे शायद अपनी चपेट में फंसे उस हसीन जवान लड़के के होंठ कस कस के चूस रही थीं. अब साथ साथ वे थोड़ा आगे पीछे होकर अपनी चूत और अपनी गांड मेरे मुंह और नाक पर घिस रही थीं. उस गीले मांस को मैं सन्तरे जैसा चूस कर चम्मच चम्मच उनकी बुर से रिसता शहद पी रहा था.

"अरे सिर्फ़ मेरी छतियां दबायेगा कि चूसेगा भी? चल अब मुंह में ले ले मेरा दुदू" शान्ताबाई की आवाज आयी. फ़िर स्तनपान कराने के स्वर सुनाई देने लगे.

"क्यों भैयाजी? मजा आ रहा है? स्वाद लग रहा है? फ़िर जरा जीभ भी चलाओ ना, मेरी बुर के अंदर डालो जरा और जीभ से चोदो, देखो कैसी टपक रही है मुई पर झड़ती नहीं"

मैंने जीभ डाली और अंदर बाहर करने लगा. बीच में मेरे होंठों पर जो कड़ा कड़ा चने जैसा दाना महसूस हो रहा था, उसको चूस लेता या हल्के से काट लेता. शान्ताबाई अब धीरे धीरे मेरे सिर पर ऊपर नीचे होने लगी थीं. अचानक बोलीं "ललित ... आ जा मेरी गोद में ... तेरे जीजाजी को जरा और मस्त करते हैं"

कुछ ही देर में उनका वजन एकदम बढ़ गया, ललित उनकी गोद में आ गया था. अब मेरा चेहरा उनकी तपती गीली चूती बुर में ढक गया था. मैंने जो मुंह में आया वो भर लिया. चूसने लगा, बीच में हल्के से काट भी खाया. "उई ऽ मां ऽ ... ओह ऽ मां ऽ... करती शान्ताबाई झड़ गयीं और मेरा पूरा चेहरा गीला हो गया.

दो मिनिट सांस लेने के बाद शान्ताबाई ने ललित को गोद से उतारा और लेट गयीं. मेरी ओर बाहें पसार कर बोलीं "अब आ जाइये भैयाजी ... बहुत देर से इंतजार कर रहे हैं ... और मैं भी कर रही हूं"

"पर झड़ाया तो आपको शान्ताबाई अभी अभी मैंने, फ़िर आप कहां इन्तजार कर रही हैं, इन्तजार तो कर रहा है मेरा ये सोंटा जिसे अब तक आपकी बुर को कूटने का मौका नहीं मिला है" उनकी चूत में लंड पेलते पेलते मैं बोला.

"चुसवाना तो ठीक है भैयाजी पर जब तक बदन के अंदर बड़ा सा लंड न चले, चूत रानी का पेट नहीं भरता" कहकर उन्होंने मुझे खुद के ऊपर चढ़ा लिया. मैं उनपर चढ़ कर चोदने लगा. ये प्योर चुदाई थी, बस घचाघच घचाघच उनकी बुर को मैं कूट कूट कर चोद रहा था. ऐसी चुदाई लीना के सामने करने का ज्यादा मौका नहीं मिलता था इसलिये उन्होंने भी दिल खोल कर चुदवाया, नीचे से चूतड़ उछाल उछाल कर, कमर हिला हिला कर अपनी बुर में लंड पिलवाया. वे ललित को पास लेकर सोयी थीं और उसे बार बार चूम रही थीं. ललित आंखें फाड़ फाड़ कर ये चुदाई देख रहा था. शायद सोच रहा था कि जिस तरह से मैं शान्ताबाई को चोद रहा था, वैसा उसको चोदता तो उसकी गांड का क्या हाल होता!

ललित के चेहरे के भाव देखकर शान्ताबाई जोर से सांस लेते हुए बोलीं "लगता है ... ललित राजा ने ... जीजाजी के असली कारनामे देखे नहीं हैं ... एक नंबर के खिलाड़ी हैं राजा वे ... न जाने कहां से सीखे हैं ... लीना बाई घर में ना हों तो आधे घंटे में मुझे ऐसे ठोक देते हैं कि दो तीन दिन के लिये मेरी ये बदमाश बुर ठंडी हो जाती है"

"अब लीना जैसी अप्सरा ... बीवी हो तो ... आदमी बहुत कुछ ... सीख जाता है ... ललित ... पर जरा संभालना पड़ता है ... पटाखा है पटाखा ... कब फूट जाये पता भी नहीं चलता ..." मैंने चोदते हुए कहा.

"हां ललित बेटा ... तुम्हारी दीदी याने एकदम परी है ... हुस्न की परी ...." शान्ताबाई चूतड़ उछालते हुए बोली "जब से वे यहां ... रहने आयीं ... तब से मैं देखती थी हमेशा ... फ़िर मेरे यहां से सब्जी भाजी खरीदने लगीं ... मैं तो बस टक लगाकर देखती रहती थी उनका रूप. और तू जानता है- उसको देखकर मेरी चूत गीली हो जाती थी जैसे किसी मर्द का लंड खड़ा हो जाता होगा. अब उसके सामने मैं क्या हूं , फ़िर भी मेरे पास थोड़ा बहुत माल तो है ना ... " अपने ही स्तनों को गर्व से देखती हुई शान्ताबाई बोली " ... सो मैं भी दिखाती थी उसको अपनी पुरानी टाइट चोली पहन पहन कर. उनकी आंखों को देखकर लगता था कि वे भी मुझे पसंद करती हैं इसलिये बड़ी तमन्ना से रोज राह देखती थी उनकी. और जब एक दिन लीना बाई खुद बोली कि शान्ताबाई, अब भाजी का ठेला छोड़ो और मेरे यहां काम करने को आ जाओ, मेरे को लगा जैसे मन्नत मिल गयी हो"

"वैसे आप भी कम खूबसूरत नहीं हैं शान्ताबाई, बस यह फरक है कि लीना जरा नाजुक और स्लिम है और आप के जलवे एकदम खाये पिये मांसल किस्म के हैं. ये पपीते जैसे स्तन ... या ये कहो कि झूलते नारियल जैसी चूंचियां, ये जामुन या खजूर जैसे निपल, ये नरम नरम डनलोपिलो जैसा पेट, ये घने रेशमी घुंघराले बालों से भरी - घनी झांटों के बीच खिली हुई लाल लाल गीली चिपचिपी गरमागरम चूत ... अब वो रंभा और उर्वशी के पास भी इससे ज्यादा क्या होगा बाई?" मैंने तारीफ़ की. हमेशा करता हूं, बाई ऐसे खिल जाती हैं कि रस का बहाव दुगना हो जाता है. अब भी ऐसा ही हुई, उनमें ऐसा जोर आया कि डबल स्पीड से नीचे से चोदने लगीं.

अब मस्ती में उन्होंने ललित को बैठने को कहा और फ़िर कमर में हाथ डालकर उसे पास खींचा और उसका लंड मुंह में ले लिया. जब तक ललित ने उनको अपनी क्रीम खिलाई तब तक वे एकदम सर्र से झड़ गयीं. ऐसी झड़ीं कि तीन चार हल्की हल्की चीखें उनके मुंह से निकल गयीं. झड़ने के बाद फ़िर उनको मेरे लंड के धक्के जरा भारी पड़ने लगे. "बस बाबूजी ... भैयाजी अब रुक जाओ ... हो गया मेरा ... " वे कहती रह गयीं पर मैंने उनके होंठ मुंह में लेकर उनकी बोलती बंद कर दी और ऐसा कूटा कि वे तड़प कर अपना सिर इधर उधर फ़ेकने लगीं.

जब वे पांच मिनिट में उठीं तो पूरी लस्त हो गयी थीं. कपड़े पहनते पहनते ललित से बोलीं "तेरे जीजाजी से चुदवा कर मैं एकदम ठंडी हो जाती हूं बेटा ... क्या कूटते हैं ... बड़ा जुलम करते हैं ... मेरे और तुम्हारी दीदी जैसी गरम चूत को ऐसा ही लंड चाहिये नहीं तो जीवन नरक हो जाता है बेटा. खैर, अब मैं चलती हूं, तुम आराम करो"

"मौसी ... तुमने प्रॉमिस किया था" ललित उठकर चिल्लाया.

"अरे भूल ही गयी, चलो बेटा, उस कमरे में चलते हैं" फ़िर मेरी ओर मुड़ कर बोलीं "अब ऐसे ना देखो, कुछ ऐसा वैसा नहीं करने वाली इस छोरे के साथ, करना हो तो सरे आम आप के सामने करूंगी. इतनी भयंकर चुदाई के बाद किसी में इतना हौसला नहीं है कि अंदर जाकर शुरू हो जायें. ललित को कुछ सिखाना है, आप बाहर बैठ कर अपना काम करो अब"

मैं बाहर जाकर बैठ गया. मन हो रहा था कि अंदर जाकर देखूं कि क्या चल रहा है पर फ़िर रुक गया.

करीब डेढ़ घंटे बाद शान्ताबाई बाहर आयीं. मुड़ कर बोलीं "आओ ना ललिता रानी, शरमाओ मत"

और अंदर से साड़ी पहनी, पूरी तरह से तैयार हुई एक खूबसूरत लड़की के भेस में ललित बाहर आया. क्या बला का हुस्न था. मैंने सोचा कि ललित बाकी कैसे भी कपड़े पहने, लीना की तरह की सुंदरता उसकी साड़ी में ही निखरती थी.

मेरी आंखों में के प्रशंसा के भाव देखकर शान्ताबाई गर्व से बोलीं "ये खुद पहनी है इसने, आखिर सीख ही गया, एक घंटे में चार पांच बार प्रैक्टिस करवाई मैंने, वैसे सच में शौकीन लड़का है भैयाजी हमारा ललित, नहीं तो लड़कियों को भी आसानी से नहीं आता साड़ी बांधना."

ललित को सीने से लगाकर वे बोलीं "ललित राजा ... अरे अब तुझे ललिता कहने की आदत डालना पड़ेगी, अब मैं परसों आऊंगी, तब तक जो इश्क विश करना है, कर ले जीजाजी के साथ." ललित वहां आइने में खुद को निहारने में जुट गया था, बड़ा खुश नजर आ रहा था.

बाहर जाते जाते मेरे पास आकर शान्ताबाई बोलीं "भैयाजी, जरा बुरा मत मानना, आप को कह कर गयी थी कि कुछ नहीं करूंगी पर अभी मैंने अंदर साड़ी पहनाते पहनाते फ़िर से ललित का लंड चूस लिया, आप को बुरा तो नहीं लगेगा भैयाजी?"

"मुझे क्यों बुरा लगेगा बाई? आप को मौसी कहता है आखिर. पर अभी फिर से याने ... अभी एक घंटा पहले ही तो चोदते वक्त आपने चूसा था फ़िर ... "

"अरे साड़ी पहनाते पहनाते मुझसे नहीं रहा गया, और लड़के का शौक तो देखो, साड़ी पहनने के शौक में फ़िर लंड खड़ा हो गया उसका. ऊपर से कहता है कि गोटियां दुखती हैं. असल का रसिक लौंडा है लगता है. मुझसे नहीं रहा गया. याने आज रात को ज्यादा मस्ती नहीं कर पायेगा बेचारा, तीन चार बार तो मेरे साथ ही झड़ा है छोकरा. आप ऐसा करो कि आज सच में आप दोनों आराम कर लो भैयाजी, कल नये दम खम से अपनी प्यार मुहब्बत होने दो"

"ठीक है बाई, मैं आज ललित को तकलीफ़ नहीं दूंगा"

"और मैंने बादमा का हलुआ बहुत सारा बनाया है रात को भी खा लेना, अच्छा होता है सेहत के लिये, खास कर नौजवान मर्दों के लिये. और भैयाजी .... बुरा मत मानना ... एक बात कहनी है ..." वे बोलीं. अब तक हम बाहर ड्राइंग रूम में आ गये थे, ललित अंदर ही था.

"अब मैं क्यों बुरा मानूंगा?" मैंने पूछा.

"अरे आप भरे पूरे मर्द हो, और अधिकतर मर्दों को मैं जो कहने जा रही हूं, वो बात ठीक नहीं लगेगी, पर आप उसको इतना प्यार करते हो इसलिये कह रही हूं. ललित को आप बहुत अच्छे लगते हैं, याने जैसा आपने आज उसके साथ किया, शायद उसको भी आपके साथ वैसा ही करना है. आज उसे साड़ी पहनना सिखाते वक्त मैं जब उसके इस लड़कियों के कपड़े के शौक के बारे में बातें कर रही थी तो वो बोला कि जीजाजी भी अगर ऐसे ... बन जायें तो बला के सेक्सी लगेंगे."

"याने ऐसे लड़कियों के कपड़े पहनकर? ..." मैं अचंभे में आ गया.

"... और भैयाजी ..."

"क्या शान्ताबाई?"

आंख मार कर वे बोलीं "ऐसा मत समझो आप कि उसको बस आपका लंड ही अच्छा लगता है, पूरे बदन पर फिदा है आपके, शरमा कर कह नहीं पाता पर ...’ मेरे चूतड़ को दबा कर शान्ताबाई बोली "इसमें भी बड़ा इन्टरेस्ट लगता है छोरे का"

"ऐसा?" मैंने चकराकर कहा "बड़ा छुपा रुस्तम निकला. ठीक है, मैं देख लूंगा उसको"

"डांटना मत. वो आपका दीवाना है" कहकर वे दरवाजा खोल रही थीं तो मैंने कहा "परसों जरूर आइये शान्ताबाई. मैं अब रोज रोज तो छुट्टी नहीं ले सकता, आप आयेंगी तो मन बहला रहगा उसका"

कमर पर हाथ रखकर शान्ताबाई बड़ी शोखी से बोलीं "सिर्फ़ मन ही नहीं, तन भी बहला रहेगा मेरे साथ. अब देखो भैयाजी, सिर्फ़ गपशप करने को तो मैं आऊंगी नहीं, इतना हसीन जवान है, खेले निचोड़े बिना नहीं रहा जायेगा मेरे को"

"मैं कब कह रहा हूं कि सिर्फ़ गप्पें मारो शान्ताबाई. हां पूरा मत निचोड़ लेना बेचारे को, मेरे लिये भी थोड़ा रस छोड़ दिया करो. उसे खुश रखना है शान्ताबाई. इतना खुश कि आकर लीना के पास तारीफ़ के पुल बांध दे, मैं चाहता हूं कि वो यहां इतन रम जाये कि हमेशा आकर यहां रहे"

"मैं समझ गयी भैयाजी, आप चिन्ता मत करो. ऐसी जवानी का लुत्फ़ मिलने को तकदीर लगती है"

उस रात मैंने और ललित ने ज्यादा कुछ नहीं किया. बस बाहर बैठकर जरा गपशप की और किसिंग वगैरह की. ललित सोने तक उसी साड़ी को पहने हुए था इसलिये बस उसके उस स्त्री रूप की मिठास मैंने उसके चुंबनों में चखी.

"जीजाजी, आप से कुछ मांगूं तो आप देंगे?" वो बोला.

"वो शर्त के बारे में बोल रहा है क्या?"

"नहीं जीजाजी, वो ... याने आप भी ऐसे ... आप का बदन भी इतना गोरा चिकना और सुडौल है ... आप भी वो लिन्गरी में ... बड़े मस्त दिखेंगे" शान्ताबाई सच कह रही थीं. पर एक बात अच्छी थी कि ललित अब खुले दिल से अपने मन की बात कह रहा था.

"तेरी बात और है जानेमन, मेरी और. तू इतना नाजुक चिकना जवान है, अब पांच फुट दस इंच ऊंचा और बहात्तर किलो का मेरे जैसा आदमी अजीब नहीं लगेगा ब्रेसियर पहनकर?" मैंने लो कट ब्लाउज़ में से दिखती उसकी चिकनी पीठ सहलाते हुए कहा.

"नहीं जीजाजी, बहुत सेक्सी दिखेंगे आप, याने भले नाजुक युवती जैसे ना दिखें पर वो डब्ल्यू डब्ल्यू एफ़ रेसलिंग वाले चैनल पर जो पहलवान औरतें आती हैं ना, उनमें कुछ कुछ क्या सेक्सी लगती हैं ... "

"कल देखेंगे यार, वैसे तेरा इतना मन है तो ..." मैंने बात अधूरी छोड़ दी. सोचा कल उसे फुसला कर बहला दूंगा पर मुझे क्या पता कि हमारी अधूरी बात्चीत को वह यह समझ बैठेगा कि मैं तैयार हूं.

दूसरे दिन मुझे जल्दी ऑफ़िस जाना पड़ा. आने में भी छह बज गये. वैसे ललित अब घर में सेट हो गया था इसलिये वह अकेला कैसे रहेगा इसकी मुझे कोई चिन्ता नहीं थी. शाम को घर में दाखिल हुआ तो ललित साड़ी पहनकर बैठा था. आज उसने लीना की गुलाबी साड़ी और स्लीवलेस ब्लाउज़ पहना था. गुलाबी लिपस्टिक भी लगायी थी.

मैंने उस भींच लिया. कस के चूमा. "ललिता डार्लिंग, हार्ट अटैक करवाओगी क्या, लंड देखो कैसे खड़ा हो गया तेरी खूबसूरती देख कर, अभी चौबीस घंटे का भी आराम नहीं हुआ कल की चुदाई के बाद. सुबह तक गोटियां भी दुख रही थीं. अब चल, देख आज मैं कैसे चोदता हूं तेरे को"

"जीजाजी, अभी नहीं" नखरा करते ललित बोला "मुझे तैयारी करना है आपकी"

"अब चुदाई के लिये क्या तैयारी करनी है, और तुझे कुछ नहीं करना है, बस अपनी साड़ी उठाकर पट लेटना है और चुदवाना है मुझसे" मैंने उसे पकड़ा तो मेरी गिरफ़्त से छूटकर वो बोला. "भूल गये कल आपने प्रॉमिस किया था?"

मैंने बात बनाने की कोशिश की "हां ... वो ...अब रहने दो ना रानी .... क्यों इस पचड़े में पड़ें हम, वैसे ही इतना मस्त इश्क चल रहा है अपना, मन भी नहीं भरा अब तक"

"नहीं जीजाजी, मैं रूठ जाऊंगी, आप को पहननी ही पड़ेगी मेरी पसंद की ब्रा और पैंटी" पैर पटककर ललित बोला. "अभी के अभी आप मेरे साथ मॉल चलिये, मैं अभी खरादूंगी" उसके हाव भाव से लगता था कि औरतों की तरह जिद करना भी उसने भली भांति सीख लिया था.

"अब रहने भी दो ना डार्लिंग, मुझे अजीब सा लगता है" मैंने उसको मनाने की कोशिश की.

"पर मेरे को देखना है आपको औरत बने हुए. मैं सोचती हूं तो मेरा ... याने मैं गरमा जाती हूं" ललित मुझसे चिपटकर बोला, साड़ी में से भी उसके लंड का उभार मुझे महसूस हो रहा था.

"अब बाहर जाने का मूड नहीं है रानी, यहीं देखो ना, लीना की इतनी लिंगरी पड़ी है"

ललित मुस्करा दिया "याने पहनने को तैयार हैं आप, पर बाहर तो चलना ही है, लीना दीदी की पैंटी तो आप को शायद हो जायेगी, इलेस्टिक होता है उसमें, पर ब्रा आपको कम से कम ३८ कप डी साइज़ की लगेगी. दीदी की तो बस ३४ डी है"

"यार मुझे कैसा भी तो लगता है ऐसे जाकर ब्रा खरीदना" मैंने फिर कोशिश की.

"आप बस कार से चलिये मेरे साथ वो वरली की मॉल में. आप बाहर फ़ूड कोर्ट में कॉफ़ी पीजिये, मैं तब तक सब ले आऊंगा - आऊंगी" ललित बोला. पहली बार उसने ऐसे चूक कर मर्द का वर्ब इस्तेमाल किया था. मैं समझ गया कि जनाब मेरे ऊपर जो इतना फिदा हैं वो अब एक जवान लड़के की तरह याने क्या करना चाहते हैं मेरे साथ, ये पक्का है.

फिर भी मैंने हथियार डाल दिये, उसने मुझे इतना सुख दिया था, अब बेचारे को एक दो घंटे मन की करने देने में कोई हर्ज नहीं था.

हम मॉल गये. मैंने उस अपना कार्ड दे दिया. ललित आधे घंटे में शॉपिंग करके आ गया. आठ बज गये थे इसलिये हमने डिनर भी कर लिया. घर वापस आये तो नौ बज गये थे.

ललित ने घर आकर ड्राइंग रुम में बैग में से पैकेट निकाले. एक ब्रा का पैकेट था, एक पैंटी का, एक विग का और एक शूज़ का. मैंने कहा "ये विग क्यों लायी है ललिता रानी? अच्छा मेरा पूरा लिंग परिवर्तन करके ही मानेगी तू आज, और ये जूते?"

"जूते नहीं जीजाजी, हाई हील्स" ललित मुस्करा कर बोला.

"हाई हील? मेरे लिये? अरे पर मुझे होंगे क्या? नाप के हैं?"

"हां जीजाजी, मैंने आपकी शू साइज़ देख ली थी. ८ तो है, कोई बड़े पैर नहीं हैं आपके, आसानी से मिल गयीं आपके साइज़ की "

मैं सोचने लगा कि यह लड़का तो इसको बड़ा सीरियसली कर रहा है. उसकी आंखों में आज गजब की मस्ती और चाहत थी. दिख भी बड़ा खूबसूरत रहा था, साड़ी पहनने का अब उसे इतना अभ्यास हो गया था कि शाम से वह स्लीवलेस ब्लाउज़ और नाभिदर्शना साड़ी उसने बिना झिझक बिना सेल्फ़्कॉन्शस हुए पहनी थी. मैंने सीधे उसको उठाया और गोद में लेकर बैठ गया. नेकिंग किसिंग के दौरान लग तो रहा था कि साले को वहीं पट लिटा कर साड़ी ऊपर करके चोद मारूं पर मैंने संयम रखा, साथ ही अपने लंड को पुचकारा कि अभी रुक जा राजा, आज रात को तुझे खुली छूट दूंगा कि इस मतवाली महकती कली को आज जैसा चाहे मसल ले.

चूमा चाटी, नेकिंग, कडलिंग करते करते ललित अब ऐसा हो गया कि उससे रहा नहीं जा रहा था. आखिर वह मेरी गिरफ़्त से छूट कर खड़ा हो गया और खींच कर अंदर ले जाने लगा.

"अरे अभी तो दस भी नहीं बजे" मैंने कहा. "रात बाकी है पूरी मेरी जान अभी तो, जरा पास बैठकर चुम्मे तो दे ठीक से"

"चुम्मे चाहिये तो पहले मैं कह रही हूं वैसा कीजिये. तैयार कर दूं पहले आप को" मेरी आंखों में आंखें डाल कर ललित बड़े मादक अंदाज में बोला.

मैंने सोचा क्या मस्ती चढ़ी है इसको. मजा आयेगा. फ़िर उसको पूछा "दिखा तो क्या लाया है मॉल से?"

"अब चलिये जीजाजी, और चुपचाप सब पहनिये. फ़िर देखिये मैं आपको कैसे चो .... " अपना सेंटेंस अधूरा छोड़ कर मुझे सोफ़े पर बिठाकर ललित जाकर सब पैकेट्स उठा लाया. फ़िर वहां ड्राइंग रूम के बड़े टीवी पर एक थंब ड्राइव लगाई. "मूवी देखने का प्रोग्राम है मेरी रानी?" मैंने पूछा

"हां, आज मैंने स्पेशल मुई डाउनलोड की है, पहले आप तैयार हो जाइये, फ़िर साथ साथ देखेंगे"

मैंने उसे रोक कर कहा "ललिता डार्लिंग ... ललित ... अब सच बता ... आज रात मेरी गांड मारने का इरादा है क्या? ये सब पहना कर मुझे औरत बनाकर करेगा क्या? चोदेगा?"

"हां जीजाजी, चोदूंगा. पहले अंदर चलिये और ये सब पहनिये" मुझे धकेलकर वह अंदर ले गया. मेरे कपड़े निकालते हुए मेरे नितंबों को पकड़कर मसलते हुए ललित बोला "बहुत अच्छी लगती है मुझे आपकी गांड. इतनी कसी हुई और ठोस सॉलिड है. उस दिन जब आप भाभी और मां को चोद रहे थे तो मुझे इनका परफ़ेक्ट व्यू मिल रहा था. तभी से मैंने ठान ली थी कि आपकी गांड जरूर मारूंगा, भले मुझे कोई भी कीमत देनी पड़े. और सच जीजाजी, आप मुझे बहुत अच्छे लगते हैं, याने आपसे लड़की बनकर चुदवाने में और आपका लंड चूसने में भी मुझे बहुत मजा आता है" ललित ने अपने दिल की सारी बातें आज कन्फ़ेस कर ली थीं.

अब मुझे समझ में आया कि उस दिन मेरे ताईजी को चोदते वक्त क्यों ललित की आंखें मुझपर जमी थीं. मुझे लगा था कि मेरे लंड को घूर रहा है, और वैसे वो सच भी था पर साथ साथ उसे मेरे नंगे बॉटम का भी व्यू मिल रहा था.

"ठीक है मेरे राजा ... मेरी रानी ... पर एक शर्त है. अबसे दो घंटे तेरे ... जो चाहे कर ले मेरे साथ. उसके बाद सारी रात मेरी ... मैं कुछ भी करूं तेरे साथ, तू चुपचाप करवा लेगा"

"मंजूर है जीजाजी"

मेरे सारे कपड़े निकाल कर उसने पहले मुझे विग पहनाया. शोल्डर लेन्ग्थ काले बालों का विग था. मैं आइने में देखना चाहता था पर उसने मना कर दिया, बोला पूरा तैयार होने पर ही देखने दूंगा. उसके बाद उसने मेरे लंड को पकड़कर कहा "इसको जरा छिपाना पड़ेगा जीजाजी, इसलिये जरा टाइट इलेस्टिक वाली पैंटी ढूंढी है मैंने लीना दीदी की."

पैंटी टाइट थी, मेरे लिये छोटी थी, इसलिये और कसी हुई लग रही थी. मेरे लंड को पेट से सटा कर ऊपर से पैंटी का इलेस्टिक फ़िट कर दिया कि वह काबू में रहे, ज्यादा बड़ा तंबू ना बनाये.

उसके बाद ललित ने मुझे हाइ हील सैंडल पहनाये. क्या पता कहां से लाया था, सिल्वर कलर के, जरा जरा से नाजुक पट्टों वाले और चार इंच हील के. उनको पहनकर मुझे बड़ा अजीब लगने लगा, ऐसा लगा जैसे पंजों पर खड़ा हूं. चलकर देखा तो ऐसा लगा कि गिर पड़ूंगा.

"ललित डार्लिंग, ये मैं नहीं पहन सकता, वहां बाहर ड्राइंग रूम तक जाना भी मुश्किल लग रहा है, गिर पड़ूंगा जरूर"

"जीजाजी, मैं तो आपके साथ पूरी बंबई घूमी ऐसे सैंडल पहनकर, और आप बस घर के अंदर भी नहीं पहन सकते?" कहकर ललित मुझसे चिपक गया "जीजाजी, आप चलते हैं तो क्या लचकती है कमर आपकी"

मैंने कहा "चलो मेरी जान, तुम्हारी खातिर यह भी सही."

फ़िर उसने मुझे ब्रा पहनाने की तैयारी की. सफ़ेद ब्रा थी पर एकदम महंगी. लेस लगी हुई. स्ट्रैप्स भी एकदम अच्छे क्वालिटी के इलेस्टिक के थे. ब्रा के कपों में उसने स्पंज की दो कोनिकल शेप के स्पंज के गोले लगाये.

"यह कहां से लाया? यह भी खरीदे क्या?"

"ये आसानी से नहीं मिलते जीजाजी, और सेल्स गर्ल्स से मैं मिनिमम बोलना चाहता था कि आवाज पर से न पकड़ा जाऊं. वैसे मैंने आवाज लड़की जैसी बारीक कर ली थी. ये स्पंज के गोले तो मैंने आज दोपहर बनाये, वहां स्टोर रूम में पुराना पैकिंग बॉक्स था, उसमें स्पंज था. वो ले लिया"

उसने मुझे ब्रा पहनाई और स्ट्रैप तान कर पीछे से बकल लगा दिया.

"बहुत टाइट है डार्लिंग" मैंने कहा.

"साइज़ ३८ नहीं मिली मेरे मन की जीजाजी. इसलिये ३६ ले आया. और टाइट ब्रा मस्त दिखती है आपको. देखिये स्ट्रैप्स कैसे गड़ रहे हैं आपकी पीठ में. सेक्सी!" उसने मेरी पीठ का चुंबन लेते हुए कहा.

"हो गया?" मैंने पूछा.

"अभी नहीं जीजाजी, लिपस्टिक बाकी है"

"अब मैं लिपस्टिक विपस्टिक नहीं लगाऊंगा यार" मैं थोड़ा नाराज हुआ तो ललित मेरे पास आकर मुझसे लिपट गया और पंजों के बल खड़े होकर मुझे किस किया जैसे लड़कियां करती हैं, उसका एक हाथ मेरी पैंटी में छुपे लंड को सहला रहा था. मेरा रहा सहा गुस्सा ठंडा हो गया. फ़िर चुपचाप जाकर वह गहरे लाल रंग की लिपस्टिक ले आया. बड़े जतन से धीरे धीरे उसने मुझे लिपस्टिक लगायी. "अब देखिये आइने में"

मैंने देखा तो बहुत अजीब लगा. याने मैं बड़ा विद्रूप दिख रहा था ऐसा नहीं था. भले ललित की टक्कर की ना हो, पर ठीक ठाक ऊंचे पूरी भरे बदन की अधनंगी सेक्सी औरत जैसा जरूर दिख रहा था. पर किसी सुंदर खानदानी औरत जैसा नहीं, एक नंबर की चुदैल औरत जैसा. मेरा वह रूप देखकर अजीब लगते हुए भी मेरा कस के खड़ा हो गया.

ललित मेरे लंड पर पैंटी के ऊपर से हाथ फेरते हुए बोला "देखा जीजाजी! आप को भी मजा आ गया. मैं कहता था ना कि आप मस्त सेक्सी दिखेंगे"

"यार, खड़ा मेरे खुद को देख कर नहीं हुआ है, यह सोच कर हुआ है कि अब तू मेरे साथ क्या करने वाला है और मैं तेरे साथ क्या करने वाला हूं" मैंने अपने लंड को दबाने की कोशिश करते हुए कहा.

"पर जीजाजी ..." ललित बोला "मैं जो करूंगा वो आज यहां ..." मेरे नितंब पकड़कर वह बोला "फ़िर यह ..." मेरे लंड को पकड़कर उसने कहा "कैसे मस्त हो गया?"

"अब मैं क्या जानूं रानी, वैसे दोनों का रिश्ता तो है, एक खुश तो दूसरा भी खुश"

"और अब आज आपको अनिता आंटी कहूंगा जीजाई. चलिये अब बाहर चलिये, सोफ़े पर." मुझे लिपट कर उसने कस के मेरा चुंबन लिया और खींच कर बाहर ले गया, मैं हाइ हीलों पर बैलेंस करता हुआ किसी तरह उसके पीछे हो लिया, मन में सोचा कि ’ललित राजा, अब बहुत गर्मी चढ़ रही है तेरे को, उतारना पड़ेगी.’ पर उसके पहले उसको मैं अपने मन की करने देना चाहता था.

मुझे सोफ़े पर बिठाकर ललित अंदर जाकर फ़्रिज से वही मख्खन का डिब्बा ले आया. "बड़ी जोर शोर से तैयारी चल रही है ललिता डार्लिंग, आज लगता है मेरी खैर नहीं"

"और क्या अनिता आंटी! आज आप कस के चुदने वाली हैं" ललित बोला. उसने जाकर मूवी शुरू की और हम दोनों सोफ़े पर बैठकर लिपटकर आपस में मस्ती के करम करते हुए मूवी देखने लगे. ट्रानी मूई थी. याने एक ट्रानी और एक जवान मर्द. स्टोरी वोरी कुछ नहीं थी, बस सीधे गांड मारना, लंड चूसना वगैरह शुरू हो गया. वह ट्रानी भी एकदम क्यूट और सेक्सी थी, एशियन लेडीबॉय कहते हैं वह वाली. पर उसका लंड अच्छा खासा था. चूमा चाटी करते करते, एक दूसरे की ब्रा के कप मसलते हुए हम देखते रहे. जब वह ट्रानी उस मर्द पर चढ़कर उसकी गांड मारने लगी, तो ललित मानों पागल सा हो गया. मुझे नीचे सोफ़े पर गिराकर मुझपर चढ़ कर मुझे बेतहाशा चूमने लगा.

एक मिनिट में उठ कर बोला "ऐसे ही पड़े रहिये जीजाजी - सॉरी अनिता आंटी" उसने कहा और फ़िर मेरी पैंटी नीचे कर दी. मेरे पीछे बैठकर वह अब मेरे चूतड़ों को दबाने लगा. "एकदम मस्त गोरे गोरे मसल वाले कसे चूतड़ हैं आंटी" वह बोला और फ़िर झुक कर उनको चूमने लगा. अब लीना भी कभी कभी प्यार में जब मेरे बदन को किस करती है तो कई बार नितंबों पर भी करती है. पर ललित के चुंबनों में खास धार थी. चूमते चूमते उसने अपने होंठ मेरे गुदा पर लगाये और किस कर लिया. फ़िर जीभ से गुदगुदाने लगा. मुझे गुदगुदी हुई और मैंने उसका सिर हटा दिया. वह कुछ नहीं बोला पर उसकी आंखों में अब तेज कामना चमक रही थी. उसने डिब्बा खोला और मेरे गुदा में मख्खन चुपड़ने लगा. फ़िर उंगली अंदर डाल डाल कर मख्खन अंदर तक लगाने लगा.

"अरे बस रानी ... कितनी उंगली करेगी? और इस पैंटी में छेद नहीं किया जैसा कल मौसी ने तेरी पैंटी में किया था" मैं बोला. उसकी उंगली जब जब मेरी गांड में गहरी जाती थी, बड़ी अजीब सी गुदगुदी होती थी.

"अभी तो मख्खन और भरूंगी जीजाजी, वो मौसी ने कितना सारा मख्खन डाला था अंदर. आप चोद रहे थे तो कैसी ’पुच’ ’पुच’ आवाज हो रही थी. आज वैसी ही आवाज आपको चोदते वक्त ना निकाली तो मेरा नाम ललिता नहीं. अब जरा झुक कर सोफ़े को पकड़कर खड़ी हो जाइये अनिता आंटी"

मैंने फ़िर कहा "वो छेद क्यों नहीं किया ये तो बता"

"मुझे आप के गोरे गोरे चूतड़ अच्छे लगते हैं, इसलिये चोदते वक्त उनको देखना चाहता हूं, अब चलिये और खड़े हो जाइये"

"मेरी रानी, तू तो फ़ुल साड़ी में है अब तक. कपड़े तो निकाल" मैंने पोज़िशन लेते हुए कहा. एक बार और मख्खन उंगली पर लेकर मेरी गांड में उंगली डालता हुआ ललित बोला "साड़ी नहीं निकालूंगा जीजाजी, साड़ी ऊपर कर के ऐसे ही आप को चोद लूंगा. एकदम सेक्सी लगेगा. जरा आइने में तो देखिये"

मैंने बाजू के शेल्फ़ में लगे आइने में देखा. उसमें हम दोनों दिख रहे थे. साड़ी पहनी हुई एक युवती एक अधनंगी हट्टी कट्टी औरत की गांड में उंगली कर रही थी यह सीन था. अजीब टाबू करम कर रहा हूं यह जानकर मेरा और जम के खड़ा हो गया.

मैं झुक कर सोफ़े की पीठ पकड़कर खड़ा हो गया. ललित मेरे पीछे खड़ा हुआ और अपनी साड़ी ऊपर कर ली. फ़िर अपनी पैंटी थोड़ी बाजू में करके उसने अपना लंड बाहर निकाला. उसका वह पांच इंच का गोरा लंड काफ़ी सूज गया था और उछल रहा था.

मैंने कहा "अपने शिश्न पर मख्खन नहीं लगायेंगे प्राणनाथ? आपकी दासी को थोड़ी आसानी होगी"

ललित हंसने लगा "आप भी जीजाजी ... " पर उसने थोड़ा मख्खन अपने सुपाड़े पर चुपड़ लिया. फ़िर सुपाड़ा मेरे छेद पर रखकर दबाने लगा. मैंने भी सोचा कि उसे जरा हेल्प कर दूं इसलिये अपनी गांड जरा ढीली की. ललित का लंड पक्क से आधा अंदर घुस गया. मुझे भी एकदम टाइट फ़ीलिंग हुई.

’अं .. आह ... जीजाजी ... अनिता आंटी ... क्या टाइट गांड है आपकी" ललित मस्ती में चहक कर बोला.

"होगी ही ललिता रानी, आखिर तेरी ये अनिता आंटी भी कुवारी है इस मामले में" मैंने कहा और फ़िर थोड़ा धक्का दिया पीछे की तरह जैसे मेरे को मजा आ रहा हो. उधर अब वह ट्रानी उस जवान की गांड मार रही थी और वह युवक ’बगर मी डार्लिंग ... फ़क माइ आर्स’ बड़बड़ा रहा था. ललित की अब वासना से जोर जोर से सांस चल रही थी. उसने फ़िर जोर लगाया और अगले ही पल मुझे महसूस हुआ कि उसका पूरा लंड मेरी गांड में समा गया. ऐसा लगा जैसे गांड पूरी भर गयी हो.

"जीजाजी ... प्लीज़ ... अब रहा नहीं जाता ... आपको चोद ... आपकी गांड मार लूं अब?" ललित ने पूछा. बेचारा अब भी मुझसे पूछ पूछ कर रहा था, मुझे किसी भी तरह से नाराज नहीं करना चाहता था.

"मार ना डार्लिंग ... मैंने तुझे कल पूछा था तेरी मारते वक्त? वैसे पूछता तो भी तू बोल नहीं पाता ... तेरा मुंह तो मौसी के मम्मे से भरा था"

ललित ने मेरी कमर पकड़ी और आगे पीछे होकर धक्के लगाने लगा. मुझे जरा सा दर्द हुआ पर उसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं थी, आखिर ये मेरी पहली बार थी. वैसे लीना कभी कभी चुदते वक्त मेरी गांड में उंगली करने लगती है पर उसकी वो पतली पेंसिल जैसी उंगली और यहां ललित का खड़ा जवान लंड, भले वो मुझसे काफ़ी छोटा हो, कोई कंपेरिज़न नहीं है दोनों में.

मैंने आइने में देखा तो आइने में वो अनिता आंटी की गांड मारे जाने का सीन एक लाइव ब्ल्यू फ़िल्म जैसा लग रहा था. मेरी गांड मारते मारते ललित ने हाथ बढ़ाकर मेरी ब्रा के कप पकड़ लिये और दबाते दबाते मुझे चोदने लगा. अब वे नकली स्तन थे पर मजा लेने के लिये मैं कराहने लगा "हाय रानी ... कितनी जोर से दबाती है ... पिचका देगी क्या? .... कितनी बेरहमी से मसल रहा है रे ... पर ... अच्छा लग रहा है डार्लिंग ... दबा ना मेरी छतियां और जोर से ... हां ऐसे ही ... "

ललित के धक्के तेज हो गये, साला मेरे उन बोलों से और गरमा गया था शायद. अब ललित का लंड एकदम आसानी से मेरी गांड में फिसल रहा था और ’पुच’ ’पुच’ ’पुच’ आवाज भी हो रही थी जैसी उसे चाहिये थी. मस्ती में वह झुक कर मेरी पीठ चूमने लगा. "क्या चिकनी पीठ है आपकी जीजाजी ... अनिता आंटी ... और ये ब्रा की कसी हुए पट्टी ..." मेरी ब्रा के स्ट्रैप को दांत में पकड़कर वह सिसकते हुए बोला. "बहुत मजा आ रहा है जीजाजी ... एकदम टॉप ... अं ऽ अंऽ ... आह ..."

"मजा कर ले मेरी जान ... दिल खोल कर चोद ले अपनी आंटी को ... मार ले अपने जीजाजी की गांड ... तेरी दीदी की मारते हैं ना? ... तेरी भी मारी थी कल? ... बदला ले ले आज ... तेरे मन जैसा ’पुच’ ’पुच’ कर रही है ना मेरी गांड?" उसे उकसाने को मैं अनाप शनाप बोले जा रहा था, क्योंकि वह जिस तरह से तड़प तड़प कर अब मुझे चोद रहा था, वह बड़ा मतवाला एक्सपीरियेंस था.

अचानक उसका लंड उछलने लगा "संभाल साले ... झड़ जायेगा ... अरे जरा कंट्रोल कर ...’ मैं कहता रह गया और वहां मेरी गांड के अंदर गरम गरम फवारे छूटने लगे. हांफ़ता हुआ ललित मेरी पीठ पर ही लस्त हो गया. मैंने कुछ देर उसे वैसे ही रहने दिया कि झड़ते लंड का पूरा मजा ले ले, फ़िर सीधा हुआ और मेरी गांड से उसकी लुल्ली निकालकर उसे सोफ़े पर ले गया.

"बड़ी जल्दी ढेर हो गया ललित मेरी जान. और चोदना था ना" उसे बाहों में लेकर चूमते हुए मैंने कहा. उसने कोई जवाब नहीं दिया, बस मेरी ब्रा के कपों में अपनी चेहरा छुपा लिया.

मैंने पिक्चर पॉज़ कर दिया और ललित के बदन पर हाथ फ़ेरने लगा. मेरा बहुत कस के खड़ा था, यह अच्छा मौका था उसे वहीं लिटा कर उसकी गांड मार लेने का पर मैं आज जरा ज्यादा मूड में था, सोच रहा था कि भले थोड़ा और रुकना पड़े, जब मारूंगा तो ऐसी मारूंगा कि उसे याद रहे.

ललित के मुरझाये लंड को मैंने अपनी जांघों पर रगड़ना शुरू किया और लगातार उसे किस करता रहा. जब वह थोड़ा संभला तो मैंने कहा "अब जरा पूरी पिक्चर तो दिखा ललिता जान, तू तो पहले ही ढेर हो गयी"

"लगा लीजिये ना अनिता आंटी, रिमोट तो आपके ही पास है" ललित बोला.

"ऐसे नहीं रानी, तेरी गोद में बैठ कर पिक्चर देखना चाहती है तेरी आंटी"

ललित संभलकर सोफ़े पर बैठ गया और मैं उसकी गोद में. उसके हाथ उठाकर मैंने खुद के नकली स्तनों पर रखे और मूवी चालू कर दी. अब पिक्चर में एक और ट्रानी आ गयी थी. ये जरा ऊंची पूरी यूरोपियन ट्रानी थी. दोनों मिलकर उस जवान के पीछे लगी थीं. एक अपना लंड चुसवा रही थी और एक उसकी गांड मार रही थी.

पांच मिनिट में ललित का लंड फ़िर से आधा खड़ा होकर मेरे चूतड़ों के बीच की लकीर में धंस गया, ऊपर नीचे भी हो रहा था जैसे मुझे उठाने की कोशिश कर रहा हो. "तेरी क्रेन अभी जरा छोटी है ललिता रानी, और पॉवर बढ़ा ले तो शायद अपनी आंटी को उठा सकेगी" मैंने मुड़ कर ललित को किस करके उसके कान में कहा.

ललित अब कस कर मेरी फ़ाल्सी दबा रहा था और मेरी पीठ को चूम रहा था. मैंने पांच मिनिट उसे और गरम हो जाने दिया फ़िर पूछा "ऐसे ही बैठे बैठे मारेगा मेरी ललित राजा?" ललित ने सिर हिला कर हां कहा.

"तू बैठा रह, मैं करता हूं जो करना है" मैं जरा उठा और उसके लंड को पकड़कर उसका सुपाड़ा अपने छेद पर जमाया. फ़िर धीरे से उसके तन्नाये लंड को अंदर लेता हुआ उसकी गोद में बैठ गया. ललित तुरंत ऊपर नीचे होकर मुझे चोदने लगा. मैंने घड़ी देखी, वह लड़का सिर्फ़ बीस मिनिट में फ़िर से पूरी मस्ती में आ गया था, जवानी का कमाल था.

"अब बहुत देर मारूंगी आंटी आपकी, पिछली बार तो कंट्रोल नहीं किया मैंने पर अब चोद चोद कर आपकी ना ढीली कर दी तो देखिये" मेरी गर्दन को बेतहाशा चूमते हुए ललित बोला.

मैंने सोचा थोड़ी फिरकी ली जाये लौंडे की " ललित राजा, बेट लगायेगा?"

"कैसी बेट जीजाजी? अब तो बस आपकी मारनी है मेरे को, रात भर मारूंगा आज, आप मना नहीं करेंगे"

"वही तो बेट लगा रहा हूं. अभी ये मूवी पूरी नहीं हुई है, अब बैठे बैठे जैसा मन चाहे, मेरी मार, चोद डाल मेरे को. पर मूवी खतम होने तक नहीं झड़ना."

"लगी बेट अनिता आंटी" मुझे कस के पकड़कर नीचे से धक्के मारता हुआ ललित बोला "अगर मैं जीत गया, बिना झड़े मूवी देख ली तो रात भर आप मेरे, जैसा मैं करूं, करने देंगे"

"मंजूर. और अगर झड़ गया तो उलटा होगा. मैं रात भर जो चाहे तेरे साथ करूंगा. ठीक है?"

"ऒ के जीजाजी" कहकर ललित जरा संभलकर बैठ गया. उसके धक्के थोड़े धीमे हो गये पर अब भी वो मजा ले रहा था, बस धीरे धीरे ऊपर नीचे होकर मेरी गांड में अपना लंड जरा सा अंदर बाहर कर रहा था. मैं भी नीचे ऊपर होकर जितना हो सके उसके लंड को अंदर लेने की कोशिश कर रहा था. मेरा खुद का लंड झंडे जैसा तन कर खड़ा था. सुपाड़ा पूरा पैंटी के इलेस्टिक से बाहर आ गया था और मेरे पेट पर दबा हुआ था बड़ा मीठा टॉर्चर सा हो रहा था. बार बार लगता कि ललित को पटककर चोद डालूं पर अब बेट लगा ली थी. वैसे मुझे पूरा भरोसा था कि मैं बेट जीतूंगा पर उतना समय काटना मुश्किल हो रहा था. मैंने सोचा कि अगर हार भी जाऊं तो ललित मेरे साथ जो करेगा, उसमें मेरे को भी भरपूर मजा आने ही वाला था. इसलिये अपने लंड को मैं हाथ भी नहीं लगा रहा था कि वह रास्कल बेकाबू ना हो जाये. एक दो बार जब ललित ने उसको हाथ में लिया तो उसका हाथ हटाकर अपनी नकली चूंची पर रख दिया.

वैसे मैं चाहता तो उसे एक मिनिट में झड़ा सकता था. एक दो बार गांड सिकोड़ कर मैंने उसके लंड को दुहने की प्रैक्टिस की थी. उस वक्त वो बेचारा पागल सा हो जाता, ’अं .. अं .. आह’ करने लगता, उसका लंड उस वक्त जैसे मेरी गांड में मुठियाने लगता, उससे मुझे अंदाजा हो गया था कि मेरा ऐसा करना उसे कितना उत्तेजित कर रहा था. पर मैंने सोचा कि फ़ेयर प्ले हो जाने दो, उस लौंडे को ऐसे फंसा कर मुझे उसपर करम नहीं करना थे.

काफ़ी देर ललित बेचारा कंट्रोल करता रहा पर आखिर उसकी सहन शक्ति जवाब दे गयी, वो मूवी भी ऐसी कुछ बीडीएसेम हो गयी कि उसका कंट्रोल जाता रहा. उस पिक्चर में अब उस छोटी वाली एशियन ट्रानी की मुश्कें बांध कर वह युवक कस कस के उसकी मार रहा था. दूसरी ट्रानी खड़े खड़े उसे अपना लंड चुसवा रही थी. वो छोटी ट्रानी ऐसे चीख रही थी (झूट मूट) कि गांड फटी जा रही हो. अब मूवी का मुझे अंदाजा तो था नहीं, इसलिये जो हुआ वो बिलकुल फ़ेयरली हुआ.

उस सीन को देखकर ललित ऐसा बेकाबू हुआ कि जोर लगाकर मुझे वह सोफ़े पर पटकने की कोशिश करने लगा. जब मैं जम के बैठा रहा तो नीचे से ही कस के उछल उछल कर धक्के मार मार कर मेरी गांड मारने लगा. इस बार मैंने उसे शांत करने की कोशिश नहीं की. आखिर में अपनी वासना में उसने मेरे कंधे पर दांत जमा दिये और एकदम स्खलित हो गया. हांफ़ते जोर से सांस लेते ललित की गोद में मैं बैठा रहा कि उसे पूरा मजा मिल जाये. मूवी भी खतम होने को आयी थी. पांच मिनिट में उस छोटी ट्रानी की गांड का भुरता बना कर वह मर्द भी झड़ गया और मूवी खतम हो गयी.

पीछे मुड़ कर ललित का चुंबन लेते हुए मैंने कहा "हो गया डार्लिंग ... मजा आया?"

"हां जीजाजी ... कैसा तो भी हो रहा है लंड में ... इतनी जोर से कभी नहीं झड़ा मैं" वह सांसें भरते हुए बोला.

"चल, अब अंदर चल बेडरूम में, वहां आगे की प्यार मुहब्बत करेंगे" मेरा लंड अब तक मेरी पैंटी को हटाकर बाहर आ गया था, सूज कर किसी बड़ी मोटी ककड़ी जैसा हो गया था. उसपर ललित की नजर लगी हुई थी. उसकी नजर में चाहत भी थी और डर भी. बेट हारने पर मेरा जवाबी हमला सहने की अब उसकी बारी थी.

"जीजाजी ... एकाध और मूवी देख लें? फ़िर चलेंगे अंदर" मेरी ओर बड़ी आशा से तकता हुआ ललित बोला. मैं उठ खड़ा हुआ. उसकी नजरों के सामने ही मैंने अपन तन्नाये हुए लंड पर थोड़ा मख्खन चुपड़ा और फ़िर हाथ पोछ कर ललित को बाहों में उठा लिया, किसी दुल्हन की तरह. "मूवी तो बाद में भी देख लेंगे मेरी जान, पर मेरा जो यह लौड़ा अब मुझे पागल कर रहा है और कह रहा है कि बेट जीतने पर अब चलो, मेरा इनाम मुझे दो, उसे कैसे समझाऊं ललिता डार्लिंग"

उसने मेरी गर्दन में बाहें डाल दीं और चुप चाप मेरी बाहों में पड़ा रहा. उसे मैंने अपने बेड पर ओंधा पटक दिया और फ़िर उसपर चढ़ बैठा. अपनी पैंटी निकाली पर उसके कपड़े निकालने के चक्कर में नहीं पड़ा. बस साड़ी ऊपर सरकाई और लौड़ा गाड़ दिया उन गोरे चिकने चूतड़ों के बीच. ललित किसी आधे पके सेब जैसा रसीला लग रहा था. अब मैं जिस सैडिस्टिक मूड में था, उसमें धीरे धीरे हौले हौले डालने का सवाल ही नहीं था जैसा शान्ताबाई की मदद से ललित की गांड पहली बार मारते वक्त मैंने किया था.

लंड पहली बार में ही सुपाड़े समेत आधा अंदर हो गया. ललित तड़पा, शायद चीख भी पड़ता पर उसने अपने होंठ दांतों तले दबाकर अपनी चीख दबा ली. शायद उस शरम लगी होगी कि जवान युवक होते हुए भी वह लड़की की तरह चिल्लाने वाला था. मैंने दूसरे धक्के में लंड जड़ तक उतार दिया और फ़िर अपने इस मीठे मतवाले फ़ीस्ट में जुट गया जिसके लिये इतनी देर से मैं प्यासा था.

मैंने लगातार दो बार ललित की गांड मारी. बिना कोई परवाह किये उसकी जवानी को भोगा. पहले पहले वह थोड़ा हिल डुल रहा था पर बाद में चुपचाप पड़ा पड़ा सहन करता रहा. बस बीच में मेरे लंड के स्ट्रोक कभी ज्यादा जोर से पड़ने लगते तो हल्के से कराह देता. पहली बार ही मैंने कम से कम बीस पच्चीस मिनिट उसको चोदा होगा, लगता है कि अगर लंड ज्यादा देर खड़ा रहे तो जैसे झड़ना ही भूल जाता है.

स्खलित होने के बाद भी मैं उसपर पड़ा रहा, उसे छोड़ा नहीं, बस पटापट उसका सिर अपनी ओर घुमा घुमा कर चुम्मे लेता रहा. आधे घंटे में मेरा लंड फ़िर तन्ना कर उसकी चुदी हुई गांड में अपने आप उतर गया, और मैंने उसे फ़िर दूसरी बार चोद डाला.

रात को नींद में भी मैंने उसे चिपटाये रखा, बीच बीच में उसे नीचे गद्दी जैसा लेकर उसपर सो जाता था. सुबह नींद खुली, तो लंड फ़िर कस के खड़ा था, जैसे उसे पागलपन का दौर पड़ रहा हो. ललित बेचारा गहरी नींद सोया था. एक बार उसपर दया आई, लगा कि अब छोड़ दूं पर फ़िर नजर दिन की रोशनी में दमकती उसकी गोरी गोरी गांड पर पड़ी, उसकी साड़ी नींद में फ़िर ऊपर हो गयी थी. इतनी लाजवाब मिठाई थी कि मेरा मन फ़िर डोल गया. उसे हौले से पट लिटा कर मैं उसके बदन के दोनों ओर घुटने टेक कर बैठ गया और फ़िर सुपाड़ा उसके गुदा पर रखकर अंदर कर दिया. मख्खन की बची खुची लेयर इतनी थी कि मेरा लंड आसानी से अंदर घुस गया. जब तक उसकी नींद खुलती, मेरा पूरा लंड अंदर हो गया था.

"ओह जीजाजी ... दुखता है प्लीज़ ..." ललित कराह कर बोला पर मैंने ध्यान नहीं दिया. उसने एक दो बार और कहा पर मैं इतनी मस्ती में था कि बिना परवा किये उसपर चड़ कर उसके बदन को अपने हाथों पैरों में जकड़कर हचक हचक कर उसकी गांड मारता रहा. मैं मूड में हूं यह देखकर वह भी बस चुपचाप पड़ा रहा.

उस सुबह की चुदाई में जो मिठास थी, याने मेरे लिये, वो सबसे ज्यादा थी. लंड में अजीब से जिद पैदा हो गयी थी, कुछ भी करके यह आनंद लूटना है यह जिद. वह चुदाई दस एक मिनिट चली होगी पर उसकी फ़ीलिंग बहुत इंटेंस थी.

मुझे फ़िर नींद लग गयी. सो कर उठा तो नौ बज गये थे. ललित पहले ही उठ गया था, शायद नहा भी लिया था. मैंने चाय बनाई. वह आया और चुपचाप चाय पीने लगा.

मैंने उसे पास खींचकर कहा "सॉरी यार"

"सॉरी क्यों जीजाजी?" उसने आश्चर्यचकित होकर पूछा.

"जरा ज्यादा ही मसल डाला मैंने तेरे को. अब क्या करूं, तेरा जोबन ऐसा निखर आया था कि रहा ही नहीं गया. वो क्या है, कभी कभी टेस्टी मिठाई धीरे धीरे खाकर मजा नहीं आता, बकाबक खाने का मन होता है. वैसा ही हुआ. अब नहीं करूंगा, कल काफ़ी जी भर के जीमा है मैंने" ललित के गाल को सहला कर मैंने कहा.

वो चुप था, बस थोड़ा मुस्करा दिया.

"तेरे को दर्द तो हुआ होगा, वैसे ठीक है ना, सच में फाड़ तो नहीं दी मैंने तेरी?"

"करीब करीब फाड़ ही दी जीजाजी, असल में कल रात को मेरे को पता चला कि गांड फटना याने क्या है. पर जीजाजी .... मजा भी आ रहा था ... बहुत अच्छा लग रहा था .... और फ़िर मैंने भी तो आप की मारी ना दो बार."

"हां यार ... वैसे मुझे नहीं लगा था कि तू यह भी करेगा"

"वो क्या है जीजाजी, वहां घर में कोई नहीं मारने देता, ना मां, ना मीनल भाभी, लीना दीदी या राधाबाई से तो पूछते भी डर लगता है ... इसलिये ...."

"इसलिये मेरे पर हाथ साफ़ कर लिया, तू दिखता है उतना सीधा नहीं है ललित" मैंने उसका कान पकड़कर कहा.

"और जीजाजी ... जब आप इतनी कस के मार रहे थे ... आपका सांड जैसा खड़ा हो गया था, तब मुझे ये भी लगा कि मुझे देख कर आप का इतना खड़ा हो गया ... याने मस्ती भर गयी नस नस में. अगर सच में लड़की होता तो पूरा कुरबान हो जाता अगर आप ऐसे चोदते मेरे को"

इस बात को अब हफ़्ता हो गया है. ललित कल ही वापस चला गया. लीना तीन चार दिन और रहेगी वहां, शायद छोटे भाई के साथ समय बिताने का मौका नहीं मिला अब तक इसलिये.

पिछले हफ़्ते में हमने क्या रंगरेलियां मनाईं, हिसाब नहीं. पर अधिकतर शान्ताबाई के साथ, हम तीनों ने मिलकर, मैं, ललित और शान्ताबाई. शान्ताबाई रोज लंच टाइम में आती थीं और शाम को आठ बजे जाती थीं, मेरे ऑफ़िस से लौटने के दो घंटे बाद. ललित को सब से ज्यादा मजा आया होगा, दोपहर शाम और रात को लगातार चुदाई.

वैसे उसे बेट से मुक्त कर दिया मैंने. एक ऐपल का लैपटॉप भी ला दिया. बंदा खुश हो गया. और उसके ये लड़की के कपड़े दिन भर पहनना भी कम कर दिया. मैं नहीं चाहता कि वो लड़की ही बन जाये, आखिर उसका भी फ़र्ज़ बनता है अपनी मां और भाभी के प्रति, खासकर जब उसका बड़ा भाई हेमन्त यहां नहीं है. और उसकी गांड मारना भी मैंने कम कर दिया. साले को लत ना पड़ जाये, मैं चाहता हूं कि वह ऐसा ही जवान मस्ताना नौजवान लड़का बन कर रहे, और बस कभी कभी मुझे साली का सुख दे दिया करे.


दो महने बाद


लीना के आने के बाद हमारी यहां की जिंदगी फ़िर से शुरू हो गयी. मुझे लगा था वैसे लीना ने मेरे और ललित के बारे में ज्यादा नहीं पूछा कि तुम लोगों ने यहां अकेले में क्या हंगामा किया. शायद उसे ललित ने बता दिया होगा या वो समझ गयी होगी. वैसे उसका मूड अब बहुत अच्छा है. करीब करीन तीन हफ़्ते मां के यहां रहकर उसे मन चाहा आरम और सुख मिला होगा. मीनल भाभी और राधाबाई ने भी खूब लाड़ किया होगा.

अब खास बात यह है जल्दी ही हमारे लाइफ़ में बड़े चेन्जेस आने वाले हैं.

हेमन्त को दो साल के लिये कैनेडा जाना है. वह मीनल और अपनी बच्ची को लेकर अगले ही महने जाने वाला है. जाते वक्त यहां हमारे यहां हफ़्ते भर रहने वाला है. लीना ने अभी से मुझे हिंट कर दिया है कि अब बड़ा भाई दो साल नहीं मिलेगा इसलिये वह पूरा हफ़्ता ज्यादातर उसके साथ बिताना चाहेगी. फ़िर मुझे यह भी बोली, कि मैं चिंता ना करूं, मैं बोर नहीं होऊंगा, मीनल भाभी को बंबई घूमना है, सो मैं घुमा दूं, और टाइम पास करने में उसकी सहायता करू. अब मीनल के साथ एक हफ़्ता करीब करीब अकेले में मिलना याने इससे बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती है.

पर उससे भी बड़ी खुशी की बात जल्दी ही पता चली. हेमन्त और मीनल अब नहीं रहेंगे इसलिये लीना ने डिसाइड किया है कि उसकी मां और छोटे भाई का वहां उसके मायके वाले घर में अकेले रहने का कोई मतलब नहीं है. इसलिये मार्च के बाद जब ललित के फ़ाइनल एग्ज़ाम हो जायेंगे, ताईजी और ललित यहां हमारे यहां आकर रहेंगे. ललित को यहां के कॉलेज में एडमिशन मिल जायेगा. हमारा घर भी बड़ा है, चार बेडरूम का, कोई परेशानी नहीं होगी. वैसे अगर एक बेडरूम का भी होता तो कोई परेशानी नहीं होती, मुझे नहीं लगता किसी भी रात में एक से ज्यादा बेडरूम यूज़ होगा.

शान्ताबाई के काम पर क्या असर पड़ेगा, यह सवाल है. पर लीना को नहीं लगता कि कोई प्रॉब्लम होगा. ललित की तो पहचान है ही शान्ताबाई से, रहीं मांजी, उनकी भी जल्दी हो जायेगी. जैसे वहां राधाबाई, वैसे यहां शान्ताबाई.

राधाबाई नहीं आने वाली हैं, वे शायद अपने गांव लौट जायेंगी, अपने भाई और उसकी बीवी के यहां. जाने के पहले वे दो हफ़्ते के लिये यहां आने वाली हैं. मजा आयेगा. खास कर मुझे देखना है कि उनमें और शान्ताबाई में कैसी जमती है. वैसे दोनों करीब करीन बहनें ही लगती हैं, राधाबाई बड़ी बहन, उमर में बड़ी और बदन से भी बड़ी. उनकी जुगलबंदी अगर जम जाये और देखने मिले तो इससे अच्छी कोई ब्ल्यू फ़िल्म हो ही नहीं सकती.

ललित आ रहा है इससे अब इस मस्ती वाली जिंदगी में थोड़ी धार आ जायेगी. यहां उसके साथ दस दिन जो धमचौकड़ी की वो रिपीट करने का मेरा इरादा नहीं है. उस वक्त तो ऐसा था जैसे पहली बार कोई तीखा चटपटा पकवान खाया हो. अब यह पकवान बस कभी कभी खाने में ही मजा है यह तय है, और वह भी जरा छिपा कर, कभी सबसे नजर बचाकर एकाध दो घंटे अकेले में मिलें तब.

वैसे एक बात है, जो मुझे ज्यादा एक्साइटिंग लग रही है. उन भाई बहन की इतनी जमती है कि ललित का ज्यादा समय लीना के साथ ही जाने वाला है, और शान्ताबाई भी उसे छोड़ेगी नहीं, उसके तो दिल में उतर गया है ललित. अब अगर ये तीनों आपस में बिज़ी हों तो ताईजी के साथ, लीना की मां के साथ मुझे ज्यादा समय बिताने का मौका मिलेगा, ऐसी मेरी आशा है. उनपर तो मैं मर मिटा हूं, क्या ब्यूटी है, क्या मुलायम बदन है, क्या स्वीट नेचर है, मेरा तो इश्क हो गया है उनसे, पर लीना से संभालकर ही करना पड़ेगा.

मुझे खास इन्टरेस्ट है अब उनकी गोरी गुदाज गांड में. अब तक अछूती है, लीना के वीटो के बाद मैंने भी उन तीन दिनों में ट्राइ नहीं किया, पर अब अगर साथ रहेंगी तो मेरी मिन्नत पर जरूर ध्यान देंगी ये आशा है. और अब भी मेरा प्लान है कि उनको कोकण दर्शन पर ले जाऊंगा, अकेले. दो चार रातें होटल में गुजरेंगी, उन रातों में सिर्फ़ वे और मैं ...